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राहुल गांधी के कितने काम के हैं बुजुर्ग कांग्रेसी नेता?

भारत भूषण | Updated on: 10 February 2017, 1:49 IST
(कैच)
QUICK PILL
  • राहुल गांधी जल्द ही कांग्रेस के अध्यक्ष बन जाएंगे. साथ ही वो पार्टी के वरिष्ठ नेताओं का एक सलाहकार मंडल बनाएंगे जो उनकी मां के निर्देशन में काम करेगा.
  • कांग्रेस के अंदर संवाद के सभी मंच निष्क्रिय हो गए. 1998 में जब से सोनिया गांधी ने पार्टी की कमान संभाली है कांग्रेस वर्किंग कमिटी (सीडब्ल्यूसी) की बैठक महज खानापूर्ति बन चुकी है.

खबर है कि राहुल गांधी आखिरकार कांग्रेस के अध्यक्ष बनने जा रहे हैं. साथ ही वो पार्टी के वरिष्ठ नेताओं का एक सलाहकार मंडल बनाएंगे जो उनकी मां के निर्देशन में काम करेगा.

ऐसे में ये सवाल उठ रहा है क्या राहुल इन नेताओं को नरेंद्र मोदी की तर्ज पर किनारे करने के लिए ये कदम उठा रहे हैं या वो सचमुच उनकी सलाह लेंगे?

एक सवाल ये भी है कि ये नेता आखिर कितने काम के साबित होंगे? सोनिया गांधी के कथित सलाहकार कहे जाने वाले ज्यादातर कांग्रेसी नेता जमीनी राजनीति में विफल माने जाते हैं. उनमें से ज्यादातर संसद राज्यसभा के रास्ते पहुंचे हैं.

बदलाव जरूरी है, कांग्रेस के पास अब वक्त नहीं है

इन सलाहकारों की काबिलियत का पता सोनिया गांधी द्वारा पिछले कुछ सालों में लिए गए फैसलों से भी चलता है.

सोनिया के कार्यकाल में पार्टी का कामकाज इतना केंद्रीयकृत हो गया कि हर कोई ऊपर से आदेश आने का इंतजार करता नजर आता है. कोई भी उनसे असहमति नहीं जताता. हर कोई ये अटकल लगाने की कोशिश में लगा रहता है कि वो चाहती क्या हैं?

सांगठनिक ढांचा

कांग्रेस के अंदर संवाद के सभी मंच निष्क्रिय हो गए. 1998 में जब से सोनिया गांधी ने पार्टी की कमान संभाली है कांग्रेस वर्किंग कमिटी (सीडब्ल्यूसी) की बैठक महज खानापूर्ति बन चुकी है. यूपीए जब सत्ता में थी तो सीडब्ल्यूसी की बैठक आलाकमान के फैसले पर मुहर लगाने के लिए ही हुआ करती थी.

सीडब्ल्यूसी की कई बैठकों में इतने लोग निमंत्रित कर लिए गए कि कोई सार्थक बातचीत ही नहीं हो सकी. वहीं पिछले दो साल में सीडब्ल्यूसी की कोई भी बैठक हुई ही नहीं है.

पहले ऑल इंडिया कांग्रेस कमेटी (एआईसीसी) की बैठक साल में दो बार हुआ करती थी. अब ये कभी कभार ही होती है.

पंजाब: जमीनी बदलाव को व्याकुल कांग्रेस

इसी तरह प्रदेश कांग्रेस कमेटी (पीसीसी) की बैठक भी शायद ही कभी होती है. जिला कांग्रेस कमेटी से संवाद का रास्ता भी लगभग बंद हो चुका है. ये सभी संस्थाएं हाथी के दिखाने का दांत बनकर रह गई हैं.

कांग्रेस का सांगठनिक ढांचा सोनिया की सलाहकारों की छत्रछाया में ही जर्जर होता गया. नतीजतन, पार्टी के अंदर किसी तरह की बहस या असहमति को जगह देने के लिए कोई मंच नहीं बचा.

