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गांधी के हत्यारोपियों के भूत में संजीवनी ढूंढ़ते मोहन भागवत

चारू कार्तिकेय | Updated on: 10 February 2017, 9:23 IST

मध्यप्रदेश के बैतूल में हर साल एक "भूतों का मेला" लगता है, जिसमें हजारों लोग किसी न किसी मानसिक तनाव से पीड़ित अपने प्रियजनों के "भूत-प्रेत झड़वाने" के लिए जुटते हैं. पिछले दिनों आरएसएस प्रमुख मोहन भागवत भी बैतूल पहुंचे थे, पर उनकी यात्रा का प्रयोजन किसी काली छाया को झड़वाना नहीं था. भागवत दो दिनों तक बैतूल में रहे और क्षेत्र में एक ऐसे स्थल की उन्होंने यात्रा की जिस से एक अलग प्रकार के भूत के दोबारा से सिर उठाने की संभावना खड़ी हो रही है.

गोलवलकर को महात्मा गांधी की हत्या के आरोप में बेतुल जेल में तीन महीने तक कैद करके रखा गया था

भागवत बैतूल में एक हिंदू सम्मेलन में भाग लेने के लिए आए हुए थे. अपने बैतूल प्रवास के दौरान उन्होंने बैतूल जेल की भी यात्रा की. भागवत की यह बैतूल जेल यात्रा आरएसएस के दूसरे सरसंघचालक एमएस गोलवलकर उर्फ गुरूजी को श्रद्धांजलि देने के लिए थी.

गोलवलकर ने 1949 में इस जेल में तीन माह बिताए थे. गोलवलकर को महात्मा गांधी की हत्या के आरोप में इस जेल में बंद किया गया था. इस दौरान आरएसएस के ऊपर प्रतिबंध लगा हुआ था. भागवत ने बैतूल जेल की बैरक नंबर एक में रखी गई गोलवलकर की पुष्पमालाओं से सजी-धजी तस्वीर पर श्रद्धासुमन अर्पित किए.

जानकारी के मुताबिक गोलवलकर की इस तस्वीर के सामने एक दीप भी जलाया गया था तथा साथ में कुछ हिंदू देवी-देवताओं की तस्वीरें भी रखी हुई थीं.

सोशल मीडिया पर उपलब्ध कुछ तस्वीरों से यह भी प्रतीत होता है कि जेल की दीवार पर गोलवलकर की तस्वीर के नीचे अस्थाई रूप से एक उद्धरण लेख भी लगाया गया था. इस पूरे कार्यक्रम के दौरान मौजूद जेल अधिकारियों की तस्वीरों से स्प्ष्ट है कि इस कार्यक्रम को प्रशासन का पूरा सहयोग मिला हुआ था.

कार्यक्रम के निहितार्थ

आरएसएस के कुछेक पूज्य महापुरुषों में गोलवलकर का स्थान विशिष्ट है. आरएसएस आज जिस सांगठनिक ढांचे के भीतर काम करता है, जिस रूप और विचारधारा पर आज आगे बढ़ रहा है उसमें काफी कुछ योगदान गोलवलकर का है.

"बंच आॅफ थॉट्स" तथा "वी आॅन अवर नेशनहुड डिफाइन्ड" नामक पुस्तकों में मौजूद गोलवलकर के लेखों के संग्रह अत्यंत विवादित दस्तावेज रहे हैं पर जो लोग आरएसएस के असली स्वरूप को समझना चाहते हैं, इसका अनुसरण करना चाहते हैं, उनके लिए इसमें जरूरी दिशा-निर्देश भी मौजूद हैं.

आरएसएस से यह उम्मीद नहीं की जा सकती कि वह उनसे अथवा उनके विचारों से दूरी बनाए और न ही आरएसएस के पदाधिकारियों को उनका आदर करने और कार्यक्रम आयोजित करने से रोका जा सकता है. लेकिन गोलवलकर के सम्मान में कहीं भी कार्यक्रम करना और बैतूल जेल में जाकर उनको श्रद्धांजलि देने में बुनियादी फर्क है.

