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भाजपा को भारी जीत और कांग्रेस को मिली संजीवनी

भारत भूषण | Updated on: 12 March 2017, 14:18 IST
(कैच न्यूज़)

उत्तर प्रदेश और उत्तराखंड में भारतीय जनता पार्टी और उनके नेता नरेंद्र मोदी के नेतृत्व को जो भारी समर्थन मिला है उसके बाद उनके समर्थकों को जश्न मनाना पूरी तरह से जायज है. साथ ही पंजाब में मिली निर्णायक जीत ने कांग्रेस को भी जश्न मनाने का एक मौका दिया है. कांग्रेस को एक और जीवनदान मिल गया है जिससे वह भविष्य में फिर से राष्ट्रीय स्तर पर चुनौती देने के लिए अपने को तैयार कर सकती है.

भाजपा ने निश्चित रूप से अपने को जातियों के इंद्रधनुषीय गठबंधन के रूप में- सिवाय अल्पसंख्यकों के- नये सिरे से खड़ा किया है. फिर भी सिर्फ सांप्रदायिक ध्रुवीकरण (जो कि आधे चुनाव बाद ही शुरू हुआ था) से उत्तर प्रदेश में पार्टी को मिले इस भारी जनादेश की व्याख्या नहीं की जा सकती.

मोदी की जनता से सीधे संवाद कर उसे जोड़ने की क्षमता के साथ इस जीत में विभिन्न जाति समूहों जैसे उच्च जातियों, गैर यादव पिछड़े वर्ग, गैर जाटव दलित और अति पिछड़े वर्ग की सावधानी पूर्वक की गई सोशल इंजीनियरिंग तथा दूसरी अन्य जाति आधारित पार्टियों जैसे अपना दल (सोनेलाल) तथा सुहेलदेव भारतीय समाज पार्टी के साथ किए गए गठबंधन ने भी इस भारी जीत में अपनी भूमिका अदा की है.

एक मायने में यह लोकसभा के 2014 के चुनाव में पार्टी के प्रदर्शन से भी बड़ी जीत है. राष्ट्रीय चुनावों में स्थानीय मुद्दे तथा क्षेत्रीय दल ज्यादा भूमिका नहीं निभा पाते हैं और किसी करिश्माई नेतृत्व द्वारा बेहतर भविष्य के लिए किए गए व्यापक वादों का कहीं ज्यादा असर होता है.

लेकिन राज्य के चुनाव में न केवल स्थानीय मुद्दों को तवज्जो दी जाती है बल्कि जाति आधारित क्षेत्रीय पार्टियों के गठबंधन और निर्दलीय भी इन चुनावों में बड़ी भूमिका निभाते हैं. इसलिए स्थानीय कारकों के बावजूद इस तरह का निर्णायक जनादेश हासिल कर पाना जैसा कि उत्तर प्रदेश में मिला है, निश्चित रूप से कही बड़ी उपलब्धि है.

इसमें कोई संदेह नहीं कि भाजपा का यह विशाल रथ इस साल के अंत तक अब गुजरात में और फिर अगली गर्मियों में कर्नाटक की ओर बढ़ेगा. इस बीच में कुछ और राज्यों जैसे हिमाचल प्रदेश, नागालैंड, मेघालय और त्रिपुरा में राज्य विधानसभा के लिए चुनाव होने हैं. उत्तर पूर्व के राज्यों को छोड़ दें तो अब अन्य राज्यों के चुनाव में उत्तर प्रदेश की जीत से भाजपा को जो ताकत मिली है उसको बेअसर कर पाना बेहद मुश्किल होगा.

लेकिन पांच राज्यों उत्तर प्रदेश, पंजाब, उत्तराखंड, मणिपुर और गोवा के चुनाव परिणामों के बाद कांग्रेस भी अपनी राजनीतिक जमीन को थोड़ा-बहुत बचा पाने में सफल रही है.

उत्तर प्रदेश के चुनाव परिणामों का कांग्रेस के भविष्य पर कोई असर नहीं हुआ है. कांग्रेस इस राज्य में पिछले 27 साल से हाशिए पर है. यहां तक कि अगर उसने समाजवादी पार्टी के साथ गठबंधन में कुछ बेहतर प्रदर्शन भी किया होता तब भी एक पिछलग्गू सहयोगी के रूप में पार्टी के पास हासिल करने के लिए कुछ खास नहीं था. इसलिए उत्तर प्रदेश चुनाव के परिणाम से कांग्रेस के राष्ट्रीय पार्टी के रूप में उसके अस्तित्व पर कोई ज्यादा अंतर आने वाला नहीं था.

