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क्या भारत को इस्लामिक स्टेट से डरने या सतर्क रहने का वक्त आ गया है?

सुहास मुंशी | Updated on: 2 February 2016, 22:31 IST
QUICK PILL
  • शुक्रवार को एनआईए तीन भारतीयों को आईएस से जुड़े होने के संदेह में यूएई से गिरफ्तार करके भारत लाया. पिछले हफ्ते एनआईए ने भारत में 14 भारतीयों को आईएस से जुड़े होने के संदेह में गिरफ्तार किया था.
  • सुरक्षा विशेषज्ञ मानते हैं कि आतंकी संगठन आईएस दक्षिण एशिया में पैर फैलाना चाहता है. विशेषज्ञों के अनुसार आईस का मुकाबला बंदूक के बल पर करना संभव नहीं है. इसके लिए शिक्षा और रोजगार जैसे सामाजिक विकास पर ध्यान देना होगा.

शुक्रवार को तीन भारतीयों को इस्लामिक स्टेट (आईएस) के लिए काम करने के आरोप में संयुक्त अरब अमीरात (यूएई) से गिरफ्तार करके भारत लाया गया. उन्हें नेशनल इन्वेस्टिगेशन एजेंसी (एनआईए) ने गिरफ्तार किया. तीनों अभियुक्तों पर क्या आरोप है ये अभी स्पष्ट नहीं है.

ये पहली बार नहीं हो रहा है कि भारतीय सुरक्षा एजेंसियों ने देश से बाहर कार्रवाई की है. पिछले साल भी यूएई से पांच भारतीयों (चार पुरुष और एक महिला) को भारत लाया गया था.

इन गिरफ्तारियों के बाद ये सवाल भी उठने लगा है कि क्या भारत इस्लामिक स्टेट के प्रभाव का पूरा अनुमान नहीं लगा सका था.

नौसेना के पूर्व प्रमुख और फ़ोरम फॉर स्ट्रैटेजिक एंड सिक्योरिटी स्टडीज़ के प्रमुख केके नैय्यर कहते हैं, "हमारा शुरुआती अनुमान पूरी तरह गलत रहा. मैंने हमेशा ही इस्लामिक स्टेट के संभावित खतरे की बात उठायी है. ये धीरे धीरे हमारे देश में घुसा और लगता है कि अब इसने जड़ें जमा ली हैं."

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सेंट्र फॉर सिक्योरिटी एंड स्ट्रैटजी इंडिया फाउंडेशन के निदेशक और सुरक्षा विशेषज्ञ आलोक बंसल भी नैय्यर से सहमत हैं.

बंसल कहते हैं, "विशेषज्ञ पूरी तरह गलत थे. भारत में आईएस के प्रभाव का पूरा आकलन नहीं किया जा सका था. इसका प्रभाव भारत में खतरनाक तेजी से फैल सकता है. हमें इसका मुकाबला करने के लिए बहुत कुछ करना होगा."

पिछले हफ्ते सुरक्षा एजेंसियों ने इस्लामिक स्टेट से जुड़े होने के संदेह में 14 लोगों को गिरफ्तार किया है

हाल ही तक भारत में माना जा रहा था कि इस्लामिक स्टेट का प्रभाव नगण्य है. माना जा रहा था कि इस आतंकी समूह से कुछ लोगों को सहानुभूति हो सकती है लेकिन उनमें से गिने-चुने लोगों ने ही इस्लामिक स्टेट से जुड़ने का प्रयास किया.

माना जा रहा था कि ईरान, इराक़ या सीरिया में जाकर लड़ने वाले भारतीयों की संख्या दो दर्जन से भी कम है. अगर ट्यूनीशिया, सऊदी अरब, मोरक्को, फ्रांस, रूस, फिनलैंड, आयरलैंड, बेल्जियम, डेनमार्क और ऑस्ट्रेलिया से इस्लामिक स्टेट से जुड़ने वालों की संख्या से तुलना की जाए तो आईएस से जुड़ने वाले भारतीयों की संख्या बहुत ही कम है.

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एनआईए भारत में इस्लामिक स्टेट के प्रभाव को रोकने में बहुत सक्रिय भूमिका निभा रहा है. भारतीय खुफिया एजेंसियां इस समूह से जुड़ी गतिविधियों पर बारीक नज़र रखे हुए हैं.

जांच एजेंसियां संदिग्धों की गिरफ्तारी से बच रही हैं क्योंकि इससे इस्लामी कट्टरपंथियों के प्रति सहानुभूति पैदा होने की आशंका है.

