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इन तरीकों से राज्य भूमि अधिग्रहण कानूनों को लचीला और आसान बना सकते हैं

श्रिया मोहन | Updated on: 14 July 2016, 8:23 IST
QUICK PILL
  • मध्य प्रदेश, आंध्र प्रदेश और तमिलनाडु जैसे राज्यों ने भूमि अधिग्रहण में उचित पारदर्शिता और मुआवजा के अधिकार, पुनर्वास और पुर्नस्थापन अधिनियम (आरएफसीटीएलएआरआर) 2013 में संशोधन करते हुए या कानूनों को अपने हिसाब से परिभाषित करते हुए सफलतापूर्वक अधिग्रहण करना प्रारंभ कर दिया है.
  • एनडीए सरकार ग्रामीण सड़कों, किफायती आवास, बुनियादी ढांचे और शहरों के निर्माण जैसे क्षेत्रों में निजी या पीपीपी परियोजनाओं के मुकाबले कम समय लेने वाले विकल्पों की तलाश करने का हवाला देते हुए इस कानून में संशोधन करने के लिये तीन बार अधिनियम में फेरबदल कर चुकी है.

जल्द ही जमीनों पर कब्जा करना कानूनी रूप से आसान हो जाएगा. आईये समझते कैसे?

उम्मीद है कि केंद्र सरकार अगले हफ्ते से शुरू होने वाले संसद के मानसून सत्र में भूमि अधिग्रहण में उचित पारदर्शिता और मुआवजा के अधिकार, पुनर्वास और पुर्नस्थापन (संशोधन) विधेयक 2015 को वापस ला सकती है.

संविधान के तहत भूमि अधिग्रहण का उल्लेख समवर्ती सूची में किया गया है हालांकि अनुच्छेद 254 (2) किसी भी राज्य को सूची में शामिल केंद्र सरकार के अधिनियम में संशोधन करने की अनुमति प्रदान करता है बशर्ते राष्ट्रपति इसकी अनुमति प्रदान करें.

भूमि अधिग्रहण में असफल केंद्र की नजर अब रक्षा विभाग की जमीनों पर

हालांकि विभिन्न राज्य सरकारें अब 2013 के केंद्रीय कानून में होने वाले संशोधन का इंतजार करने को बिल्कुल भी तैयार नहीं हैं जिसके चलते उन्हें आधारभूत ढांचे के लिए जरूरी भूमि का अधिग्रहण करने में पसीने छूटते हैं.

मध्य प्रदेश, आंध्र प्रदेश और तमिलनाडु जैसे राज्यों ने तो भूमि अधिग्रहण में उचित पारदर्शिता और मुआवजा के अधिकार, पुनर्वास और पुर्नस्थापन अधिनियम (आरएफसीटीएलएआरआर) 2013 में संशोधन करते हुए या कानूनों को अपने हिसाब से परिभाषित करते हुए सफलतापूर्वक अधिग्रहण करना प्रारंभ भी कर दिया है.

इसके चलते भूमि अधिग्रहण के ऐसे माॅडल सामने आ रहे हैं जो भूमि के अधिग्रहण को और अधिक आसान कर रहे हैं.

क्लाॅज और काउंटर क्लाॅज

सामाजिक प्रभाव आंकलन का क्लाॅज और सहमति का क्लाॅज 2013 के कानून के केंद्रीय बिंदु हैं. लेकिन केंद्र सरकार का तर्क है कि एक तरफ जहां यह क्लाॅज जमीन के मालिकों के हितों की रक्षा के लिये बेहद आवश्यक हैं. वहीं यह याद रखना भी बेहद जरूरी है कि प्रतिवर्ष 13 मिलियन भारतीय युवा बेरोजगारों की फौज तैयार हो रही है. सबसे बड़ी आवश्यकता इन लोगों के लिये रोजगार का सृजन करने की है जो सिर्फ उद्योगों की स्थापना करके ही दी जा सकती है. इसके लिये सबसे बड़ी आवश्यकता है जमीन.

इसके फलस्वरूप ‘ग्रामीण बुनियादी ढांचे’ में शाॅपिंग माॅल्स जैसे स्थानों को शामिल करने का फैसला किया गया है. एक सब्जी मंडी बनाने के नाम पर जमीन का अधिग्रहण करने के बाद उसकी शीर्ष की मंजिलों को मल्टीप्लेक्सों में बदल देना अब भूमि अधिग्रहण की नई शैली के रूप में विकसित हो रहा है.

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वित्त मंत्री ने तमाम राज्यों को सलाह दी है कि वे केंद्र की मंजूरी के साथ अपना स्वयं का अधिनियम तैयार करें

एनडीए सरकार ग्रामीण सड़कों, किफायती आवास, बुनियादी ढांचे और शहरों के निर्माण जैसे क्षेत्रों में निजी या पीपीपी परियोजनाओं के मुकाबले कम समय लेने वाले विकल्पों की तलाश करने का हवाला देते हुए इस कानून में संशोधन करने के लिये तीन बार अधिनियम में फेरबदल कर चुकी है.

