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क्यों गलत है राफेल विमान खरीदने का विचार?

पुशान दास | Updated on: 27 January 2016, 21:03 IST
QUICK PILL
  • भारतीय वायुसेना ने अपने कमजोर होते बेड़े को मजबूत करने के लिए राफेल की जरूरत पर जोर दिया था. इसने एक साथ दो मोर्चों पर युद्ध के लिए तैयार रहने के लिए 45 लड़ाकू विमान स्क्वाड्रनों की जरूरत बताई थी. 
  • समान क्षमताओं वाले विमान की तुलना में राफेल काफी महंगा है. कुछ अनुमानों के मुताबिक यह सुखोई 30 एमकेआई की कीमत से पांच गुना और तेजस की कीमत से 10 गुना महंगा है.

राफेल लड़ाकू विमान सौदे के बारे में जारी चर्चा से यह बात सामने निकलकर आई है कि भारत में रक्षा सौदे कितने बेतुके हो सकते हैं. पिछले साल प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने पेरिस में घोषणा की थी कि भारत सीधे 36 राफेल खरीदेगा. हाल ही में एक अंतर-सरकारी समझौते (आईजीए) पर मूल्य निर्धारण के बिना ही समझौते पर हस्ताक्षर किए गए.

केंद्र सरकार ने भारतीय वायु सेना (आईएएफ) की 'महत्वपूर्ण परिचालन आवश्यकता' और समय और लागत में कटौती करने के लिए जरूरी 126 विमानों की 1,36,000 करोड़ रुपये कीमत वाली मीडियम मल्टी रोल लड़ाकू विमान (एमएमआरसीए) परियोजना को खत्म कर दिया

इसके बजाय इसने सीधे सरकार से सरकार के अनुबंध के जरिये 36 राफेल खरीदने का विकल्प चुना.

भारतीय वायुसेना ने अपने कमजोर होते बेड़े को मजबूत करने के लिए रफेल की जरूरत पर जोर दिया था. इसने एक साथ दो मोर्चों पर युद्ध लड़ने के लिए तैयार रहने के लिए 45 लड़ाकू विमान स्क्वाड्रनों की जरूरत बताई थी. रक्षा मंत्रालय के एक निर्देश से खतरे की संभावना सामने आई थी.

डेसॉ ने इस सौदे से मिराज 2000 का नाम वापस ले लिया और इसकी बजाय नए और महंगे रफेल को बेचने की पेशकश की

लेकिन धन की कमी को देखते हुए 45 स्क्वाड्रनों की खरीद के लिए पैसा कहां से आएगा? योजनाओं को बनाते वक्त इस बात पर ध्यान नहीं दिया गया. 

कारगिल युद्ध के बाद पुराने होते मिग-21 की जगह भारतीय वायुसेना को मल्टी रोल फाइटर की बहुत ही ज्यादा जरूरत थी. क्योंकि सुरक्षा की दृष्टि से स्वदेश निर्मित हल्के लड़ाकू विमान तेजस  (एलसीए) के आने में वक्त था.

भारतीय वायु सेना तब 126 मिराज 2000 जेट विमानों की खरीद करने वाली थी. लेकिन ऑर्डर देने की बजाय केंद्र सरकार ने संयुक्त राज्य अमेरिका, यूरोप, स्वीडन और रूस के निर्माताओं से 2005 में टेंडर आमंत्रित किया.

डेसॉ ने इस सौदे से मिराज 2000 का नाम वापस ले लिया और इसके बजाय नए और महंगे रफेल को बेचने की पेशकश की.

भारतीय वायु सेना ने तब अपनी प्राथमिकता बदलते हुए सिंगल इंजन एयरक्राफ्ट से ट्विन इंजन एयरक्राफ्ट की आवश्यकता जाहिर की. परिणामस्वरूप 54,400 करोड़ रुपये के तत्कालिक समाधान को खत्म करने से पहले 13,600-17,000 करोड़ रुपये के सौदे में बदल दिया गया. 