सुरक्षा एजेंसियों को जब इस बात का सुराग मिलता है कि कोई नौजवान किसी तरह से किसी चरमपंथी समूह के संपर्क या प्रभाव में रहा है तो तुरंत उनके परिवार या सामुदायिक नेताओं को सूचित किया जाता है. ये रणनीति अब तक काफी कारगर रही है.

एक वरिष्ठ खुफिया अधिकारी ने नाम न जाहिर करने की शर्त पर बताया, "आईएस अपने विभिन्न रूपों में बस एक मौके की तलाश कर रहा है. एक सफल हमला उनके समर्थकों को प्रेरित करने के लिए काफी होगा. इससे ज्यादा लोग उनकी तरफ आकर्षित होंगे. भारतीय सुरक्षा एजेंसियां इसे ही रोकने की कोशिश कर रही हैं."

एजेंसियां संदिग्धों की गिरफ्तारी से बच रही हैं क्योंकि इस्लामी कट्टरपंथियों के प्रति सहानुभूति पैदा होने की आशंका है

पिछले एक साल में भारत के सभी राज्यों के पुलिस प्रमुख और सुरक्षा एजेंसियों के प्रमुख दो बार से अधिक बैठक कर चुके हैं. इन बैठकों का नेतृत्व भारत के सुरक्षा सलाहकार अजीत डोभाल ने किया. ये बैठकें आईएस के खिलाफ रणनीति पर चर्चा करने के लिए बुलायी गई थीं.

माना जा रहा है कि आईएस के समर्थक अब ज्यादा होशियारी से अपना प्रसार कर रहे हैं. कुछ बांग्लादेशी आतंकी समूहों के अलावा भारत में प्रतिबंधित कुछ आतंकी समूह भी उनकी मदद कर रहे हैं.

पिछले हफ्ते भारत में आईएस के कथित 14 समर्थकों की गिरफ्तारी हुई. सुरक्षा एजेंसियां ने दावा किया है कि गिरफ्तार लोगों के पास से पठन सामग्री, नक्शे और विस्फोटक पदार्थ बरामद हुए.

एजेंसियों का दावा है कि इन लोगों ने एक संगठन भी बना लिया है जिसमें अमीर (प्रमुख) और अन्य पद भी हैं. सुरक्षा विशेषज्ञ मानते हैं कि सुनने में ये संख्या भले कम लगे लेकिन इसकी अनदेखी नहीं करनी चाहिए.

आईएस भारत के बारे में क्या सोचता है?


आईएस की पत्रिका 'दबिक़' ने नवंबर, 2015 में 'इस्लामिक स्टेट का काला परचम' नाम से अंक निकाला था. इस अंक में पूरी दुनिया में इस्लाम के दुश्मनों की चर्चा करते हुए कहा था, "भारत के राष्ट्रपति (नरेंद्र मोदी) दक्षिणपंथी हिंदू राष्ट्रवादी हैं, जो शस्त्रों की पूजा करते हैं. वो अपने लोगों को मुसलमानों के खिलाफ युद्ध के लिए तैयार कर रहे हैं."

पत्रिका में ये भी कहा गया था कि "भारत में एक मुहिम चल रही है जिसमें बीफ़ खाने वाले मुसलमानों को मारा जा रहा है. इन संगठनों को पैसा देने वाले लोग चाहते हैं कि इस्लाम से नफरत करने वालों की संख्या बढ़े ताकि वो अपने देशों में भविष्य में होने वाली लड़ाइयों में इन लोगों का इस्तेमाल कर सकें."

दबिक़ में ये भी कहा गया था कि आईएस भारत में विस्तार करना चाहता है. पत्रिका के जनवरी अंक में आईएस के खोरसान के अमीर का एक इंटरव्यू छपा जिसमें भारत का जिक्र 'गोपूजकों के देश' के रूप में किया गया है. आईएस नेता ने कहा है कि भारत खासकर कश्मीर में अपनी पहुंच बढ़ाने के लिए संगठन ने खास योजना बना रखी है.

सुरक्षा विशेषज्ञों के अनुसार आतंकियों के मुकाबला के लिए गोली से ज्यादा कारगर शिक्षा और रोजगार को बढ़ावा देना होगा

अभी कश्मीर में आईएस की मौजूदगी का कोई सुराग नहीं मिला है लेकिन विदेशी कट्टरपंथियों के लिए घाटी हमेशा से आसान निशाना रही है. अभी तक आईएस से जुड़ी जितनी भी गिरफ्तारियां हुई हैं उनमें से ज्यादातर कर्नाटक, तेलंगाना, उत्तर प्रदेश और महाराष्ट्र में हुई हैं.

