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दस साल का मनरेगा: आगे-आगे चलने वाला छत्तीसगढ़ हुआ फिसड्डी

शिरीष खरे | Updated on: 4 February 2016, 21:58 IST
QUICK PILL
  • दस साल बाद जब हम छत्तीसगढ़ में मनरेगा की समीक्षा करते हैं तब पता चलता है कि छत्तीसगढ़ कभी नरेगा के मामले में सबसे आगे था, लेकिन अब ये राज्य इस मामले में पिछड़ गया है.
  • राज्य सरकार की अनदेखी के कारण बढ़ रहा है राज्य से मजदूरों का पलायन. हालांकि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के बदले नजरिए के बाद दिख रहा है सुधार का लक्षण.

केंद्र सरकार के सहयोग से चलने वाली और जनहित से जुड़ी किसी योजना के मामले में अग्रणी रहे एक राज्य को किस तरह से फिसड्डी बनाया जा सकता है, इसकी बानगी देखनी है तो छत्तीसगढ़ चले आइए! दो साल पहले तक छत्तीसगढ़ मनरेगा जैसी योजना को अच्छी तरह से लागू कराने वाले देश के चुनिंदा राज्यों में शुमार था, लेकिन आज बात चाहे मजदूरों को समय पर और साल में सौ दिन काम दिलाने की हो या काम के बदले उसकी उचित कीमत चुकाने की, यह प्रदेश हर मामले में काफी पीछे हो गया है.

हालांकि इस साल मनरेगा को लेकर केंद्र की नरेन्द्र मोदी सरकार के बदले नजरिए का उम्दा असर योजना के कामकाज पर पड़ा है. इसके चलते इस साल मनरेगा में काम के दिनों में बढ़ोतरी से लेकर मजदूरों को उनकी मजदूरी के भुगतान तक की स्थितियों में सुधार हुआ है. अकाल के हालात को देखते हुए राज्य में भाजपा सरकार के मुख्यमंत्री डॉ. रमन सिंह ने भी सूखाग्रस्त सौ से ज्यादा तहसीलों में मनरेगा के तहत हर परिवार को 200 दिन काम देने का ऐलान किया है. साथ ही राज्य के आदिवासी बहुल 85 ब्लॉकों के लिए प्रति परिवार 150 दिन काम दिलाने की गारंटी दी जा रही है.

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इसके बावजूद मनरेगा से जुड़े अधिकारियों की मुसीबत कम होने का नाम नहीं ले रही हैं. वजह यह है कि मनरेगा को लेकर ज्यादातर मजदूरों के मन में आशंकाएं बैठ गई हैं, इसलिए इस योजना के प्रति लोगों में फिर से भरोसा जमाना अधिकारियों के लिए मुश्किल हो रहा है.

भोजन के अधिकार अभियान से जुड़े समीर गर्ग का कहना है, "2 फरवरी 2006 को जब यह योजना देश के सभी 200 राज्यों में शुरू की गई तो छत्तीसगढ़ में भी इसके लागू होने के कुछ समय बाद मजदूरों के लिए उनके गांव के आसपास ही काम मिलने लगे. बेहतर तरीके से क्रियान्वयन के मामले में छत्तीसगढ़ को 2013 तक देश के सबसे अच्छे पांच-छह राज्यों में गिना जाता रहा. इस दौरान पलायन की दर घटी और मानव तस्करी में भी कमी दर्ज की गई. ग्रामीण अर्थव्यवस्था में बूम आया और लोगों की आर्थिक स्थितियों में सुधार आया. योजना की सबसे अच्छी बात यह रही कि इससे 50 प्रतिशत महिला मजदूरों को काम दिया गया. इसके चले महिला सशक्तिकरण को बढ़ावा मिला."

रमन सिंह ने सूखाग्रस्त इलाकों में मनरेगा के तहत हर परिवार को 200 दिन काम देने का ऐलान किया था

छत्तीसगढ़ जैसे राज्य में यह योजना इसलिए भी वरदान कही जाने लगी कि यहां ज्यादातर किसानों के पास इतनी कम जमीन है कि साल के छह से सात महीने उन्हें मजदूरी पर निर्भर रहना पड़ता है. इसके अलावा एक बड़ी आबादी भूमिहीन है. लिहाजा मनरेगा के आने से उन्हें रोजगार का एक और जरिया मिल गया. कुल मिलाकर, ग्रामीण आबादी का दो-तिहाई हिस्सा मनरेगा से सीधी जुडऩे लगा था. साथ ही इसमें विभागों के मुकाबले ग्राम पंचायतों के जरिए बेहतर काम किए गए. इसका नतीजा यह रहा कि पंचायतों को भी सशक्त बनने का मौका मिला.

