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गंगा संरक्षण मुहिम: रिवर बेसिन में हाइडल प्रोजेक्ट्स पर रोक लगाने का फैसला

विशाख उन्नीकृष्णन | Updated on: 11 December 2015, 23:01 IST
QUICK PILL
  • नदियों के स्वाभाविक प्रवाह और उससे जुड़ी इकोलॉजी को देखते हुए सरकार ने पिछले महीने 6 हाइडल प्रोजेक्ट्स की मंजूरी को खारिज कर दिया है.
  • 20 जनवरी को अलकनंदा और भागीरथी के ऊपर हाइडल प्रोजेक्ट को लेकर दी गई मंजूरी के बारे में सुप्रीम कोर्ट में रिपोर्ट सौंपेगी केंद्र सरकार. 

पर्यावरणीय मंजूरियों को बड़ा झटका देते हुए सरकार ने गंगा और उसकी सहायक नदियों पर होने वाले सभी निर्माण प्रक्रिया पर रोक लगाने का फैसला किया है. महत्वपूर्ण बात यह है कि हाइडल प्रोजेक्ट्स भी इस प्रतिबंध के दायरे में आएंगे. 

पिछले महीने 6 हाइडल प्रोजेक्ट्स को मंजूरी दिए जाने की विशेषज्ञ समिति की रिपोर्ट को खारिज करते हुए अंतरमंत्रालयी समूह ने कहा, 'नदियों के स्वाभाविक प्रवाह और उससे जुड़ी इकोलॉजी को बचाना ज्यादा महत्वपूर्ण है.' अंतर मंत्रालय समूह में उमा भारती, प्रकाश जावडेकर और पीयूष गोयल थे और इसकी अध्यक्षता जल संसाधन मंत्री शशि शेखर ने की. सरकार को अलकनंदा और भागीरथी के ऊपर हाइडल प्रोजेक्ट को लेकर दी गई मंजूरी को लेकर सुप्रीम कोर्ट में रिपोर्ट सौंपनी है. कोर्ट में इस मामले की सुनवाई 20 जनवरी को होगी. 

प्रतिबंध से क्या असर होगा ?

अलकनंदा और भागीरथी पर 86 हाइडल प्रोजेक्ट्स प्रस्तावित हैं और यह सभी उत्तराखंड में हैं. इन परियोजनाओं की क्षमता 3,600 मेगावॉट है. अन्य 41 प्रोजेक्ट्स पर काम चल रहा है जिसकी क्षमता करीब 2,378 मेगावॉट है.

हालांकि अभी तक प्रतिबंध की पूरी तरह से व्याख्या नहीं की गई है. इसलिए किसी भी प्रोजेक्ट्स के प्रभावित होने की संभावना नहीं है.

फिलहाल इस प्रतिबंध से महज 6 परियोजनाओं पर असर होगा जिनकी मंजूरी लंबित है.

इन परियोजनाओं में एनटीपीसी की लता तपावन, एनएचपीसी की कोटलीभेल आईए, टीएचडीसी की झेलम तमाक, जीएमआर की अलकनंदा और सुपर हाइड्रो खैराओ गंगा और भयंदर गंगा शामिल है.

सरकार ने क्यों किया फैसला

  • सरकार को 2103 के उत्तराखंड की त्रासदी के बाद गंगा नीति को लेकर जबरदस्त आलोचनाओं का सामना करना पड़ रहा है.
  • इसके बाद सरकार नदियों पर प्रस्तावित हाइडल प्रोजेक्ट्स की समीक्षा के लिए तीन विशेषज्ञ समिति बना चुकी है.
  • पहले दो समितियों ने सभी नए प्रोजेक्ट्स पर प्रतिबंध लगाने की सिफारिश की.
  • पीपल्स साइंस इंस्टीट्यूट के डायरेक्टर रवि चोपड़ा ने पहली समिति की अध्यक्षता की थी और इस समिति को अक्टूबर 2013 में बनाया गया था.
  • चोपड़ा ने कहा कि कभी भी पर्यावरण मंत्रालय ने उनसे नीतियों पर विचार के लिए संपर्क नहीं किया.
  • दूसरी समिति विनोद टारे के नेतृत्व में बनी थी. टारे आईआईटी-कानपुर से पढ़े थे. इस समिति को सभी छह लंबित परियोजनाओं की समीक्षा करने की जिम्मेदारी मिली थी.
  • समिति ने कहा कि अगर सभी परियोजनाओं को मंजूरी दी जाती है तो उनकी क्षमता में निश्चित तौर पर कटौती की जानी चाहिए ताकि पानी के प्रवाह को सुनिश्चित किया जा सके.

दो समितियों ने यह भी कहा कि मौजूदा परियोजनाओं की वजह से 2013 की आपदा आई

  • समिति का निष्कर्ष दिसंबर 2014 में सुप्रीम कोर्ट में पर्यावरण मंत्रालय को दिए गए बयान पर आधारित था जिसमें मंत्रालय ने कहा था कि हाइडल प्रोजेक्ट्स से उत्तराखंड के बाढ़ पर प्रत्यक्ष और परोक्ष रूप से असर पड़ा.
  • तीसरी समिति का गठन इस साल जून में बी पी दास के नेतृत्व में किया गया था. समिति को हाइडल प्रोजेक्ट्स के भूकंपीय और ग्लेशियल असर का अध्ययन करने की जिम्मेदारी दी गई थी.

