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अमेरिकी दबाव में भारत-पाक ने सर्जिकल स्ट्राइक को तूल देने से परहेज किया

भारत भूषण | Updated on: 7 February 2017, 8:22 IST
QUICK PILL
  • एलओसी पार भारतीय सेना द्वारा आतंकी शिविरों पर की गई सर्जिकल स्ट्राइक के बाद अमेरिकी कूटनीति ने दोनों देशों के ऊपर मामले को आगे तूल न देने के लिए जबर्दस्त दबाव बनाया.
  • जानकारों के मुताबिक उसी दिन अमेरिका ने पाकिस्तानी सत्ता प्रतिष्ठान के साथ भी संपर्क किया. दोनों देशों को अमेरिका का संदेश सीधा और साफ था, इस तनाव को आगे न बढ़ाया जाय.

एलओसी पार भारतीय सेना द्वारा आतंकी शिविरों पर की गई सर्जिकल स्ट्राइक के बाद अमेरिकी कूटनीति ने दोनों देशों के ऊपर मामले को आगे तूल न देने के लिए जबर्दस्त दबाव बनाया.

जब अमेरिकी सुरक्षा सलाहकार सुसैन राइस ने भारतीय राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार अजित डोभाल को फोन किया तब उन्होंने भारत द्वारा पाकिस्तानी हिस्से में की गई सर्जिकल स्ट्राइक का समर्थन नहीं किया था.

इसी वजह से प्रधानमंत्री ने अपनी पार्टी और समर्थकों को ताकीद किया था कि वे इस मामले में ज्यादा बयानबाजी न करें

जानकारों के मुताबिक उसी दिन अमेरिका ने पाकिस्तानी सत्ता प्रतिष्ठान के साथ भी संपर्क किया. दोनों देशों को अमेरिका का संदेश सीधा और साफ था, इस तनाव को आगे न बढ़ाया जाय.

शायद इसी वजह से प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने अपनी पार्टी और समर्थकों को ताकीद किया था कि वे इस मामले में ज्यादा बयानबाजी न करें. शायद पाकिस्तान द्वारा किसी भी तरह की सर्जिकल स्ट्राइक न होने की बात भी इसी वजह से बार-बार कही गई.  हालांकि इसके बावजूद दोनों देशों के राजनेता अपने राजनीतिक हितों के चलते बयानबाजी से बाज नहीं आए.

सरकार के करीबी लोगों के अनुसार सुसैन राइस ने भारत को सलाह दी थी कि वह पाक सेना के कुछ सीमावर्ती ठिकानों पर किए गए हमले को लेकर किसी तरह की शेखी बघारने से परहेज करे. भारत को लगे हाथ यह बात भी समझाई गई कि वह सब्र से काम ले और ऐसा कुछ नहीं करे जिससे 8 नवंबर को होने वाले अमेरिकी चुनाव पर कोई असर पड़े.

अमेरिकी आकलन

अमेरिका का आकलन था कि  अगर भारत पाक के बीच इस समय किसी तरह का तनाव बढ़ता है तो इसका अमेरिका और ओबामा की विदेश नीति की विरासत पर नकारात्मक असर पड़ेगा, जो कि इस समय अपने अंतिम चरण में है. इसके अलावा भारत-पाक के बीच तनाव बढ़ने से रिपब्लिकन उम्मीदवार डोनाल्ड ट्रम्प को बैठे बिठाए एक मुद्दा मिल जाएगा और वो दो न्यूक्लियर पड़ोसी देशों के बीच तनाव के लिए ओबामा प्रशासन को आड़े हाथों लेने से नहीं चूकेंगे.

राइस ने हालांकि उरी में सीमा पार हुए आतंकी हमले की निंदा की. जब तक उन्होंने भारत सरकार के एनएसए से बात नहीं की थी उस वक्त तक अमेरिकी विदेश सचिव जॉन केरी ने उरी आतंकी हमले को कश्मीर में पिछले ढाई महीने से चल रही हिंसा का ही अगली प्रतिक्रिया करार देकर हर तरह की हिंसा को खत्म करने का आह्वान किया था.