लेकिन अड़ियल विपक्ष के चलते केंद्र सरकार भूमि अधिनियम में संशोधन करने के लिये इस अध्यादेश को दोबारा पेश करने में विफल रही. इसके बजाय वित्त मंत्री ने तमाम राज्यों को सलाह दी है कि वे केंद्र की मंजूरी के साथ अपना स्वयं का अधिनियम तैयार करें.

अलग-अलग राज्यों में अलग-अलग भूमि अधिनियम कानूनों को लागू करने का विचार बीती जुलाई में नीति आयोग की गवर्निंग काउंसिल और मुख्यमंत्रियों की एक बैठक के दौरान सामने आया था.

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2013 के कानून के अनुसार ग्रामीण क्षेत्रों के लिए न्यूनतम मुआवजे के रूप में जमीन की मौजूदा दर का दो से चार गुना रकम देने के अलावा उस भूमि पर मौजूद परिसंपत्ति का दाम भी देने का वायदा किया गया था.

शहरी क्षेत्रों के लिये मुआवजे की न्यूनतम दर भूमि की कीमत की दोगुनी होने के अलावा मौजूद परिसंपत्ति के दाम भी देना सुनिश्चित किया गया.

आदर्श रूप से तो 2013 के कानून में पेश किया गया मुआवजे का फार्मूला विभिन्न राज्यों द्वारा अपने अधिनियमों के माध्यम से पेश होना चाहिये. लेकिन शायद ही कोई राज्य इन दिशानिर्देशों का पालन कर रहे हैं.

आइये हम आपको कुछ राज्यों के संशोधनों से रूबरू करवाते हैंः    

गुजरात

इसी वर्ष अप्रैल के महीने में गुजरात विधानसभा ने ‘‘सार्वजनिक उद्देश्यों’’ और ‘‘औद्योगिक क्षेत्रों’’ के लिये जमीन के अधिग्रहण के लिये सामाजिक प्रभाव का आकलन और सहमति के क्लाॅज को खारिज करते हुए भूमि अधिग्रहण में उचित पारदर्शिता और मुआवजा के अधिकार, पुनर्वास और पुर्नस्थापन (गुजरात संशोधन) विधेयक-2016 पारित किया. इसके जरिए 2013 के कानून को बेहद हल्का कर दिया गया.

इस बिल के माध्यम से रक्षा और सामाजिक बुनियादी ढांचे से जुड़ी विद्युतीकरण परियोजनाओं, सार्वजनिक सड़कों, रेलवे, नहरों, स्कूलों और सस्ते मकानों के निर्माण के अलावा पीपीपी के अंतर्गत आने वाली औद्योगिक परियोजनाओं के लिये भूमि अधिग्रहण के समय आवश्यक सामाजिक प्रभाव के आकलन को पीछे छोड़ दिया गया.

इससे पहले के बिल में सरकार के लिये प्रभावित पक्ष की ओर से कम से कम 80 प्रतिशत की सहमति लेना आवश्यक था. लेकिन अब ऐसा नहीं है.

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संक्षेप में कहें तो, राज्य के विधेयक ने उन सभी प्रावधानों को शामिल किया है जिन्हें मोदी यरकार की पहल पर यूपीए के अधिनियम को संशोधित करते हुए एनडीए सरकार ने अपने अध्याधेश में शामिल किया है.

कांग्रेस विधायक शक्ति सिंह गोहिल इसे एक ‘लोकतंत्र विरोधी’ और ‘किसान विरोधी’ कानून बताते हुए राज्य सरकार की खिंचाई करते हैं.

तमिलनाडु

तमिलनाडु पहला और इकलौता ऐसा राज्य था जिसने भूमि अधिग्रहण, पुनर्वास और पुर्नस्थापन कानून-2013 के दायरे से तीन प्रमुख श्रेणियों को छूट दिलवाने के लिये राष्ट्रपति की स्वीकृति पाई थीः

  • तमिलनाडु राजमार्ग अधिनियम 2001 के तहत किया जाने वाला भूमि अधिग्रहण,
  • 1997 का तमिलनाडु औद्योगिक उद्देश्यों के लिये भूमि अधिग्रहण कानून, 1978 का तमिलनाडु हरिजन कल्याण योजनाओं के लिये भूमि अधिग्रहण कानून.
  • यह तीनों अब सहमति क्लाॅज और सामाजिक प्रभाव आकलन वाले क्लाॅज के दायरे से बाहर हैं.

तमिलनाडु में अधिग्रहित होने वाली 80 प्रतिशत भूमि का अधिग्रहण उपरोक्त तीनों अधिनियमों के तहत ही किया जाता है.

