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85 में 5 सीट, यह आंकड़ा है बिहार में भाजपा के सहयोगी दलों का

निखिल कुमार वर्मा | Updated on: 17 November 2015, 7:29 IST
QUICK PILL
  • \r\n\r\n\r\n \r\n \r\n \r\n \r\n\r\n\r\nआरएसएस प्रमुख मोहन भागवत ने आरक्षण पर सवाल उठाकर\r\nदलितों को एनडीए से नाराज कर\r\nदिया.\r\n40 आरक्षित\r\nसीटों पर एनडीए के मात्र 7\r\nउम्मीदवार\r\nजीत पाए.
  • बीजेपी\r\nजिन सामाजिक शक्तियों को\r\nजो़ड़कर समीकरण बना रही थी,\r\nउसके\r\nनेताओं की साख भागवत\r\nके बयान के कारण\r\nअपने जनाधार में खत्म हो गई.

राजनीतिक विश्लेषकों मानें तो बिहार चुनाव की शुरुआत में बीजेपी कागज पर मजबूत नजर आ रही थी. शायद वो मजबूत थी भी. पार्टी मानकर चल रही थी कि सवर्ण वोट पहले से ही उसके पास है. इसके अलावा प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के नाम पर वैश्य समुदाय( जो बिहार में ओबीसी में आते हैं) को भी अपने साथ मान रही थी.

पार्टी के इस आधार वोटबैंक के साथ रामविलास पासवान(दुसाध), जीतन राम मांझी( महादलित) और उपेंद्र कुशवाहा(कोइरी) के वोटों को मिलाकर एक जिताऊ समीकरण बनता दिख रहा था. लेकिन बिहार के चुनाव परिणाम से ये बात साफ है कि बीजेपी के सभी चुनाव पूर्व समीकरण औंधे मुंह गिर चुके हैं. बिहार में एससी-एसटी के 40 सीटें सुरक्षित हैं. जिनमें से 31 सीटों पर महागठबंधन को जीत मिली है. बीजेपी और उसकी सहयोगी पार्टियों को महज सात सीटें मिली.

एनडीए के खिलाफ दलित क्यों गए इस सवाल पर सीनियर जर्नलिस्ट दिलीप मंडल का कहना है, ''चुनाव में दूसरे चरण के आते आते माहौल अगड़ा बनाम पिछड़ा होने लगा. इसी बीच सरसंघचालक मोहन भागवत ने आरक्षण की समीक्षा का बयान दे डाला. उन्होंने ऐसा क्यों किया मेरे लिए ये समझ पाना आज भी मुश्किल है. बीजेपी और एनडीए लोगों को यह नहीं समझा पायी कि आरक्षण को लेकर उसकी नीति क्या है. लालू प्रसाद और नीतीश इस मुद्दे को लपक चुके थे. मोदी ने जब तक जान की बाजी लगाने की बात की तब तक देरी हो चुकी थी. लोग इस बात के लिए भी आश्वस्त नहीं थे कि मोदी ज्यादा ताकतवर हैं या भागवत.''

दिलीप कहते हैं कि आरक्षण के लेकर हुई प्रतिकूल बयानबाजी की वजह से बीजेपी जिन सामाजिक शक्तियों को जो़ड़कर विजयी समीकरण बनाना चाहती थी, उनके प्रतिनिधि नेताओं की साख अपने जनाधार में खत्म हो गई. इसी दौरान हरियाणा में दो बच्चों की जलाकर की गई हत्या पर केंद्रीय मंत्री जनरल वीके सिंह का कुत्ता वाला बयान आया. पीएम मोदी ने उनके खिलाफ कोई कार्रवाई नहीं की, जबकि मांझी जी ने इसकी मांग भी की थी. इस तरह वे सारे नेता बेअसर हो गए, जिनके बूते बीजेपी चुनाव जीतने चली थी.