गंगा पर 86 हाइडल प्रोजेक्ट्स हैं जिसकी क्षमता 3,600 मेगावॉट है. वहीं 41 अन्य प्रोजेक्टों पर काम चल रहा है

  • समिति को प्रस्तावित प्रोजेक्ट्स के 'नो गो' एरिया की भी पहचान करनी थी और उन्हें इसका सामाजिक और आर्थिक प्रभाव का अध्ययन करने की जिम्मेदारी दी गई थी.
  • समिति ने कहा कि 6 लंबित परियोजनाओं को आगे बढ़ाने का पर्याप्त कानूनी आधार है.
  • 23 नवंबर को सरकार ने समिति की रिपोर्ट का जायजा लेने के लिए अंतर मंत्रालय समूह का गठन किया.

लेकिन आखिर क्यों इन तीन विशेषज्ञ समितियों को लगातार एक ही मामले की पड़ताल करनी पड़ी. साउथ एशियन नेटवर्क फॉर डैम्स, रिवर्स एंड पीपल के हिमांशु ठक्कर बताते हैं कि इन हाइडल परियोजनाओं जल्द ही विशेषज्ञ समिति की तरफ से मंजूरी दिए जाने की जरूरत थी.'

प्रतिबंध पर क्या है विचार

ठक्कर ने कहा, 'दास पैनल ने छह परियोजनाओं को मंजूरी देने की सिफारिश की.' उन्होंने कहा, 'दरअसल इसने पहले की दो समितियों की सिफारिशों को खारिज कर दिया.' इसलिए आईएमजी की तरफ से समितियों की सिफारिशों को खारिज किया जाना और नदियों पर सभी हाइडल प्रोजेक्ट्स को प्रतिबंधित करना सही फैसला है.

नेशनल गंगा रिवर बेसिन अथॉरिटी के विशेषज्ञ सदस्य बी डी त्रिपाठी इसे साहसी कदम बताते हैं लेकिन वह यह कहते हैं कि इसे लागू करना ज्यादा महत्वपूर्ण है.

उन्होंने कहा, 'मनमोहन सिंह सरकार ने भी रिवर बेसिन के कई प्रोजेक्ट्स को प्रतिबंधित किया लेकिन अभी भी कई ऐसी परियोजनाएं अवैध रूप से चल रही है.'

6 लंबित परियोजनाओं का क्या होगा ?

  • रिपोर्ट्स के मुताबिक इन परियोजनाओं को रद्द कर दिया जाएगा और नमामि गंगे या गंगा बचाओ फंड से परियोजनाओं के प्रमोटर्स को मुआवजा दिया जाएगा.
  • नमामि गंगे प्रोजेक्ट के तहत नदियों को साफ करने की सभी कोशिशों को एक मंच पर  लाने की बात करता है और कैबिनेट ने इसके लिए 20,000 करोड़ रुपये के फंड की भी मंजूरी दे दी है. 
  • कई पर्यावरणविद कंपनियों को मुआवजा देने के खिलाफ हैं. ठक्कर कहते हैं, 'किसी भी तरह का मुआवजा नहीं दिया जाना चाहिए क्योंकि इनमें से किसी भी प्रोजेक्ट को निर्माण कार्य शुरू करने की मंजूरी नहीं दी गई थी.'
  • बल्कि उन कंपनयिों के खिलाफ उल्टे कार्रवाई की जानी चाहिए जिन्होंने परियोजना पर काम शुरू किया. नमामि गंगे के लिए दी गई रकम इन कंपनियों को देना कहीं से भी नदी को बचाने की कोशिश नहीं है.
  • गंगा आह्वान की मलिका भरोत भी यही करती है. उन्होंने कहा, 'इनमें से कोई भी परियोजना मुआवजे की हकदार नहीं है. जिन्होंने निर्माण शुरू किया है उन्होंने बिना किसी मंजूरी के किया है.'
  • मसलन सुपर हाइड्रो खैरो गंगा हाइड्रोपावर प्रोजेक्ट ने मंजूरियों के बिना निर्माण कार्य जारी रखा.
  • रद्द की गई परियोजनाओं को मुआवजा नहीं दिया जा सकता क्योंकि उन्हें काम शुरू करने के लिए मंजूरी ही नहीं मिली थी
  • वहीं एनवायरॉनिक्स के आर श्रीधर बताते हैं, 'कंपनियों को देरी की वजह से और अधिक मुआवजे की मांग करनी चाहिए. लेकिन अगर इससे नए निर्माण को रोका जाता है तो मैं इसका स्वागत करुंगा.'

श्रीधर और अन्य हालांकि इस बात पर जोर देते हैं कि नमामि गंगे फंड से मुआवजा नहीं दिया जाना चाहिए. मलिका को लगता है कि आईएमजी को अब मौजूदा हाइडल प्रोजेक्ट्स को देखे जाने की जरूरत है क्योंकि अब इन परियोजनाओं की वजह से जमीन की टोपोग्राफी बदल चुकी है और पहले दी गई मंजूरी की अब कोई वैधता नहीं है. हालांकि सबसे बड़ी चिंता यह है कि सरकार क्या इसे लेकर वाकई में गंभीर है. हमें इस बात की जानकारी तब मिलेगी जब सरकार अगले महीने सुप्रीम कोर्ट में अपनी रिपोर्ट सौंप देगी.

 

First published: 11 December 2015, 23:01 IST
 
विशाख उन्नीकृष्णन @sparksofvishdom

A graduate of the Asian College of Journalism, Vishakh tracks stories on public policy, environment and culture. Previously at Mint, he enjoys bringing in a touch of humour to the darkest of times and hardest of stories. One word self-description: Quipster

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