तमिलनाडु ने भूमि अधिग्रहण में उचित पारदर्शिता और मुआवजा के अधिकार, पुनर्वास और पुर्नस्थापन अधिनियम 2013 में एक नये अध्याय को शामिल करते हुए संशोधित किया जो औद्योगिक और राजमार्गों के उद्देश्यों के लिये भूमि अधिग्रहण को केंद्र सरकार के भूमि अधिनियम कानून से छूट प्रदान करता है.

आंध्र प्रदेश

मीडिया में छपी खबरों के मुताबिक आंध्र प्रदेश सरकार ने अमरावती को एक भव्य शहर बनाने के लिये तेजी से जमीन का अधिग्रहण करने और कानूनी मसलों से निबटने के लिये जरूरी संशोधन किये हैं. उनकी मुख्य बाधा केंद्रीय अधिनियम की धारा 107 है. उनके द्वारा पेश किये गए चार संशोधन निम्न हैः

एक तरफ जहां केंद्रीय अधिनियम ने सामाजिक प्रभाव आकलन के लिये छः महीने की समयसीमा निश्चित की है वहीं आंध्र सरकार इसे काफी कम करना चाहती है.

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केंद्रीय अधिनियम में जमीन के पूर्व अधिग्रहण का कोई प्रावधान नहीं है. सिर्फ रक्षा परियोजनाओं और प्राकृतिक आपदा राहत कार्यों के लिये भूमि अधिग्रहित करने के दौरान अनिवार्य प्रक्रिया का पालन न करने की छूट है. जबकि आंध्र सरकार एक ऐसा प्रवधान शामिल करना चाहती है जिसके माध्यम से कानूनी प्रक्रिया पूर्ण होने से पहले ही अधिग्रहण की अनुमति मिल जाए.

वह बुनियादी ढांचे से संबंधित परियोजनाओं के लिये भूमि अधिग्रहण हेतु ‘‘तात्कालिक क्लाॅज’’ प्रारंभ करने की योजना बना रही है.

आंध्र सरकार एक ‘‘सहमति अवार्ड’’ पेश करना चाहती है जिसके तहत जमीन के मालिक एक बार सहमति पत्र जारी करने के बाद अदालत में भी भूमि अधिग्रहण को चुनौती नहीं दे सकते.

तेलंगाना

एक सरकार जिसे कई परियोजनाओं के लिये बड़ी मात्रा में जमीन की आवश्यकता है, किसानों, जमीन के मालिकों और अन्य हितधारकों के साथ टकराव को टालने के क्रम में ‘‘भूमि अधिग्रहण’’ शब्द को ही ‘‘भूमि खरीद’’ शब्द से बदलना चाहती है.

मुख्यमंत्री के चंद्रशेखर राव ने जून के महीने में मंत्रियों और अधिकारियों के साथ इस मुद्दे पर समीक्षा करने के बाद कहा था कि ‘भूमि अधिग्रहण’ शब्द किसानों और जमीन मालिकों के बीच एक गलत संदेश देता है कि सरकार जमीन लेने के लिये ‘जबरन अधिग्रहण’ का सहारा लेगी.

नए कानून को ‘भूमि खरीद अधिनियम’ कहा जाएगा और भूमि अधिग्रहण अधिकारी, जो विशेष उप जिलाधिकारी होंगे, को अब ‘भूमि खरीद अधिकारी’ के नाम से जाना जाएगा.

सूत्रों का दावा है कि कुछ अन्य राज्य भी 2013 के कानून में परिवर्तन करने की दिशा में कदम आगे बढ़ा चुके हैं

लेकिन उनके इन नेक इरादों की राह इतनी आसान नहीं रही है.

हैदराबाद उच्च न्यायालय का एक फैसला तेलंगाना सरकार के लिये बड़ी शर्मिंदगी का सबब साबित हुआ. इसमें अदालत ने सरकार को निर्देश दिया कि वह पालामारु-रंगा रेड्डी सिंचाई योजना के लिये जमीन नही देने को तैयार किसानों को परेशान न करे.

भूमि अधिग्रहण में असफल केंद्र की नजर अब रक्षा विभाग की जमीनों पर

सरकार से जुड़े सूत्रों का दावा है कि कुछ अन्य राज्य भी 2013 के कानून में परिवर्तन करने की दिशा में कदम आगे बढ़ा चुके हैं. महाराष्ट्र, असम और कर्नाटक भी केंद्र सरकार के 2013 के कानून में परिवर्तन करने या नया कानून लाने के काफी इच्छुक हैं, विशेषकर सहमति और सामाजिक प्रभाव आकलन के बेहद मुश्किल प्रावधानों से पार पाने वाले उपाय.

एक तरफ जहां राज्यों के मुखिया भूमि अधिग्रहण प्रणाली को काबू में करने के प्रयासों में लगे हुए हैं वहीं दूसरी तरफ किसान और जमीन के मालिक हमेशा की तरह घाटे में ही हैं.

First published: 14 July 2016, 8:23 IST
 
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