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छात्रों और शिक्षकों ने टाला जादवपुर युनिवर्सिटी में बड़ा टकराव

रजत रॉय | Updated on: 19 February 2016, 19:14 IST

जवाहर लाल युनिवर्सिटी (जेएनयू) में देश विरोधी नारों के बाद कड़ी कार्रवाई एवं कन्हैया कुमार की गिरफ्तारी के बाद इसके समर्थन और विरोध में प्रदर्शन तो ही रहे थे, कोलकाता की जादवपुर युनिवर्सिटी में भी इसकी गूंज सुनाई पड़ी. और गुरुवार को यदि पुलिस एवं शिक्षक तत्काल हस्तक्षेप नहीं करते तो प्रर्दशनकारी हिंसक हो जाते.

यह था पूरा घटनाक्रम

भारतीय जनता पार्टी और अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद् (एबीवीपी) के कार्यकर्ताओं ने गुरुवार दोपहर बाद शहर के गोल पार्क से दो किलोमीटर दूर स्थित जादवपुर युनिवर्सिटी की ओर जुलूस निकाला. पुलिस ने जादवपुर पुलिस स्टेशन के पास ऊंचे बेरिकेड्स लगाकर जुलूस को रोकने की कोशिश की.

लेकिन अदाकारा लॉकेट चटर्जी के नेतृत्व में प्रदर्शनकारी बेरिकेड्स को तोड़कर आगे निकल गए. जैसे ही वे कैम्पस में प्रवेश करने वाले थे, पुलिस ने उनको रोकने के लिए आनन-फानन में दूसरे बेरिकेड्स लगा दिए.

राज्य सरकार ने कश्मीर की आजादी की मांग के नारे लगाने की बुधवार की 'घटना' पर कुलपति से रिपोर्ट मांगी है

इस बीच, एबीवीपी के कार्यकर्ताओं द्वारा बुधवार को उनके पोस्टर फाड़ने के विरोध में युनिवर्सिटी के छात्र बड़ी संख्या में बाहर निकल आए और जुलूस के सामने आ खड़े हुए. इससे कैम्पस में तनाव पसर गया.

यह देख, यूनिवर्सिटी के शिक्षक तत्काल बाहर आए और अपने छात्रों के सामने कवच की तरह खड़े हो गए. हालांकि इस दौरान दोनों ओर से जमकर नारेबाजी हो रही थी, लेकिन पुलिस और शिक्षक दोनों गुटों को अलग-अलग रखने में कामयाब रहे. शिक्षकों और पुलिस की तत्परता से संभवतः बड़ी हिंसक झड़प टल गई.

जिम्मेदारी निभाई

जादवपुर युनिवर्सिटी टीचर्स एसोसिएशन की नेता और अंग्रेजी की प्रोफेसर नीलांजना गुप्ता ने बाद में कैच को बताया कि मैंने और मेरे साथी शिक्षकों ने महसूस किया कि अपने छात्रों को सुरक्षा देना हमारा नैतिक दायित्व है.

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“एक दिन पहले एक राजनीतिक दल के नेता ने धमकी दी थी कि हम बड़ी संख्या में आएंगे और कैम्पस में घुसकर दिखाएंगे, इसके बाद से हम चौकन्ना थे. उन्होंने धमकी दी थी कि वे 'प्रथम मार, परे विचार' (पहले मार, फिर विचार) की युक्ति अपनाएंगे, जिसका अर्थ था कि वे पहले छात्रों की पिटाई करते और उसके बाद ही बातचीत.”

“कल भी कुछ छात्र तिरंगा हाथ में लेकर और 'भारत माता की जय' के नारे लगाते हुए कैम्पस में घूम रहे थे. इसी समूह ने कैम्पस में छात्रों के उन पोस्टर्स को फाड़ डाला था, जो जेएनयू छात्रों के समर्थन में लगाए गए थे.”