इसके बाद मई, 2014 को नरेन्द्र मोदी के नेतृव्य में बनी एनडीए (राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन) सरकार ने पूर्ववर्ती यूपीए (संयुक्त प्रगतिशील गठबंधन) सरकार की इस योजना पर आलोचनात्मक रुख अपनाया. प्रधानमंत्री मोदी ने इसे 'कांग्रेस की विफलताओं को जीता जागता स्मारक' बताया.

वामपंथी नेता संजय पराते बताते हैं, "प्रधानमंत्री मोदी के इस कथन के बाद प्रशासन से लेकर पंचायत स्तर तक इस योजना को लागू कराने वाले अफसरों और जनप्रतिनिधियों का मनोबल टूट गया. केंद सरकार ने इसके बजट में कटौती करनी शुरू कर दी. 2014 को प्रदेश भर में मजदूरों का भुगतान रोक दिया गया और 2015 को नाम मात्र के काम कराए गए. इससे संदेश गया कि सरकार इस योजना को जल्द ही बंद करने वाली है. लिहाजा मजदूर फिर से पलायन करने लगे. अब उन्हें लगता है कि पता नहीं इस योजना में उन्हें काम मिलेगा या नहीं और मिलेगा भी तो उसका भुगतान भी होगा या नहीं."

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यह सच है कि 2006 से लेकर 2013 तक राज्य में मनरेगा के हर परिवार को सौ दिन काम नहीं मिल पा रहा था, लेकिन यह भी सच है कि सरकार हर साल इस योजना के मार्फत ही उन्हें सौ दिन काम दिलाने की ओर बढ़ रही थी. 2013 तक मनरेगा के मजदूर परिवारों को सालाना 70 दिनों तक काम दिलाने की आशा की जाने लगी थी, लेकिन अब फिर उन्हें सालाना 40 से 50 दिन काम दिलाना मुश्किल हो रहा है.

प्रदेश में बीते साल मनरेगा के हर मजदूर परिवार को महज 17 से 18 दिन ही काम दिलाया गया. इसे देखते हुए 2015-16 की स्थिति में खासा सुधार दिख रहा है. मनरेगा अधिकारियों का दावा है कि वित्तीय वर्ष के अंत तक प्रति मजदूर परिवार 50 से 55 दिनों तक काम उपलब्ध कराया जाएगा. जैसा कि प्रदेश में मनरेगा के अपर आयुक्त नीलेश झीरसागर बताते हैं कि "मनरेगा योजना में जनवरी से काम जोर पकड़ता है. इस वित्तीय वर्ष में अभी फरवरी और मार्च महीनों के दिन बाकी हैं. इसमें हमारा प्रयास होगा कि मनरेगा मजदूर परिवारों को न्यूनतम 50 दिनों तक तो काम दिलाया जाए."

छत्तीसगढ़ में मनरेगा के सही ढंग से लागू न होने की वजह से मजदूरों का पलायन जारी है

जाहिर है कि प्रदेश में मनरेगा पर दो साल लगे ब्रेक के बाद मजदूरों को सौ दिन काम दिलाने के प्रयास की निरंतरता को झटका लगा है. मनरेगा अधिकारी द्वारा स्थिति से वाफिक कराने के बाद अब यह साफ हो गया है कि राज्य सरकार का इस साल 85 आदिवासी ब्लॉकों में मनरेगा के मजूदर परिवारों को 150 दिन और सौ से अधिक सूखाग्रस्त तहसीलों के मजदूर परिवारों को 200 दिन काम उपलब्ध कराने का वादा कुछ नहीं महज एक राजनीतिक हथकंडा है.

राज्य सरकार के ताजा आंकड़े बताते हैं कि चालू वित्तीय वर्ष में प्रदेश में मनरेगा के महज 73 हजार मजदूर परिवारों को ही सौ दिन का काम मिला है, जबकि इस योजना के तहत प्रदेश में इस वर्ष अब तक करीब 24 लाख मजदूर परिवार काम मांग चुके हैं.

माओवाद प्रभावित जिलों में तो हालत और भी बदतर हैं जहां सुकमा में 291, नारायणपुर में 418, कोंडागांव में 185, बस्तर में 538 और दंतेवाड़ा में 987 परिवारों को ही अब तक सौ दिन का काम दिया जा सकता है. गौरतलब है कि वहीं मनरेगा के तहत राज्य के करीब 40 लाख मजदूर परिवारों को जॉबकार्ड वितरित किए गए हैं. इनमें अनुसूचित जनजाति के साढ़े 13 लाख और अनुसूचित जाति के 4 लाख मजदूर परिवार शामिल हैं.