दरअसल भागवत ने गोलवलकर के उस कुकृत्य को सम्मानित किया है जिसके आरोप में उन्हें जेल में बंद किया गया था

भागवत ने जो किया उसमें बैतूल जेल की उस बैरक को स्मारक में बदल दिया गया जहां कि उन्हें बंद किया गया था. इस तरह से दरअसल गोलवलकर के उस कुकृत्य को सम्मानित किया गया है जिसके आरोप में उन्हें जेल में बंद किया गया था.

गोलवलकर किसी स्वतंत्रता संग्राम सेनानी के रूप में उस जेल में बंद नहीं थे. वे बीसवीं सदी के सबसे महान भारतीय, जिसकी आभा से पूरी दुनिया चमत्कृत थी, उसकी हत्या के आरोप में इस जेल में बंद थे.

गोलवलकर ने उस दर्जे का भी काम नहीं किया था जिस काम के लिए अंडमान की सेलुलर जेल में वीडी सावरकर को बंद किया गया था. सेलुलर जेल में सावरकर का स्मारक है जहां पर उनके अनुयायी ब्रिटिश राज के खिलाफ उनकी बगावत को सम्मान देने जाते हैं.

सावरकर का विवादित अतीत छोड़ भी दें तब भी, भागवत ने बैतूल की जेल में जाकर जो काम किया है उससे गोलवलकर को एक सर्वस्वीकार्य आदर्श रूप में स्थापित करने की कोशिश माना जाना चाहिए. अपने दायरे में भागवत गोलवलकर को चाहे जितना सम्मान दें, पर सरकारी मशीनरी और सत्ता का इस्तेमाल करके गांधी की हत्या के आरोपी को स्वीकार्य जननेता के तोर पर स्थापित करने की कोशिश ऐसे है जैसे अपराधी को प्रेरक के रूप में पेश किया जाय.

गांधी की हत्या अब भी एक अबूझ पहेली बनी हुई है, पर इस बात के व्यापक प्रमाण मौजूद हैं जो यह बताते हैं कि इस षड्यंत्र के पीछे कौन से लोग रहे थे, किस विचार के लोग थे. भागवत के इस कृत्य से गांधी की हत्या और जिन मूल्यों के लिए गांधी जिए उस पर फिर से एक काली प्रेत छाया खींच दी गई है.

राजनीतिक द्वंद्व

यह विडंबना है कि बैतूल की यह यात्रा जिस दिन संपन्न हुई उसी दिन प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी राज्यसभा में अपने भाषण में अपनी सरकार के समर्थन में बोलते हुए गांधी के जयकारे लगा रहे थे. वो बार-बार गांधी उनके स्वच्छता प्रेम और आदर्शों की दुहाई दे रहे थे.

क्या यह सोची-समझी रणनीति के तहत हो रहा है? एक तरफ आरएसएस के सबसे शीर्ष स्वंयसेवक देश की संसद में राष्ट्रपिता का गौरव गान करते हैं और दूसरी इसी संगठन के प्रमुख दूसरी जगह पर उस व्यक्ति का महिमामंडन कर रहे हैं जो राष्ट्रपिता की हत्या का आरोपी है.

इस पूरे घटनाक्रम से आरएसएस की एक साथ दो संदेश देने की कला को पूर्ण निपुणता के साथ देखा जा सकता है. एक तरह अपनी विचारधारा के लोगों को स्पष्ट संदेश देना तो दूसरी तरफ अन्य लोगों के समक्ष एक दूसरा मुखौटा पेश करना.

मसलन दलितों के साथ दिखने के लिए दलित बस्तियों में भोज करना और जयपुर लिटफेस्ट में आरक्षण खत्म करने का बयान देना भी संघ की इसी निपुणता का नमूना है.

बैतूल शहर इस विडंबना का मूकदर्शक है जहां एक बार फिर से एक नए भूत को जिंदा करने की कोशिश भागवत कर रहे हैं.

First published: 10 February 2017, 9:23 IST
 
चारू कार्तिकेय @CharuKeya

Assistant Editor at Catch, Charu enjoys covering politics and uncovering politicians. Of nine years in journalism, he spent six happily covering Parliament and parliamentarians at Lok Sabha TV and the other three as news anchor at Doordarshan News. A Royal Enfield enthusiast, he dreams of having enough time to roar away towards Ladakh, but for the moment the only miles he's covering are the 20-km stretch between home and work.

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