उत्तर प्रदेश में कांग्रेस के लिए बेहतर से बेहतर स्थिति यही हो सकती थी. पिछली बार 90 के दशक में जब अविभाजित उत्तर प्रदेश के चुनाव में कांग्रेस ने मायावती के साथ गठबंधन कर 425 सीटों में 125 सीटों पर चुनाव लड़ा था औऱ कुछ ही सीटें जीत पायी थी. लेकिन कांग्रेस ने उन 300 सीटों पर सबकुछ गंवा दिया जिन पर उसने चुनाव ही नहीं लड़ा.

कमोबेश वही स्थिति कांग्रेस की इन चुनावों में भी हुई है जबकि पार्टी ने सपा के साथ गठबंधन में लगभग 300 सीटों पर चुनाव ही नहीं लड़ा. इसलिए गठबंधन के बिना या गठबंधन के साथ, पार्टी की स्थिति प्रदेश में विकट ही बनी हुई है. कांग्रेस के लिए सबसे अच्छी खबर पंजाब से आम आदमी पार्टी के लगभग सिमट जाने के रूप में आई है.

कांग्रेस और आप, पंजाब

पंजाब में मतदाताओं ने आप की राष्ट्रीय खिलाड़ी बनने की महत्वाकांक्षाओं को खारिज कर दिया है, इसे मतदाताओं का सोचा-समझा और सचेत निर्णय मानना चाहिए. अन्यथा इसकी और कोई व्याख्या नहीं हो सकती कि पंजाब के मालवा क्षेत्र में भी, जहां कि आप सबसे अधिक उम्मीद कर रही थी वहां भी वोट प्रतिशत के लिहाज से वह तीसरे नंबर पर आई है.

अगर आप को पंजाब में जीत मिल जाती तो वह मतदाताओं के दिमाग में राष्ट्रीय पार्टी के रूप में कांग्रेस के विकल्प का स्थान ले सकती थी. इसलिए पंजाब के मतदाताओं ने कांग्रेस को नई सांस दी है, एक और राजनीतिक मोहलत दी है. अपने को नये सिरे से खड़ा करने के लिए कांग्रेस का जिंदा होना भी जरूरी है. पंजाब की जीत वह काम कर सकती है.

कांग्रेस को सबक

यह नोट करना जरूरी है कि यह मौका कांग्रेस पार्टी को मिला है न कि राहुल गांधी और उनके प्रदर्शन को. कांग्रेस के इस 'युवा' गांधी वारिस को इस चुनाव से तीन संदेश मिले हैं. पहला उनको पिछले कुछ समय में अपने प्रदर्शन के बेअसर रहने की समीक्षा करनी होगी. उनकी पार्टी आज कहीं भी नहीं खड़ी है क्योंकि राहुल को यह लगता है कि चुनाव पूर्व पदयात्राएं पार्टी को पुनर्जीवित कर सकती हैं. लेकिन हकीकत में यह सब सिर्फ तमाशा से अधिक नहीं होतीं. वह कोई भी एक ऐसा उदाहरण नहीं दे सकते जबकि कांग्रेस ने किसी भी चुनाव के मुहाने पर खड़े राज्य या दूसरे किसी राज्य में जमीन, पानी, जंगल या किसी अन्य नागरिक मुद्दे पर किसी लोकप्रिय जनआंदोलन का नेतृत्व किया हो.

लोकतांत्रिक पार्टियों में नये खून और नये नेतृत्व का उभार लोकप्रिय आंदोलनों और संघर्षों से ही होता है. अन्यथा पार्टियों को सिर्फ वंशजों, धनकुबेरों और ठेकेदारों अथवा इनकी संतानों के अलावा और कोई नहीं मिलता क्योंकि इन्हीं के पास चुनाव लड़ने के लिए जरूरी आर्थिक क्षमता होती है. राहुल गांधी को पार्टी के भीतर संस्थाओं को भी पुन: खड़ा करना होगा. जीवंत संस्थाओं के बिना पार्टी दिल्ली केंद्रित चौकड़ी और निहित स्वार्थों द्वारा चलाई जाती है और ऐसा ही आगे भी होता रहेगा. जीवंत संस्थाओं से पार्टी के हितैषी पैदा होते हैं. इसलिए मृत प्राय हो चुकी आॅल इंडिया कांग्रेस कमेटी तथा कांग्रेस वर्किंग कमेटी को पुनर्जीवित करने के साथ राज्य स्तरीय शक्ति संपन्न संस्थाओं को भी खड़ा करना होगा.

