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कितना बड़ा नुकसान है रोहित की मौत संघ के दलित एजेंडे के लिए?

अभिषेक पराशर | Updated on: 29 January 2016, 16:38 IST
QUICK PILL
  • रोहित वेमुला की खुदकुशी के बाद दलित छात्रों और संगठनों की गोलबंदी से राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ का आंबेडकर मिशन खतरे में पड़ गया है. बीते एक साल के दौरान जिस आक्रामकता के साथ संघ और भाजपा अपनी दलित राजनीति को आगे बढ़ा रहे थे, रोहित की मौत ने उस पर ब्रेक लगा दिया है.
  • बिहार चुनाव में संघ प्रमुख मोहन भागवत का आरक्षण पर दिया गया बयान पार्टी को पहले ही बहुत भारी पड़ चुका है. रोहित की मौत में संघ के आनुषंगिक संगठन एबीवीपी की भूमिका के मद्देनजर भाजपा और संघ दोनों में बेचैनी है.

दलितों के बीच अपनी पकड़ और स्वीकार्यता को मजबूत करने की दिशा में संघ पिछले एक साल से गंभीर है. इस दिशा में काम करते हुए संघ के अवध प्रांत के प्रमुख ने पिछले साल के आखिरी महीनों में अपने स्वयंसेवकों को दलित परिवार के साथ मेल-जोल बढ़ाने, उनके साथ खाने-पीने और कम से कम एक दलित परिवार को गोद लेने की अपील स्वयंसेवकों से की थी.

संघ की यह पहल वैसे समय में सामने आई थी जब कथित तौर पर बिहार चुनाव में आरएसएस प्रमुख मोहन भागवत के बयान से बीजेपी को नुकसान हो चुका था और पार्टी उत्तर प्रदेश के विधानसभा चुनाव के लिए कमर कस रही थी.

संघ ने 11 दिसंबर को इस पहल की घोषणा की जो आरएसएस के तीसरे सरसंघचालक दिवंगत मधुकर दत्तात्रेय देवरस की 100वीं जन्मतिथि थी. आरएसएस के पदाधिकारियों की माने तो देवरस वैसे सरसंघचालक थे जिन्होंने छुआछूत के खिलाफ मुहिम छेड़ी और दलितों को समाज की मुख्यधारा में लाने की पहल शुरू की थी. 

पढ़ें: 'छात्र फांसी पर लटकते रहें, लेकिन सरकार को परवाह नहीं है' 

लेकिन 2016 की शुरुआत आरएसएस के दलित मिशन के लिहाज से सही नहीं रही. हैदराबाद यूनिवर्सिटी में शोध कर रहे दलित छात्र रोहित वेमुला ने खुदकुशी कर ली. इस कदम के पीछे संघ के संगठन अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद  (एबीवीपी) और सिकंदराबाद के सांसद एवं एनडीए सरकार में मंत्री बंडारू दत्तात्रेय का नाम सामने आया. दलित छात्र की आत्महत्या ने तेजी से दलित विमर्श को संघ और भाजपा के खिलाफ गोलबंद किया. इसका प्रत्यक्ष नतीजा जो सामने आ रहा है उसके मुताबिक संघ के दलित एजेंडे को भारी नुकसान हुआ है.

रोहित वेमुला की खुदकुशी के मामले में बंडारू दत्तात्रेय के खिलाफ एससी-एसटी एक्ट के तहत मामला दर्ज हो चुका है

दलित एंटेलिजेंशिया और प्रभावशाली तबके में इसको लेकर बहस फिर से शुरू हो गई है कि संघ और भाजपा चाहे जितना भी दलित प्रेम का प्रदर्शन करें, मूल रूप में वे दलित विरोधी हैं. हैदराबाद युनिवर्सिटी का आंदोलन दिन ब दिन बड़ा होता जा रहा है. अब वहां के दलित शिक्षकों ने भी छात्रों के समर्थन में धरना देना शुरू कर दिया है.