जादवपुर की घटना पर भाजपा नेता कृष्णनु मित्रा ने कलकत्ता उच्च न्यायालय में एक जनहित याचिका दायर की है

प्रोफेसर गुप्ता ने कहा, इसके बाद ही उन्होंने और कुछ अन्य शिक्षकों ने आगे आने का निर्णय लिया. उन्होंने कहा, "युनिवर्सिटी सबके लिए खुली है. कोई भी आ सकता है और यदि चाहता है तो बहस कर सकता है. लेकिन शारीरिक हमला अलग बात है. अपने छात्रों के प्रति हमारी जिम्मेदारी बनती है. इसी कारण हमने हिंसा की धमकी को गंभीरता से लिया और हम हस्तक्षेप के लिए पूरी तरह तैयार थे.”

हालांकि पुलिस और शिक्षक किभी भी अवांछित घटना को रोकने में सफल हो गए, लेकिन मुद्दा अभी सुलझा नहीं है. राज्यपाल और राज्य सरकार ने कश्मीर, नागालैंड और मणिपुर की आजादी की मांग के नारे लगाने की बुधवार की 'घटना' पर कुलपति से रिपोर्ट मांगी है.

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नारे कुछ ऐसे थे- “हम क्या चाहते... आजादी, कश्मीर की... आजादी, मणिपुर की... आजादी, नागालैण्ड की... आजादी, आरएसएस से... आजादी, मोदी सरकार से... आजादी, छीन के लेंगे... आजादी.”

नारेबाजी करने वाले छात्रों ने अपने हाथों में पोस्टर्स और इश्तिहार पकड़े हुए थे, जिन पर कुछ इस तरह के संदेश लिखे थे- “यदि गुजरात में कत्लेआम करने वाले, अफजल गुरु को फांसी पर लटकाने वाले और आजादी की मांग करने वाले कश्मीरी छात्र राष्ट्रद्रोही हैं तो हम सब राष्ट्रद्रोही हैं.”

गोद में बैठाना

भाजपा के एक नेता कृष्णनु मित्रा ने कलकत्ता उच्च न्यायालय में एक जनहित याचिका दायर की है, जिसमें राष्ट्र विरोधी नारे लगाने वाले छात्रों के खिलाफ कड़ी कार्रवाई करने और पूरे मामले की नेशनल इन्वेस्टीगेशन एजेंसी (एनआईए) से जांच कराने की मांग की गई है.

राज्यपाल ने कुलपति सुरंजन दास को नारे लगाने वाले छात्रों के खिलाफ एफआईआर दर्ज कराने को कहा है

गृह राज्यमंत्री किरण रिरिजु का कहना है कि केंद्र पश्चिम बंगाल सरकार से रिपोर्ट मांग चुका है. मोदी सरकार द्वारा राज्यपाल बनाए गए भाजपा नेता केशरीनाथ त्रिपाठी जोर देकर कुलपति सुरंजन दास को नारे लगाने वाले छात्रों के खिलाफ एफआईआर दर्ज कराने को कहा है. राज्यपाल होने के नाते त्रिपाठी यूनिवर्सिटी के कुलाधिपति हैं.

हालांकि दास संकेत दे चुके हैं कि वे कैम्पस में असहमति की भावना के सम्मान और विशुद्ध बहस के पक्ष में हैं. ममता बनर्जी शायद अकेली राजनेता हैं जिन्होंने इस मुद्दे पर कोई बयान नहीं दिया है. ममता इसी वर्ष मुख्यमंत्री के रूप में अपने दूसरे कार्यकाल की उम्मीद कर रही हैं और इसी कारण ध्रुवीकरण वाले मुद्दों पर कोई भी पक्ष लेने से बच रही हैं.

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गरीबों के लिए कई योजनाओं की घोषणा करते हुए जादवपुर यूनिवर्सिटी में हुए प्रदर्शन और नारेबाजी पर वे पत्रकारों के सवालों को यह कहकर टाल गईं कि उनके द्वारा गरीबों के हित में घोषित प्रोजेक्ट्स को अन्य मामलों के सामने "फीका न करें.”

First published: 19 February 2016, 19:14 IST
 
रजत रॉय

Journalist based out of Kolkata.

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