हर चीज दिल्ली सेही संचालित नहीं हो सकती और ऐसा होना भी नहीं चाहिए, लोगों को स्वायत्तता मिलनी चाहिए

कांग्रेस को अपने कार्यकर्ताओं को अपनी विचारधारा और कार्यक्रमों के बारे में प्रशिक्षित करने की जरूरत भी है. कान्वेंट स्कूल शिक्षा प्राप्त नवयुवकों को टीवी चैट शो में पार्टी के प्रवक्ता के रूप में प्रोजेक्ट किया जाना काफी नहीं है.

आज की तारीख में कांग्रेस पार्टी में राज्य के स्तर पर पूरी तरह से ठहराव की स्थिति है. राज्य के प्रभारियों को प्राय: यह नहीं पता होता कि जमीन पर क्या हो रहा है. साथ ही जो राज्य स्तरीय संयोजक हैं उनका जमीन पर जो भी कार्यकर्ता पार्टी में बचे हैं उनसे कोई संपर्क नहीं होता. कभी-कभी ऐसे महासचिव नियुक्त कर दिए जाते हैं जिनको अपने ही राज्य में कोई नहीं पूछता.

हर चीज दिल्ली सेही संचालित नहीं हो सकती और ऐसा होना भी नहीं चाहिए. कार्य की स्वायत्ता दिए जाने से ही पार्टी बढ़ सकेगी. साथ ही दिल्ली में बैठे लोगों को प्राय: राज्य के बारे में कम जानकारी होती है.

इसलिए अगर कांग्रेस पार्टी और राहुल गांधी सीधे-सीधे इन समस्याओं का प्राथमिकता से सामना नहीं करते हैं तो पंजाब की जीत से कांग्रेस को जीने का जो एक और मौका मिला है उसका कोई फायदा नहीं होगा.
 
इस चुनाव ने जो सबसे बड़ी चुनौती गैर-भाजपा विपक्षी दलों के सामने पेश की है वह है- कैसे नरेंद्र मोदी द्वारा बुने गए लोकलुभावन कहानियों के जाल को काटा जाए. इस कहानी के चार घटक हैं- हिंदुत्व, राष्ट्रवाद, आकांक्षात्मक राजनीति तथा गरीब उन्मुख कार्यक्रमों का प्रोजेक्शन.

हिंदुत्व विचारधारा का तो सभी धर्मनिरपेक्ष तत्वों द्वारा विरोध किए जाने की जरूरत है, जबकि राष्ट्रवाद जो कि मध्यमार्गी पार्टियों द्वारा भाजपा को प्लेट में सजाकर सौंप दिया गया है उसको फिर से परिभाषित करने और पुन: अपनाने की जरूतर है. वामपंथी दलों का राष्ट्रवाद को लेकर रवैया हमेशा से संदिग्ध रहा है क्योंकि मार्क्सवाद अंतरराष्ट्रीयतावाद का अनुसरण करता है. लेकिन कांग्रेस जैसे दल जो कि राष्ट्रीय संघर्ष में सबसे अग्रणी रहे हैं उनको यह सुनिश्चित करना होगा कि भाजपा और उसके हिंदुत्व सहयोगी दल राष्ट्रीय प्रतीकों और उनके विचारधारात्मक आधारों को एक हथियार के रूप में उसका इस्तेमाल उनसे असहमत होने वालों को ढहाने में न कर सकें.
 
आकांक्षात्मक राजनीति और सरकार को गरीब उन्मुख प्रोजेक्ट करने के मुद्दे ऐसे नहीं हैं जो लंबे समय तक जीवित रह सकेंगे. देर सबेर उनका सच सबके सामने आ जाएगा, जैसे कि इंदिरा गांधी की गरीब हितैषी छवि लंबे समय तक नहीं टिक सकी थी.

ठोस परिणामों के बिना राजनीतिक नारे कुछ समय के लिए तो काम कर सकते हैं पर उनका हमेशा वैकल्पिक एजेंडा और राजनीति के माध्यम से सामना किया जा सकता है. गैर भाजपा दलों को अपना एक राष्ट्रीय एजेंडा लेकर आना होगा जिससे कि वे दिन और रात मोदी की बात करने की बजाय अपने कार्यक्रमों और नीतियों की बात कर सकें. वर्तमान में इसके ठीक विपरीत हो रहा है. मोदी डिमोनेटाइजेशन से लेकर सांप्रदायिकता तक का एजेंडा सेट करते हैं और दूसरे बस प्रतिक्रिया देते हैं.

First published: 12 March 2017, 8:24 IST
 
भारत भूषण @Bharatitis

Editor of Catch News, Bharat has been a hack for 25 years. He has been the founding Editor of Mail Today, Executive Editor of the Hindustan Times, Editor of The Telegraph in Delhi, Editor of the Express News Service, Washington Correspondent of the Indian Express and an Assistant Editor with The Times of India.

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