आंबेडकर पेरियार स्टडी सर्किल (आईआईटी-मद्रास) के फाउंडिंग मेंबर रमेश के मुताबिक हैदराबाद विश्वविद्यालय शुरू से ही जातिगत भेदभाव का केंद्र रहा है और रोहित इसके खिलाफ आवाज उठा रहा था. उन्होंने कहा, 'इसमें कोई शक ही नहीं है कि रोहित को दलित होने की सजा मिली. जाति व्यवस्था या हिंदुत्व के खिलाफ आवाज उठाना संघ को जातिवादी या राष्ट्रविरोधी लगता है तो आप समझ सकते हैं कि रोहित किसके खिलाफ खड़ा था और संघ किसके पक्ष में.' 

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संघ के दोहरे रवैये का जिक्र करते हुए दलित चिंतक कंवल भारती कहते हैं कि आरएसएस के सिद्धांत और व्यवहार दो समानांतर धाराएं हैं. उन्होंने कहा, 'राष्ट्रीय स्वंयसेवक संघ आंबेडकर जयंती मनाकर दलितों की हितैषी होने का दावा करती है लेकिन एबीवीपी के उत्पीड़न की वजह से दलित छात्र को आत्महत्या के लिए मजबूर होना पड़ता है. संघ आंबेडकर की विरासत पर दावा करने का दिखावा ही कर सकती है. रोहित वेमुला की खुदकुशी इस दावे की असलियत है.' उन्होंने कहा, 'रोहित वेमुला की खुदकुशी ने संघ के चेहरे को बेनकाब किया है.'

भारती उस माहाैल का जिक्र करते हैं जिसमें एक छात्र के लिए स्थितियां इतनी विषम हो गईं कि उसे खुदकुशी आसान विकल्प लगने लगा. अगर आप इन हालात के पैदा होने की वजहों की पड़ताल करेंगे को तो पाएंगे कि वही संघी-ब्राह्मणवादी विचारधारा काम कर रही थी जो लंबे समय से जाति व्यवस्था की समर्थक रही है. ऐसे लोग जब एक रोहित वेमुला के पीछे पड़ गए तब खुदकुशी उसे जीवन से ज्यादा उचित विकल्प लगा.

भारती कहते हैं, 'वेमुला के लिए यह खुदकुशी हो सकती है लेकिन वास्तव में वह एबीवीपी और भाजपा के दलित विरोधी एजेंडे और दलित पहचान की वजह से मारा गया.' इसकी पुष्टि वेमुला के उस चिट्ठी से की जा सकती है जिसमें उसने विश्वविद्यालय के कुलपति से दलित छात्रों को सोडियम एजाइड और एक रस्सी बांटे जाने की अपील की थी. यह साफ दिख रहा है कि सरकार छात्रों की बजाए विश्वविद्यालय प्रशासन का बचाव कर रही है. 

भारती बताते हैं कि एबीवीपी के देशव्यापी संगठन के मुकाबले आंबेडकर स्टूडेंट्स एसोसिशन की ताकत मामूली है. 'एबीवीपी के सामने आंबेडकर स्टूडेंट्स एसोसिएशन टिक नहीं पा रहा था. यह सीधे-सीधे दलित सशक्तिकरण की मुहिम को दलितों के हाथों में जाने से रोकने की चाल है.'

आरएसएस का कहना है कि वेमुला की मौत के बाद राजनीतिक लाभ लेने के लिए उसकी जाति उछाली जा रही है

इन तमाम अटकलों के बीच रोहित की जाति राजनीति का विषय बनती जा रही है. एक जिंदगी खत्म होने से ज्यादा चिंता उसके दलित, ओबीसी या कुछ और होने पर जताई जा रही है. आरएसएस का कहना है कि है कि राजनीतिक लाभ के मकसद से वेमुला की मौत के बाद उसकी जाति उछाली जा रही है.