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दूसरी तरफ, ताजा स्थिति के अनुसार केंद्र सरकार पर मनरेगा मजदूरों का मेहनताना और निर्माण में लगी सामग्री का 275 करोड़ रुपए बकाया है. फरवरी और मार्च के संभावित खर्च के हिसाब से यह राशि दो गुनी भी हो सकती है. इस दौरान राज्य सरकार ने केंद्र से मनरेगा के तहत एक हजार रुपए की मांग की है. यदि केंद्र यह राशि आबंटित करती है तो प्रदेश में मनरेगा से जुड़े मजदूरों का रास्ता आसान होगा. वहीं, मनरेगा मजदूरों की मजदूरी के भुगतान में विलंब की बड़ी वजह इलेक्ट्रानिक फंड मैनेजमेंट सिस्टम के माध्यम से उनके बैंक या डाकघर खातों से पैमेंट में नियमित तौर पर समस्या बताई जा रही है.

प्रदेश में मनरेगा के आयुक्त पीसी मिश्रा बताते हैं, "राशि भुगतान की क्षमता काफी कम होने से एक साथ मजदूरी का भुगतान नहीं हो पाता है, इसलिए मजदूरों को भटकना पड़ रहा है. तकनीकी तौर पर आ रही इस दिक्कत को जल्द ही दूर किया जाएगा."

विशेषज्ञों का कहना है कि मनरेगा जैसी योजना में आमतौर पर कम पढ़े-लिखे लोग शामिल हैं, लिहाजा इसे बहुत तकनीकी और जटिल बनाने से बचना चाहिए. इस साल मजदूरों को अधिकतम काम दिलाने को ही वरीयता देना चाहिए, लेकिन ई-मस्टर रोल के चलते काम दिलाने की प्रक्रिया में विलंब की शिकायतें आ रही हैं. ऐसी हालत में फिलहाल सामान्य मस्टर रोल को ही इस्तेमाल में लाने की मांग हो रही है.

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इसके अलावा मनरेगा को लेकर मजदूरों में इसलिए भी उत्साह नहीं दिख रहा है कि बीते पांच साल से इसकी मजदूरी की दरों को नहीं बढ़ाया गया है. छत्तीसगढ़ में मनरेगा के मजदूर को 159 रुपए दिन मजदूरी दी जा रही है जो देश के दूसरे राज्यों के मुकाबले सबसे कम है। गौरतलब है कि हरियाणा जैसे राज्य में रोजाना 251 की दर पर मजदूरी दी जाती है. राज्य के पंचायत व ग्रामीण विकास मंत्री अजय चंद्राकर का कहना है, "मजदूरी बढ़ाने के लिए हम केंद्र को जल्द ही प्रस्ताव भेजेंगे."

छत्तीसगढ़ में पलायन के चलते बंधुआ मजदूरी जैसे चलन को फिर से बढ़ावा मिल रहा है. किसान नेता राजकुमार गुप्ता का मानना है, "छत्तीसगढ़ में यदि मनरेगा सही तरीके से लागू की गई होती तो पलायन के चलते गांव के गांव खाली नहीं होते. न ही मजदूरों के बंधुआ बनने के कई प्रकरण सामने आते." गौरतलब है कि अकेले जांगीर चांपा जिले से बीते दो साल में 30 हजार से ज्यादा मजदूर पलायन कर चुके है. आदिवासी क्षेत्र बस्तर और सरगुजा में लड़कियों की तस्करी के मामलों में बढ़ोतरी हुई है.

इसी तरह, 2015 में श्रम विभाग ने विभिन्न राज्यों से छत्तीसगढ़ के 69 बंधुआ मजदूरों को मुक्त कराया है. इसके अलावा 31 अगस्त को वित्त मंत्रालय और राज्य के श्रम विभाग ने मिलकर मलेशिया राजधानी में कुआलालम्पुर से प्रदेश के 22 बंधुआ मजदूरों को मुक्ति दिलाई है. इसके बावजूद राज्य सरकार मजदूरों को उनके इलाके में ही आजीविका के साधन उपलब्ध कराने को लेकर गंभीर दिखाई नहीं दे रही है.

जांजगीर-चांपा जिले में जैजैपुर थाना क्षेत्र के परसाडीह निवासी चंदन आग्रे कोकुआलालम्पुर में बंधक बनाया गया था. बातचीत में इस मजदूर ने बताया, "यदि उसे अपने घर में ही काम मिल पाता तो वह कभी अपना गांव छोड़कर जाता ही क्यों?" दरअसल देश के लाखों मजदूरों का यही दर्द है जिन्हें अपने गांव में दो जून की रोटी के लिए काम नसीब नहीं हो रहा है। मनरेगा जैसी योजना से जो मामूली राहत मिलती भी तो उसकी राह में भी बढ़ाएं डाली गई हैं.

First published: 4 February 2016, 21:58 IST
 
शिरीष खरे @catch_hindi

विशेष संवाददाता, राजस्थान पत्रिका

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