सोनिया ने अपने करीब 'जी-हुजुर' कहने वालों को इकट्ठा कर लिया जिसका नतीजा ये हुआ कि 'आलोचक' उनसे दूर चले गए. जबकि किसी राजनीतिक दल के विकास के में आलोचकों की अहम भूमिका मानी जाती है.

रिकॉर्ड कार्यकाल के मायने

सोनिया गांधी कांग्रेस की रिकॉर्ड 18 साल तक अध्यक्षा रही हैं. इसका दो ही अर्थ है- या तो वो बहुत ही काबिल हैं या फिर पार्टी में कोई भारी गड़बड़ है.

ऐसे में जब राहुल गांधी उन्हीं लोगों से पार्टी में नई जान फूंकने के लिए उन्हीं लोगों से राय लेना चाहते हैं जिनकी वजह से पार्टी की जान निकली है तो उनके सामने क्या विकल्प हैं?

नरेंद्र मोदी सरकार आर्थिक रूप से संपन्न वर्ग और बहुसंख्यकों के तुष्टिकरण की नीति पर चलती है

जब पार्टी मुश्किल दौर से गुजर रही है तो इन नेताओं को पूरी तरह किनारे कर देना अक्लमंदी नहीं होगी. उनके लंबे राजनीतिक अनुुभव का लाभ पार्टी को मिल सकता है. 

इन नेताओं के पास ऐसे मुश्किल दौर से गुजरने का संचित अनुभव है जिसकी आज कांग्रेस को सख्त जरूरत है. अब ये पार्टी पर निर्भर है कि वो इसका लाभ उठा पाती है या नहीं.

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राहुल गांधी को ये समझना होगा कि नरेंद्र मोदी की राजनीति का विरोध आज संसद में कम और बाहर ज्यादा हो रहा है. मोदी की राजनीति का प्रतिपक्ष संसदीय पार्टियों से ज्यादा स्वतंत्र व्यक्ति, समूह और संगठन हैं जो दो मोर्चों पर एक साथ संघर्ष कर रहे हैं.

वो मोदी की आर्थिक नीति की आलोचना के साथ-साथ ही मोदी सरकार के हिंदुत्ववाद एजेंडे की मुखालफत कर रहे हैं.

मोदी की आर्थिक नीति कामगारों की कीमत पर मुनाफा बढाने वाली है. वो कृषि क्षेत्र की उपेक्षा कर रहे हैं. उनकी नीति में विकास के लिए पर्यावरण को होने वाले नुकसान की चिंता नहीं. 

दलितों, आदिवासियों, प्रवासी मजदूरों, पर्यावरण की वजह से विस्थापितों होने वालों और असंगठित क्षेत्रों के कामगारों के लिए उन्होंने शायद ही कुछ किया है.

सांप्रदायिकता

हिंदुत्वादी एजेंडे से इस देश के धर्मनिरपेक्ष चरित्र और सामुदायिक भाईचारे को गहरा आघात लगा है. हिंदुत्व के एजेंडे को लागू करने के लिए बीजेपी और राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (आरएसएस) सड़कछाप उद्दंड लोगों का इस्तेमाल कर रहे हैं. इनका इस्तेमाल वो अल्पसंख्यकों, दलितों और उन सभी लोगों को डराने-धमकाने के लिए कर रहे हैं जो उनसे सहमत नहीं हैं. वो जिसे चाहे उसे देश विरोधी या राष्ट्रद्रोही घोषित कर देते हैं. 

पिछले कुछ समय से तो सरकार ऐसे उद्दंड लोगों की सलाह पर अमल करना भी शुरू कर चुकी है, जैसा उसने हाल ही में हैदराबाद यूनिवर्टी और जवाहरलाल नेहरू यूनिवर्सिटी में किया.

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मोदी सरकार की नीतियों के कारण देश की बागडोर आर्थिक रूप से संपन्न वर्ग और बहुसंख्यक तबके के हाथ में चली गई है. इन दोनों के कॉकटेल से ही मोदी को राजनीतिक ताकत मिली है. एक से उन्हें पैसा मिलता है, दूसरे से बाहुबल.