इस प्रकार, जहां राइस के फोन कॉल ने पाक द्वारा सीमा पार से फैलाए जा रहे आतंकवाद पर मुहर लगाई, वहीं भारत को यह जरूरी संदेश भी दिया कि वह सैन्य कार्यवाही पर शोर थोड़ा कम करे और तनाव न बढ़ाए.

उन्होंने एनएसए से बातचीत में साफ कर दिया कि अगर डेमोक्रेटिक पार्टी राष्ट्रपति चुनाव जीतती है तो भारत यह उम्मीद कर सकता है कि अमेरिकी की पाकिस्तान के प्रति मौजूदा नीति जारी रहेगी जिसके तहत पाकिस्तान में सक्रिय आतंकवादी समूह मसलन हक्कानी नेटवर्क, जैश-ए-मुहम्मद, जमात-उद-दावा और लश्कर-ए-तैयबा जैसे संगठन यूएन की आतंकी सूची में बढ़ावा देते रहेंगे. इसके विपरीत अगर रिपब्लिकन जीतते हैं तो अमेरिका में नया प्रशासन जनवरी तक कार्यभार संभालेगा और तब तक भारत को इंतजार करना पड़ेगा कि डोनाल्ड ट्रम्प भारतीय उपमहाद्वीप के लिए किस तरह की नीति बनाते हैं.

पाकिस्तान को अमेरिकी संदेश

पाकिस्तान को दिए गए संदेश में उसे इस बात के लिए लताड़ा गया था कि उसने उरी हमले की निंदा तक नहीं की और इसी वह से भारत ने उसके खिलाफ सैन्य कार्रवाई की.

गौरतलब है कि संयुक्त राष्ट्र महासभा की बैठक से लौटते हुए लंदन में पाक पीएम नवाज शरीफ ने उरी हमले को जायज ठहराया था. उन्होंने रिपोर्टरों को कहा, 'हो सकता है उरी हमला कश्मीर में पिछले कई दिनों से जारी हिंसा की प्रतिक्रिया हो. क्योंकि गत दो माह में हिंसा में मारे गए या अंधे कर दिए गए लोगों के परिजनों में बेहद रोष है.’

अमेरिकी प्रशासन ने पाकिस्तान को साफ लहजे में आगाह किया कि अमेरिका द्वारा पाक को उरी हमले की निंदा करने की सलाह देने के बाद भी पाकिस्तानी नेतृत्व जानबूझकर इसकी अनदेखी कर रहा है.

उन्होंने पाक को चेतावनी दी है कि वह जवाब में किसी तरह की कोई सैन्य कार्रवाई न करे, क्योंकि इससे हालात बिगड़ने का खतरा है. इसीलिए शायद पाक ने भारत के सर्जिकल हमले से इनकार कर दिया और भारत ने इसे लेकर बहुत ज्यादा हो-हल्ला नहीं किया.

अगर पाकिस्तान यह दावा करता है कि एलओसी पर रोजमर्रा की ही तरह गोलीबारी हुई और भारत ने उसके इलाके में घुस कर कोई हमला नहीं किया तो इसके बाद किसी तरह से मामले को तूल देने की कोई वजह बचती नहीं है. अगर पाकिस्तानी सेना के भीतर किसी तरह की नाराजगी है भी तो अमेरिकी सलाह के बाद वह इस मामले को किसी तरह से आगे नहीं बढ़ाएगी.

अमेरिकी सलाह के चलते ही भारत इस हमले से जुड़ा कोई सबूत जारी नहीं कर रहा है. भारत के राष्ट्रवादी इस सर्जिकल हमले का जश्न मनाते रहेंगे और पाक इसे नकारता रहेगा.

इस्लामाबाद में बेचैनी

अमेरिका द्वारा इस तरह से दरकिनार कर दिए जाने की वजह से ही शायद एक मीटिंग में अनपेक्षित कहासुनी की खबरें हमें पढ़ने-सुनने को मिली. पाकिस्तान के एक बड़े दैनिक अखबार डॉन के अनुसार आतंक को प्रश्रय दिए जाने को लेकर पाकिस्तान के राजनीतिक और सैनिक सत्ता के बीच रस्साकशी देखने को मिली.