रिसर्च एंड एनालिसिस विंग (रॉ) के पूर्व प्रमुख एएस दुलत कहते हैं, "कश्मीर में आईएस के लिए कोई जगह नहीं है क्योंकि खुद अमीर-ए-जिहाद (सैयद अली शाह गिलानी) ने आईएस को गैर-इस्लामिक घोषित किया है."

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दुलत कहते हैं, "आईएस से बंदूक से नहीं बल्कि शिक्षा, रोजगार जैसे चीजों की मदद से सामाजिक स्तर पर भी लड़ना होगा."

दुलत कहते हैं, "मुझे लगता है कि हमें एनआईए की जांच के अंतिम नतीजे आने तक इंतजार करना चाहिए. मेरी नजर में अभी ये बड़ी समस्या नहीं है."

भारत की पूर्व उप राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार लीला के पोनप्पा कहती है कि हमें आतंकी संगठनों के नाम को लेकर चिंता नहीं करनी चाहिए. वो कहती हैं, "तालिबान, आईएस या दूसरे आतंकी गिरोहों के बीच फर्क करना गलत है. आखिरकार इन सबका मक़सद एक है. आप ये नहीं कह सकते कि आज जो तालिबान है कल वो आईएस में नहीं चला जाएगा. हमें ऐसे संगठनों के खतरे के प्रति आगाह रहना होगा. जब तक आईएस यहां आ न जाए तब तक हम हाथ पर हाथ धरे नहीं रह सकते. हो सकता है कि कल या परसों हम गलत साबित हो जाएं."

समस्या कितनी गहरी है?


सुरक्षा विशेषज्ञों के अनुसार आईएस का मुकाबला करने का सबसे कारगर तरीका है सामाजिक जागरूकता और नागरिक आधिकारों का समान वितरण. ऐसी समस्या को सेना या पुलिस के सहारे पूरी तरह हल नहीं किया जा सकता.

सीबीआई के पूर्व प्रमुख जोगिंदर सिंह कहते हैं, "आईएस दुष्प्रचार के सहारे लड़ रहा है. वो मुस्लिम युवाओं से कहता है कि हिंदु उन्हें डरा रहे हैं और अंततोगत्वा वो उन्हें मार देंगे. हमें इन युवाओं को एकता का संदेश देना होगा. हमें उन्हें ये समझाना होगा कि इस देश के विकास के लिए हिंदू और मुस्लिम मिलकर काम कर रहे हैं, खास तौर पर सुरक्षा के क्षेत्र में. हमें इस मुद्दे पर राजनीतिक एकजुटता दिखानी होगी."

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नैय्यर भी इस बात से सहमत हैं. वो कहते हैं, "हम आईएस से केवल बंदूक से नहीं लड़ सकते. इससे सामाजिक स्तर भी लड़ना होगा. हमें लोगों को बताना होगा कि वो कैसे काम करते हैं. हमें लोगों को अच्छी नौकरी और अच्छी शिक्षा देनी होगी. फिर किसी के ज़हन में आतंकी बनने की बाद नहीं आएगी."

आईएस को पिछले कुछ समय में कई झटके लगे हैं. उसके कब्जे वाले कई इलाकों को उनसे मुक्त करा लिया गया है. शायद इसीलिए वो दूसरे इलाकों में विस्तार करना चाहते हैं. अफगानिस्तान में पहले ही कई आतंकी संगठन आईएस का काला झंडा अपना चुके हैं. बांग्लादेश में हुए ब्लॉगरों की हत्या की जिम्मेदारी भी कथित तौर पर आईएस से जुड़े संगठनों ने ली है.

ऐसे में किसी निष्कर्ष पर पहुंचने के बजाय एनआई की जांच के नतीजों का इंतजार करना ही सही रहेगा.

First published: 2 February 2016, 22:31 IST
 
सुहास मुंशी @suhasmunshi

He hasn't been to journalism school, as evident by his refusal to end articles with 'ENDS' or 'EOM'. Principal correspondent at Catch, Suhas studied engineering and wrote code for a living before moving to writing mystery-shrouded-pall-of-gloom crime stories. On being accepted as an intern at Livemint in 2010, he etched PRESS onto his scooter. Some more bylines followed in Hindustan Times, Times of India and Mail Today.

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