पासवान के कुनबे का सूफड़ा साफ

रामविलास पासवान की लोक जनशक्ति पार्टी (लोजपा) को इस चुनाव में दो सीटें मिली है. खास बात यह है कि उनकी पार्टी ने दस आरक्षितों सीटों पर उम्मीदवार उतारे थे लेकिन पासवान का करिश्मा नहीं चला. पार्टी सभी दस सीटों पर हार गई. साथ ही बिहार की चुनावी राजनीति में रामविलास शुरु से अपने परिवार वालों जिताते आ रहे हैं. लेकिन इस बार उनके छोटे भाई पशुपति पारस भी अलौली सुरक्षित सीट पर राजद उम्मीदवार से करीब 25 हजार मतों से हार गए.

इसके अलावा रामविलास के भतीजे प्रिंस राज, दामाद अनिल कुमार और बहू सविता पासवान को भी हार का मुंह देखना पड़ा. जबकि डेढ़ साल पहले ही लोकसभा चुनाव में पासवान की पार्टी ने छह सीटें जीती थी और 34 विधानसभा सीटों पर आगे रही थी. पार्टी को लोकसभा चुनाव में करीब 6.5 फीसदी वोट मिले थे और इस विधानसभा चुनाव में 4.8 फीसदी वोट मिले है.

लोजपा की इस करारी हार पर पटना के स्थानीय पत्रकार ज्ञानेश्वर कहते हैं कि रामविलास पासवान ने सीटों के बंटवारे में सिर्फ अपने परिवार का ध्यान रखा. आरक्षित सीटों में सिर्फ एक निर्दलीय उम्मीदवार को जीत मिली है. बोचहां आरक्षित सीट पर पहले लोजपा ने बेबी कुमारी को टिकट दिया था.

अंतिम समय में अपने बागी दामाद अनिल कुमार साधू के लिए बेबी का टिकट काट दिया गया. जिसके बाद बेबी निर्दलीय उम्मीदवार के तौर पर उतरीं और उन्होंने जेडीयू के रमई राम को करीब 24 हजार मतों से हराया. यहां लोजपा प्रत्याशी और पासवान के दामाद अनिल चौथे नंबर पर रहे. और उन्हें मात्र 7383 वोट मिले.

बेअसरदार रहे मांझी

ऐसा ही कुछ हाल जीतन राम मांझी का हुआ. जब से उन्हें जनता दल यूनाइटेड ने बिहार के मुख्यमंत्री पद से हटाया, कयास लगाए जा रहे थे कि वह महागठबंधन को नुकसान पहुंचाने की स्थिति में है. मांझी की पार्टी 'हम' ने 20 सीटों पर चुनाव लड़ा था. महागठबंधन की लहर में मांझी सिर्फ खुद अपनी इमामगंज की सीट बचा पाए.

पार्टी के सभी उम्मीदवारों को हार का सामना करना पड़ा. मांझी ने मखदूमपुर से भी चुनाव लड़ा था जहां उन्हें आरजेडी के उम्मीदवार ने करीब 27 हजार मतों से हराया. इसके अलावा मांझी के बेटे संतोष कुमार सुमन को भी कुंटुबा विधानसभा सीट पर कांग्रेस उम्मीदवार ने करीब 10 हजार वोटों से हराया.

बिहार के रहने वाले सीनियर जर्नलिस्ट सुरेंद्र किशोर मांझी कार्ड नहीं चलने का कारण बताते हैं कि सरसंघचालक मोहन भागवत ने आरक्षण पर सवाल उठाकर दलितों को एनडीए से नाराज कर दिया. लोगों ने सोचा कि एनडीए में शामिल सभी लोग आरक्षण के खिलाफ है. लोगों के मन में सवाल उठा कि आरक्षण पर सवाल उठाने वालों के साथ जीतनराम मांझी, उपेंद्र कुशवाहा और रामविलास जैसे नेता क्या कर रहे हैं. इसलिए बीजेपी से ज्यादा इन दलों को भारी नुकसान हुआ.