कीमत और रखरखाव

मीडिया की खबरों के मुताबिक डेसॉ ने 36 लड़ाकू विमानों की शुरुआती व्यावसायिक बोली 80,000 करोड़ रुपये लगाई थी जिसमें शुरुआती हथियार और स्पेयर पार्ट्स के साथ हैंगर सुविधाएं भी शामिल थीं. लेकिन भारत इस सौदे के लिए 60,000 करोड़ रुपये चुकाने की बात कर रहा है.

हाल ही में कतर ने 24 राफेल के लिए करीब 46,900 रुपये का भुगतान किया था. जिसके मुताबिक एक राफेल की कीमत करीब 1,781 करोड़ रुपये हुई. 

2014 में फ्रेंच सीनेट ने अनुमान लगाया था कि 286 विमानों के लिए राफेल परियोजना में 3,43,824 करोड़ रुपये का खर्च होगा.

समान क्षमताओं वाले विमान की तुलना में राफेल काफी महंगा है. कुछ अनुमानों के मुताबिक यह सुखोई 30 एमकेआई की कीमत से पांच गुना और तेजस की कीमत से 10 गुना महंगा है.

इतनी अत्यधिक लागत पर राफेल विमान खरीदना स्पष्ट रूप से मोदी की 'मेक इन इंडिया' के लिए एक झटका साबित होगा.

सुखोई-30 एमकेआई, मिग-29, मिग-27, मिग-21, मिराज 2000, जगुआर और तेजस एलसीए जैसे सात युद्धक विमान पहले से ही भारतीय वायुसेना में मौजूद हैं. इस बेड़े मेें आठवें युद्धक को जोड़ना डिपो, रखरखाव और प्रशिक्षण के बुनियादी ढांचे और स्पेयर पार्ट्स पर अतिरिक्त दबाव होगा.

36 ही क्यों?

मोदी की पेरिस यात्रा से पहले 36 का आंकड़ा कैसे सामने आया, इसका किसी को अनुमान है.

यह सच है कि बेहतरीन तकनीकी के मोर्चे पर रफेल जैसे विमानों की क्षमता को संख्या में मापा नहीं जा सकता लेकिन 36 रफेल भारतीय वायुसेना की आवश्यकता को पूरा नहीं कर सकेंगे. रखरखाव-स्पेयर पार्ट्स की उपलब्धता और प्रशिक्षण की कुछ योजनाओं को अलग रखने के बाद केवल कुछ ही विमान सक्रिय रूप से उपलब्ध हो पाएंगे. 

भारत 36 रफेल विमान सौदे के लिए 60,000 करोड़ रुपये चुकाने की बात कर रहा है

126 रफेल की मूल निविदा को रद्द करने और कीमतों पर तोलमोल की कभी न खत्म होने वाली प्रक्रिया से यह साफ जाहिर होता है कि भारतीय वायुसेना को जितनी संख्या चाहिए, यह आधुनिक हथियारों का प्लेटफॉर्म खरीदने में असमर्थता ही हाथ आएगी.

अपने दो नाभिकीय हथियारों से लैस विरोधियों को देखने के बाद संभावित खतरे से निपटने के लिए सरकार को संघर्ष की प्रकृति का एक यथार्थवादी मूल्यांकन करने की जरूरत है. इससे भारत को अधिग्रहण क्षमता में मदद मिलेगी और रफेल सौदे की तरह कोई और असफलता टाली जा सकेगी. 

भारत अभी तक 36 विमानों के लिए किसी समझौते पर हस्ताक्षर करना चाहता है लेकिन राष्ट्रपति फ्रांसुवा ओलांद और मोदी की उपस्थिति में अंतर-सरकारी समझौते पर हस्ताक्षर करने के लिए वार्ता की सफलता पर राजनीतिक दबाव होगा.

First published: 27 January 2016, 21:03 IST
 
पुशान दास @Pushan3012

Pushan Das works at Observer Research Foundation under the security studies programme.He completed his Masters in International Security from the School of Global studies at the University of Sussex . Pushan has previously worked for the India Today Group as a Correspondent.

He is interested in the security architecture of the Indian Ocean Region, Military Policymaking and Defence Planning.

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