अगर राहुल गांधी गंभीर हैं तो उन्हें पीएम मोदी के इन दोनों एजेंडों के खिलाफ एक वैचारिक कार्यक्रम तैयार करना होगा. इसके लिए उन्हें उन लोगों की राय की जरूरत पड़ेगी जो मोदी के इन दोनों एजेंडों की गलियों, अदालतों और दूसरे सार्वजनिक मंचों पर उठा रहे हैं.

सोनिया गांधी ने राष्ट्रीय सलाहकार परिषद (एनएसी) बनाकर सामाजिक कार्यकर्ताओं की मदद ली थी. नतीजतन, वो मनमोहन सिंह सरकार के नव-उदारवादी एजेंडे के बावजूद वो सूचना का अधिकार, राष्ट्रीय ग्रामीण रोजगार गारंटी योजना और खाद्य सुरक्षा जैसे कानून बनवाने में सफल रहीं.

सामाजिक कार्यकर्ताओं की मदद

राहुल गांधी को एक विकेंद्रित व्यवस्था की जरूरत है. हो सकता है कि सामाजिक क्षेत्र के उनके सलाहकार हर राज्य में स्थानीय संघर्षों को ध्यान में रखते हुए किसी मुद्दे पर अलग अलग राय दें.

राहुल को इन संघर्षों का हिस्सा भी बनना पड़ेगा. उन्हे पार्टी की स्थानीय इकाइयों को ऐसे संघर्षों से एकजुटता दिखाने के लिए प्रोत्साहित करना होगा.

क्या राहुल गांधी असहमति जाहिर करने वालों की बात सुनने को तैयार हैं?

इस बात के संकेत मिलने भी शुरू हो गए हैं राहुल गांधी इस दिशा में सक्रिय हैं. पंजाब और उत्तर प्रदेश में होने वाले विधानसभा चुनाव के लिए वो पार्टी के बाहर से चुनावी रणनीतिकार प्रशांत किशोर को लेकर आए हैं.

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हालांकि ये एक दोधारी तलवार है. इलेक्शन मैनेजमेंट और संचार माध्यमों के प्रभावी इस्तेमाल में कोई हानि नहीं लेकिन कांग्रेस के भावी अध्यक्ष को ये भी ध्यान रखना होगा कि अगर इलेक्शन मैनेजर चुनाव जिता सकता तो जमीनी कार्यकर्ताओं की जरूरत नहीं होगी. वो जमीनी कार्यकर्ता जो उन लाखों भारतीयों का प्रतिनिधित्व करते हैं जो देश में बदलाव चाहते हैं.

हार्वर्ड, व्हार्टन या भारतीय आईआईटी-आईआईएम से पढ़े मैनेजमेंट गुरु हर पार्टी ला सकती है लेकिन इससे पूरी बात शायद नहीं बनेगी. चुनाव जीतने के लिए केवल मैनेजमेंट काफी नहीं ये इससे भी पता चलता है कि प्रशांत किशोर ने भी राहुल गांधी या प्रियंका गांधी को यूपी में सीएम उम्मीदवार के रूप में पेश करने की सलाह दी है. 

राहुल गांधी को ये समझना होगा कि उनपर दोहरी जिम्मेदारी है. उन्हें पहले एक आमूलचूल बदलाव वाला राजनीतिक एजेंडा तैयार करना होगा और फिर विभिन्न परस्पर विरोधी लगने वालों विचारों को साथ लेकर इस एजेंडे को अमली जामा पहनाना होगा. 

लेकिन आज सबसे बड़ा सवाल यही है कि क्या राहुल गांधी खुद असहमति जाहिर करने वालों की बात सुनने को तैयार हैं?

First published: 10 June 2016, 11:09 IST
 
भारत भूषण @Bharatitis

एडिटर, कैच न्यूज़. पत्रकारिता में 25 से ज्यादा सालों का अनुभव. इस दौरान मेल टुडे के संस्थापक संपादक, हिन्दुस्तान टाइम्स के कार्यकारी संपादक, द टेलीग्राफ, दिल्ली के संपादक, एक्सप्रेस न्यूज़ सर्विस के संपादक, इंडियन एक्सप्रेस के वॉशिंगटन संवाददाता, द टाइम्स ऑफ़ इंडिया के सहायक संपादक के रूप में काम किया.

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