मात्र 5 सीटों पर सिमट गई पासवान-कुशवाहा-मांझी की तिकड़ी


केंद्रीय मंत्री उपेंद्र कुशवाहा की पार्टी राष्ट्रीय लोक समता पार्टी 23 सीटों पर लड़ी थी. उनकी पार्टी को मात्र दो सीटें मिली. जबकि लोकसभा चुनाव 2014 में उनकी पार्टी ने तीन सीटों पर चुनाव लड़ा और तीनों सीटों पर विजयी रही थी. इन तीनों दलों ने 84 सीटों पर अपने उम्मीदवार उतारे थे जिसमें इनके मात्र 5 उम्मीदवार ही जीत हासिल कर सके. कुशवाहा, मांझी और पासवान के अलावा आरक्षित सीटों पर बीजेपी का भी बुरा हाल रहा.

बीजेपी के 17 उम्मीदवारों की हार हुई है जबकि उसके मात्र 5 उम्मीदवार जीतने में सफल रहे है. बीजेपी से बढ़िया प्रदर्शन कांग्रेस ने किया है. कांग्रेस को छह सीटों पर जीत मिली है. लालू एक बार फिर बिहार में दलितों के नेता साबित हुए. उनकी पार्टी राजद ने 14 जबकि जेडीयू ने 11 सीटों पर जीत हासिल की.

दूसरी ओर कई आरक्षित सीटों पर महागठबंधन के उम्मीदवारों के जीत का अंतर काफी बड़ा रहा. आरक्षित 14 सीटों पर महागठबंधन के उम्मीदवारों का जीत का अंतर 20 हजार वोटों से ज्यादा है. वहीं आरक्षित सीटों पर हारने वाले महागठबंधन के उम्मीदवार कम वोट से पीछे रह गए.

जगजीवन राम संसदीय अध्ययन एवं राजनीतिक शोध संस्थान के निदेशक श्रीकांत इसका कारण बताते हैं कि मोदी लहर में भी 2014 के चुनाव में 148 सीटें ऐसी थी जहां जेडीयू-राजद कवोट जोड़ देने से महागठबंधन के उम्मीदवार जीत जाते. लालू-नीतीश के मिलने से महागठबंधन का आधार वोट बहुत मजबूत हो गया. जातीय ध्रुवीकरण इतन तेज हु कि एनडीए का कोई कार्ड नहीं चल पाया. इसी वजह से कुशवाहा जाति के लोगों ने भी उपेंद्र कुशवाह को वोट नहीं दिया. वैसे यह सच है कि एनडीए कआधार वोट शुरू से महागठबंधन से कम था.

राजनीतिक विश्लेषकों की राय साफ है कि बीजेपी को उसके सहयोगी दलों से ज्यादा मदद नहीं मिली.जिसका नतीजा ये हुआ कि बीजेपी सीटों की संख्या के हिसाब एक दशक पहले वाली स्थिति में पहुंच गई है. चुनाव नतीजों के बाद से बीजेपी के सहयोगी नेता तो अपने भविष्य की चिंता कर रहे होंगे लेकिन नरेंद्र मोदी और अमित शाह की टीम की फौरी मुश्किल बिहार में मिली करारी हार के बाद पार्टी के अंदर उठ रहे विरोधों की आवाजों से निपटना है.

First published: 17 November 2015, 7:29 IST
 
निखिल कुमार वर्मा @nikhilbhusan

निखिल बिहार के कटिहार जिले के रहने वाले हैं. राजनीति और खेल पत्रकारिता की गहरी समझ रखते हैं. बनारस हिंदू विश्वविद्यालय से हिंदी में ग्रेजुएट और आईआईएमसी दिल्ली से पत्रकारिता में पीजी डिप्लोमा हैं. हिंदी पट्टी के जनआंदोलनों से भी जुड़े रहे हैं. मनमौजी और घुमक्कड़ स्वभाव के निखिल बेहतरीन खाना बनाने के भी शौकीन हैं.

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