पाक प्रधानमंत्री नवाज शरीफ, विदेश सचिव एजाज अहमद चौधरी, आईएसआई प्रमुख लेफ्टिनेंट जनरल रिजवान अख्तर और पंजाब के मुख्यमंत्री शाहबाज शरीफ के बीच हुई मीटिंग में आईएसआई को जानकारी दी गई कि पाकिस्तान को विश्व मंच पर अलग-थलग होने का खतरा पैदा हो गया है और पाकिस्तान से चल रहे आतंकी गुटों के खिलाफ कार्रवाई की आवश्यकता है.

आईएसआई को साफ तौर पर संकेत दिया गया कि ‘अगर प्रतिबंधित या अनियंत्रित आतंकी गुटों के खिलाफ कानूनी कार्रवाई की जाती है तो सैन्य गुप्तचर एजेंसियों को इसमें दखलंदाजी करने की जरूरत नहीं है.’

डॉन में दी गई एक खबर के अनुसार, विदेश सचिव चौधरी ने बैठक में मौजूद लोगों से कहा, ‘अमेरिका-पाक के संबंध काफी बिगड़ गए हैं और यह आगे और बिगड़ सकते हैं.’ उन्होंने यह भी कहा कि अंतरराष्ट्रीय समुदाय की प्रमुख मांगें हैं मसूद अजहर, जैश-ए-मुहम्मद, हाफिज सईद, लश्कर-ए-तैयबा और हक्कानी नेटवर्क के खिलाफ कार्रवाई की जाए.

पाक विदेश सचिव ने कहा, ‘अमेरिका-पाक के संबंध काफी बिगड़ गए हैं और यह आगे और बिगड़ सकते हैं'

भारत के बारे में चौधरी ने कथित तौर पर कहा कि भारत की मुख्य मांग है कि पठानकोट हमले की जांच पूरी की जाए और जैश-ए-मुहम्मद के खिलाफ कार्रवाई की जाए.

अचरज करने वाली बात यह है कि पाक विदेश सचिव ने भी कहा कि चीन भी पाक से खुश नहीं है और इसके रवैये में बदलाव चाहता है. चीन ने पाक से यह भी सवाल किया कि वह बार-बार उससे यह क्यों कहता है कि वह संयुक्त राष्ट्र द्वारा मसूद अजहर को आतंकी घोषित करने की राह में रोड़े अटकाए.

हालांकि पाकिस्तान के प्रधानमंत्री कार्यालय ने अखबार की इस रिपोर्ट को खारिज कर दिया है.

रक्षा विशेषज्ञों ने इस मीटिंग और इसकी बातों को बहुत अधिक महत्व नहीं दिया. उनके अनुसार ‘पहले भी ऐसी कई बातें हो चुकी है. इससे क्या फर्क पड़ता है कि पाक सेना क्या करती है?' उनमें से एक ने कहा ‘पाक सेना को कश्मीर में हिंसा फैलाए रखने और भारत को खून खराबे से परेशान करने के लिए इन्हीं आतंकियों की जरूरत पड़ती है और कश्मीर मसले को सुलगाए रखना पाकिस्तान के लिए जरूरी है.'

एक अन्य रक्षा विशेषज्ञ ने बताया कि भले ही पाकिस्तान अमेरिका के दबाव में भारत के खिलाफ सैनिक तनाव न बढ़ाए लेकिन यह सोचना असंभव है कि वह अमेरिकी दबाव में आतंकी गुटों के खिलाफ कोई कार्रवाई करेगा, जिनका इस्तेमाल वह भारत के खिलाफ छद्म युद्ध में करता आया है.

उन्होंने कहा, ‘जनरल राहिल शरीफ अपने करियर के अंतिम पड़ाव पर लश्कर, जैश-ए-मोहम्मद, हाफिज सईद या मसूद अजहर के खिलाफ किसी तरह की कार्रवाई की इजाजत नहीं देंगे. शरीफ नवम्बर में रिटायर होने वाले हैं. उनके रिटायरमेंट के बाद ही इस तरह की कोई चीज संभव है.’

First published: 7 October 2016, 7:22 IST
 
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