लेकिन यह भी उतना ही सच है कि खुद संघ की राजनीतिक शाखा भाजपा के लोग और एचआरडी मंत्री स्मृति ईरानी भी वेमुला की जाति पर प्रेस कॉन्फ्रेंस में बहस करती रहीं. जाहिर है वेमुला की जाति सबके लिए राजनीतिक मुद्दा है.

संघ के अखिल भारतीय प्रचार प्रमुख मनमोहन वैद्य इस विचार पर दृढ़ हैं कि आरएसएस के खिलाफ बोलने की यह परंपरा नई नहीं है. रोहित की मौत पर अफसोस जताते हुए वैद्य ने कहा, 'याकूब मेमन की फांसी का विरोध किए जाने के बाद जब उसने अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद के सुशील कुमार के कमरे में जाकर मारपीट की तब किसी ने उसकी जाति का सवाल क्यों नहीं उठाया.' 

वैद्य आगे बताते हैं, 'मृत्यु के बाद राजनीतिक लाभ उठाने के मकसद से वेमुला की जाति उछाली जा रही है. समाज में ऐसे लोग हैं जो अक्सर जाति आधारित राजनीति कर उसे तोड़ने की कोशिशों में लगे रहते हैं. लेकिन संघ समाज के सभी वर्गों के लोगों को साथ लेकर चलता रहा है और आगे भी चलता रहेगा. 

रमेश इसे मुद्दे को भटकाए जाने की कोशिशों के तौर पर देखते हैं, 'रोहित ने किसी व्यक्ति विशेष का नहीं बल्कि किसी को भी फांसी की सजा का विरोध किया था और विरोध करने का यह अधिकार हमारा संविधान देता है.' वास्तव में वह हिंदुत्व और जातिवाद के खिलाफ लड़ाई लड़ रहा था और यह बात एबीवीपी और उसके संगठनों को पसंद नहीं आ रही थी. 

आंबेडकर विरासत की राजनीति

एबीवीपी के राष्ट्रीय जनरल सेक्रेटरी विनय बिद्रे की माने तो आंबेडकर संघ के लिए नहीं बल्कि एएसए के लोगों के लिए राजनीतिक कार्ड बन गए हैं. उन्होंने कहा, 'आंबेडकर की आड़ में आंबेडकर स्टूडेंट्स एसोसिएशन राष्ट्र विरोधी गतिविधि चला रहा था.'

कंवल भारती के मुताबिक आंबेडकर की विरासत पर दलितों का स्वाभाविक उतराधिकार है. उन्होंने कहा कि दलितों को इस विरासत पर दावा ठोंकने की जरूरत नहीं है. विरासत पर कब्जा करने का काम असल में संघ कर रहा है क्योंकि आंबेडकर उनके लिए बदलती राजनीतिक परिस्थिति की जरूरत हैं. उन्होंने कहा, 'यह अजीब है कि संघ आंबेडकर की बात कर जाविादी नहीं होता लेकिन दलित आंबेडकर की बात कर जातिवादी हो जाता है.' 

आंबेडकर की विरासत पर कब्जे की होड़ में कुछ और सवाल भी खड़े होते हैं मसलन जो भी लोग आज आंबेडकर के जरिए भारी-भरकम दलित वोटों पर नजर गड़ाए हुए हैं उनकी मंशा दलित उत्थान को लेकर कितनी साफ है? भारती कहते हैं, 'अगर आंबेडकर पर संघ की मंशा साफ होती तो वह आंबेडकर जयंती मनाने की बजाए दलितों के सशक्तिकरण की दिशा में काम करता. दलितों के आर्थिक और सामाजिक सशक्तिकरण की बात कोई नहीं कर रहा है. क्या संघ निजी क्षेत्र में दलितों को आरक्षण दिए जाने की मांग कर समर्थन करेगा?'

