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दक्षिण एशियाई मुसलमानों ने इस्लामिक स्टेट को नकारा

पिनाकी भट्टाचार्य | Updated on: 29 December 2015, 20:39 IST
QUICK PILL
  • आतंकवादी संगठन इस्लामिक स्टेट इराक और सीरिया में केंद्रित है. मीडिया में आई खबरों के अनुसार उसकी मंशा दक्षिण एशिया में अपने पैर फैलाने की है.
  • दक्षिण एशिया में दुनिया के एक तिहाई मुसलमान रहते हैं लेकिन इस इलाके में अभी तक इस्लामिक स्टेट को कोई ख़ास कामयाबी नहीं मिली है.

विश्व में मुस्लिम आबादी का एक तिहाई हिस्सा दक्षिण एशिया में रहता है. इस्लामिक स्टेट (आईएस) दक्षिण एशिया में अपनी जगह तलाश रहा है लेकिन अभी तक सफल नहीं हो सका है.

भारत के दारूल उलूम देवबंद ने आईएस का कड़ा विरोध किया है. यहां तक कि पाकिस्तान में  तहरीके तालिबान ने भी आईएस को पूरी तरह से नकार दिया है.  

एक बात तो एकदम साफ है की आईएस की जड़ें भारतीय उपमहाद्वीप में जम नहीं पाई हैं. जबकि विश्व की एक तिहाई मुस्लिम जनसंख्या यहां निवास करती है. उपमहाद्वीप में बीते तीन महीनों में प्रत्यक्षतः तीन बड़े परिवर्तन देखने को मिले हैं.    

ताजा घटनाक्रम में बीते पखवाड़े तहरीक-ए-तालिबान, जिसे पाकिस्तान तालिबान के नाम से भी जाना जाता है, ने सीधे तौर पर आईएस और उसके प्रमुख अबू बकर अल बागदादी को खलीफा मानने से इनकार कर दिया.

वहीं दूसरी तरफ अफगान तालिबान के बारे में यह अंदेशा जताया जा रहा है कि वह आईएस से जुड़ी खुफिया जानकारियों को रूस तक पहुंचा रहा है, हालांकि अफगान तालिबान ने इन बातों का खंडन किया है.

भारतीय उपमहाद्वीप के सबसे पुराने इस्लामी संस्थान दारूल उलूम देवबंद ने इस्लामिक स्टेट की सार्वजनिक निंदा की है

उत्तर प्रदेश में भारतीय उपमहाद्वीप के सबसे पुराने और प्रतिष्ठित इस्लामी संस्थान दारूल-उलूम देवबंद ने भी नवंबर महीने में आईएस के जिहाद की सार्वजनिक रूप से निंदा की.

देवबंद के वाइस चांसलर मौलाना अबुल कासिम नेमानी ने कहा कि न सिर्फ आईएस बल्कि इस तरह का कोई भी संगठन जो दुनिया के किसी भी देश में आतंकवाद को बढ़ावा देता हैं, उसका विरोध होना चाहिए. इसका मजहब से कोई ताल्लुक नहीं है.

देवबंद ने वर्ष 2008 में आतंकवाद के खिलाफ एक विस्तृत फतवा जारी किया था. मीडिया से बातचीत में देवबंद के प्रवक्ता ने कहा था कि हमारी धार्मिक किताब में इस बात का साफ जिक्र है कि अगर किसी भी बेकसूर को इस्लाम के नाम पर कत्ल किया जाता है तो यह उतना ही घृणित कार्य है, जैसे कि काबा को गिरा देना.  

हमारे पड़ोसी बांग्लादेश में अभी हाल में हुए दो विदेशी पर्यटकों की हत्या को शुरुआती दौर में आईएस के आतंकियों द्वारा अंजाम दी गई कार्रवाई कहा गया था. लेकिन इस मामले में हसीना सरकार ने तुरंत ही बयान दिया कि यह अपराध एक स्थानीय स्तर के गिरोह की कारस्तानी है. हो सकता है कि वह संगठन जमात-ए-इस्लामी के प्रभाव में हो.

फिलहाल आईएस की गतिविधियां इराक-सीरिया के इर्दगिर्द केंद्रित हैं लेकिन खबरों के मुताबिक दक्षिण एशिया पर उसकी नजर है

एक सेवानिवृत खुफिया अधिकारी ने बताया कि फिलहाल हमारे देश में आईएस की कोई गतिविधि देखने को नहीं मिली है. लेकिन भविष्य में इसकी संभावना से इनकार नहीं किया जा सकता.
    
वर्तमान समय में आईएस की आतंकवादी गतिविधियां इराक और सीरिया के इर्दगिर्द केंद्रित हैं. लेकिन समाचार पत्रों में आ रही खबरों के मुताबिक दक्षिण एशिया पर आईएस ने अपनी निगाहें गड़ा रखी हैं. वह यहां पैठ बनाने की कोशिश कर रहा है. जो कि खतरनाक संकेत है.

उत्तर प्रदेश, आंध्र प्रदेश और महाराष्ट्र में पुलिस और खुफिया अधिकारियों ने कई युवाओं को पकड़ा है जो खुद-ब-खुद आईएस से जुड़ना चाहते हैं. इसमें लड़के और लड़कियां दोनों हैं.

खुफिया विभाग की चौकसी के चलते ऐसे युवाओं को देश छोड़ने से पहले ही एयरपोर्ट पर पकड़ लिया गया. पश्चिम एशिया में चल रही लड़ाई में अब तक केवल दो भारतीय मुसलमानों के मारे जाने की आधिकारिक पुष्टि हुई है.

विशेषज्ञों का मानना है कि ऐसे मामलों में सरकार की कोशिश ऐसा वातावरण तैयार करने की होनी चाहिए जिससे भटके हुए युवाओं को आईएस की असलियत का अंदाजा हो सके. उन्हें ऐसे लोगों का अनुभव बताए जाने की जरूरत है जो सीरिया-इराक से वापस लौटे हैं. उन्हें उस इतिहास को भी बताना चाहिए कि जो लोग 1980 में सोवियत संघ के खिलाफ लड़ाई में जिहाद के नाम पर अफगानिस्तान से मोहभंग होने के बाद वे सब अपने घर वापस लौट आये.

सोवियत संघ के खिलाफ लड़ने गये दक्षिण एशियाइयों के साथ पश्चिम एशियाई मुस्लिम नौकरों जैसा बरताव करते थे

पश्चिमी एशिया के मुस्लिम उनके साथ नौकरों की तरह व्यवहार करते थे. इसमें एक बात प्रमुख है कि जब 1990 में पाकिस्तान, भारत के विरुद्ध छद्म युद्ध में अफगान लड़ाकों का इस्तेमाल कर रहा था तब अफगान लड़ाकों का अनुभव कश्मीरियों के साथ भी अच्छा नहीं रहा था.

हाल के महीने में कश्मीर में कुछ युवाओं के द्वारा आईएस के झंडे लहराये जाने की घटना घटी, लेकिन सुरक्षा अधिकारियों ने इसे आईएसआईएस के लिए कुछ युवाओं का अतिउत्साह कहते हुए नजरअंदाज किया. कहने का तात्पर्य यह है कि चरमपंथ के खात्मे के लिए सीमित ही सही लेकिन सकारात्मक प्रकिया शुरू हो चुकी है.

First published: 29 December 2015, 20:39 IST
 
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