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क्या सत्ता लगातार जेएनयू को पढ़ने में चूक रही है?

वज़ाहत क़ाजी | Updated on: 23 February 2016, 8:07 IST
QUICK PILL
  • बार्कले विरोध प्रदर्शन की शुरुआत प्रोफेसर एलन ब्लूम्स के \'द क्लोजिंग ऑफ द अमेकिरन माइंड\' से हुई. उन्होंने अपनी थीसिस में लिखा कि \'अमेरिका की उच्च शिक्षा ने लोकतंत्र को विफल किया है जो त्रासदी की तरह साबित हुई है.\'
  • वहीं भारत में लोकतंत्र ने उच्च शिक्षा को विफल किया है. यह लोकतंत्र को बदनाम करने या उसकी साख खराब करने की कोशिश नहीं है लेकिन यह वक्त भारत में लोकतंत्र और उच्च शिक्षा के बीच के संबंधों को समझने का है.

1960 में बार्कले में कैलिफोर्निया विश्वविद्यालय में छात्रों ने सबसे पहले आवाज बुलंद की. बार्कले विरोध प्रदर्शन के पीछे की वजह अफ्रीकी-अमेरिकी लोगों के नागरिक अधिकारों की मांग, बोलने की आजादी का आंदोलन और वियतनाम के खिलाफ किया जाने वाला विरोध पद्रर्शन था. समग्र तौर पर विरोध प्रदर्शन एक तरह से काउंटर-कल्चर मूवमेंट की तरह था.

बार्कले विरोध प्रदर्शन को जवाहर लाल नेहरू में हुए आंदोलन से जोड़कर देखा जा सकता है. पूरे आंदोलन की शुरुआत अफजल गुरू की फांसी के दिन किए जाने वाले कार्यक्रम को लेकर शुरू हुई और बाद में यह विरोध दूसरे प्रदर्शन में तब्दील हो गया. 

बार्कले विरोध प्रदर्शन की शुरुआत प्रोफेसर एलन ब्लूम्स के 'द क्लोजिंग ऑफ द अमेकिरन माइंड' से हुई. उन्होंने अपनी थीसिस में लिखा कि 'अमेरिका की उच्च शिक्षा ने लोकतंत्र को विफल किया है जो त्रासदी की तरह साबित हुई है.'

जेएनयू विरोध प्रदर्शन और अधिकारियों की तरफ से की जाने वाली कार्रवाई के मामले में मैं अलग रुख लेना चाहूंगा. भारत में लोकतंत्र ने उच्च शिक्षा को विफल किया है. यह लोकतंत्र को बदनाम करने या उसकी साख खराब करने की कोशिश नहीं है लेकिन यह वक्त भारत में लोकतंत्र और उच्च शिक्षा के बीच के संबंधों को समझने का है.

नई पीढ़ी की आकांक्षा

जेएनयू विरोध प्रदर्शन पूरी तरह से भारत की पुरानी पीढ़ी की जगह नई पीढ़ी के संक्रमण की कहानी है. यह आबादी वैसे समय में पली बढ़ी है जहां समय और जगह की दूरी कम हो गई है और सूचनाओं का कमोडिटीटाइजेशन हो चुका है. पहली पीढ़ी के मुकाबले यह पीढ़ी ज्यादा जागरूक और ज्याद आकांक्षी है.

इस लिहाज से भारत की नई पीढ़ी पहली पीढ़ी की तरह किसी विचार या रिवाज से चिपके रहने वाली नहीं है. चूंकि यह पीढ़ी जागरूक और आकांक्षी है इसलिए वह किसी भी राजनीतिक या सामाजिक विचारधारा को मानने को तैयार नहीं है.

जेएनयू विरोध प्रदर्शन पूरी तरह से भारत की पुरानी पीढ़ी की जगह नई पीढ़ी के संक्रमण की कहानी है

यह पूरी पीढ़ी संक्रमण के दौर से गुजर रही है. मनोवैज्ञानिक विश्लेषण के लिहाज से देखा जाए तो इस पीढ़ी की बातों को सुनने की जरूरत है. खासकर वैसे समाज में जहां वैसे व्यक्ति की बातों को ही सुना जाता है जिनके पास तजर्बा होता है. वैसे समाज में जहां बुद्धिमता का संबंध उम्र से होता है.

पूरी कवायद पहले से मौजूदा संस्कृति के खिलाफ नई सांस्कृति चेतना को आगे बढ़ाने की है. गुरु की फांसी की जयंती मनाने का मामला हो या फिर अन्य विरोध प्रदर्शन, यह सब कुछ गहरे संघर्ष की तरफ इशारा करता है. साफ शब्दों में कहा जाए तो नई पीढ़ी अपने लिए जगह, सम्मान और अधिकार चाहती है.

जेएनयू मामले के प्रति राज्य का दृष्टिकोण या तो गलत रहा या उसने आवश्कता से अधिक प्रतिक्रिया दी

जेएनयू की कहानी राष्ट्रवाद बनाम राष्टद्रोह की कहानी नहीं है. यह समाज में पहचान की जद्दोजहद है जिसकी जगह धीरे-धीरे कम होती जा रही है.

राज्य से कहां हुई गलती

नई पीढ़ी की आंतरिक समस्या और बाहरी दुनिया की वास्तविकता में विद्रोह पनप रहा है. गुरु या फिर उसकी फांसी या कश्मीर. देश के काउंटर कल्चर मूवमेंट का केंद्र बन गया है. इसके सकारात्मक और नकारात्मक परिणाम दोनों हैं. सीधे शब्दों में नई और युवा पीढ़ी मौजूदा धारणाओं के खिलाफ बोल रही है. वह मौजूदा संकेतों और निहितार्थों के खिलाफ अपना तर्क रख रही है.

लेकिन यहां पर उन्हें 'वास्तविकता' का सामना करना पड़ता है जो उनकी आकांक्षाओं और जरूरतों के खिलाफ जाता है. राज्य ने पूरे प्रकरण को या तो गलत तरीके से देखा या फिर उसने आवश्कता से अधिक प्रतिक्रिया दी. नतीजा यह हुआ कि यह जेएनयू कैंपस से आगे निकलकर फैलते चला गया. यहां पर लोकतंत्र ने नई पीढ़ी को निराश किया है.

नई पीढ़ी की उम्मीद और जरूरतों को जगह देने की बजाए और उसे सुनने के बदले सरकार ने पूरे मामले में राज्य ने उल्टे सख्त प्रतिक्रिया दी. परिणाम चौंकाने वाले रहे. पूरे मामले की हकीकत यह है कि भारत की नई पीढ़ी की आकांक्षा और जरूरतों को झटका लगा है. 

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First published: 23 February 2016, 8:07 IST
 
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