'संघ आंबेडकर की बात कर जातिवादी नहीं होता लेकिन दलित आंबेडकर की बात कर जातिवादी हो जाते हैं'

हाल के दिनों में संघ ने अपनी विचारधारा में आमूल बदलाव किया है. सामाजिक और आर्थिक अधिकारों की बात आने पर जाति व्यवस्था का विकृत रूप सामने आ जाता है. भाजपा और संघ के बीच यह अहसास गहरे तक है कि दलितों को राजनीतिक रूप से अलग-थलग रखने की वजह से मायावती समेत तमाम दूसरे दलित नेताओं का उदय हुआ. धार्मिक रूप से दलितों को हिंदू धर्म की छतरी के नीचे रखना भी संघ की प्रमुख चिंताओं में से एक है. अतीत में बार-बार दलितों का गैर हिंदू धर्मों में व्यापक स्तर पर धर्म परिवर्तन होने की घटनाएं हुई हैं. आंबे़डकर के बहाने दलितों को किसी तरह हिंदू धर्म व्यवस्था में बनाए रखना भी संघ का प्रमुख एजेंडा है.

भारती कहते हैं कि संघ हर काम आड़ में करने का आदी है. मसलन वह खुद को सांस्कृतिक संगठन बताता है लेकिन मौजूदा सरकार में शक्तिशाली और अहम मंत्रालयों में एबीवीपी और संघ से जुड़े नेताओं का कब्जा है. आखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद बीजेपी का नहीं बल्कि आरएसएस की छात्र ईकाई है. 

अमेरिकी स्कॉलर वाल्टर एंडरसन जो 1970 के दशक से लगातार संघ की गतिविधियों पर नजर रखते रहे हैं, उन्होंने हाल ही में दिए गए एक साक्षात्कार में माना कि संघ तेजी से राजनीतिक संगठन के रूप में तब्दील हुआ है. हालांकि कुछ लोग इस बहस को पहली नजर में ही यह कहकर खारिज करते हैं कि संघ कभी भी सांस्कृतिक संगठन नहीं रहा, वह हमेशा से गहराई तक राजनीति में डूबा संगठन रहा है.

तो क्या वेमुला की खुदकुशी के बाद संघ को दलितों के बीच अपना एजेंडा आगे बढ़ाने में खासा दिक्कतों का सामना करना पड़ेगा.

भारती कहते हैं कि ऐसा नहीं होने का कोई कारण नजर नहीं आता. लेकिन यह इस बात पर निर्भर करता है कि वेमुला की मौत के बाद हुई दलित छात्रों और संगठनों की गोलबंदी किस मजबूती के साथ विश्वद्यिालय परिसर से बाहर निकलकर दलित समुदायों के बीच पहुंचती है. 

दलितों में संघ का बढ़ता असर

दलित युवाओं के बीच संघ का असर तेजी से बढ़ा है. उत्तर प्रदेश में वाल्मीकि समुदाय के 'हिंदुत्व की चपेट में आने' का उदाहरण देते हुए भारती बताते हैं कि भारतीय जनता पार्टी के लिए संघ सांस्कृतिक ईकाई के तौर पर काम करती है और उसे इसका फायदा मिलता है. लेकिन दलित समुदाय में सांस्कृतिक चेतना को लेकर ऐसा कुछ नहीं चल रहा है.

उन्होंने कहा कि दलित आंदोलन के अलगाव में पड़े होने की वजह से संघ दलितों के बीच अपनी पैठ बनाने में सफल हो पा रहा है. फिलहाल यह छोटे बौद्धिक समूह और संगठनों के स्तर पर काम कर रहा है. हालांकि इसके बावजूद छोटे स्तर पर ही सही प्रतिरोध की एक दीवार खड़ी हो गई है और संघ की राह में यह सबसे बड़ी बाधा है. 

First published: 29 January 2016, 16:38 IST
 
अभिषेक पराशर @abhishekiimc

चीफ़ सब-एडिटर, कैच हिंदी. पीटीआई, बिज़नेस स्टैंडर्ड और इकॉनॉमिक टाइम्स में काम कर चुके हैं.

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