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विधानसभा चुनाव के नतीजों से बढ़ी मोदी की अंतरराष्ट्रीय हैसियत

विवेक काटजू | Updated on: 21 May 2016, 18:35 IST
QUICK PILL
  • असम में जबरदस्त जीत और केरल एवं बंगाल में वोट हिस्सेदारी में हुई बढ़ोतरी के बाद मोदी बढ़े आत्मबल के साथ 22 मई को ईरान की यात्रा पर जा रहे हैं.
  • 2015 में बिहार और दिल्ली की हार के बाद मोदी एक बार फिर से भारतीय राजनीति में अपना वर्चस्व साबित करने में सफल रहे हैं. इससे उनकी अंतरराष्ट्र्रीय हैसियत में बढ़ोतरी हुई है.

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी 22 मई को ईरान की यात्रा पर जा रहे हैं. असम में जबरदस्त जीत और केरल एवं पश्चिम बंगाल में वोट हिस्सेदारी में हुए इजाफे के बाद बढ़े आत्मबल के साथ मोदी ईरान की यात्रा पर जा रहे हैं. 

इसके बाद जून महीने में मोदी संयुक्त राज्य अमेरिका और अन्य देशों के दौरे पर जाएंगे. उनके विदेशी दोस्तों को भी चुनाव नतीजे के बारे में पता चल गया होगा. मोदी 2015 की हार के बाद एक बार फिर से राजनीतिक वर्चस्व बनाने में सफल रहे हैं. इससे उनकी अंतरराष्ट्रीय हैसियत बनी रहेगी. 

दुनिया के अन्य देशों के नेताओं को इस बात का एहसास हो चुका है कि हालिया चुनाव के नतीजे बीजेपी की मजबूती की पहचान है. अगर मोदी के शब्दों में कहा जाए, 'चुनाव के नतीजों ने साफ कर दिया है कि बीजेपी की विचारधारा को स्वीकार किया जा रहा है और उसे देश में अधिक से अधिक लोगों का समर्थन मिल रहा है.'

विदेशी विश्लेषकों ने हालिया चुनाव के नतीजों को देश में मोदी की बढ़ती लोकप्रियता से जोड़कर देखा

देश में मौजूदा विदेशी विश्लेषकों ने राज्य चुनाव के नतीजों को काफी करीब से देखा. बांग्लादेशी सर्किल में असम और पश्चिम बंगाल के नतीजों को लेकर ज्यादा दिलचस्पी रही. 

वहीं तमिलनाडु चुनाव के नतीजों को लेकर श्रीलंका में दिलचस्पी रही तो असम के चुनाव को लेकर म्यामांर दूतावास के अधिकारियों की दिलचस्पी रही.

विदेशी विश्लेषकों ने हालिया चुनाव के नतीजों को देश में मोदी की बढ़ती लोकप्रियता से जोड़कर देखा क्योंकि मोदी सरकार के दो साल का कार्यकाल पूरा होने जा रहा है. पिछले साल मोदी को बिहार और दिल्ली में बड़ा झटका लगा था. 

अगर बिहार और दिल्ली की तरह इन राज्यों मेंं बीजेपी हारती तो भविष्य को लेकर सवाल उठने लगते. इसलिए उन राज्यों में भी चुनावी नतीजे के मायने थे जहां बीजेपी पारंपरिक तौर पर बहुत अधिक मजबूत नहीं है.

विदेशी विश्लेषकों के लिए सबक

पहली बार यह कि बीजेपी ने एक बार फिर से खुद को साबित किया है. हकीकत में बीजेपी ने अपनी स्थिति को पहले के मुकाबले ज्यादा मजबूत किया है. 

केंद्र सरकार में और अधिक मजबूत होने के साथ ही बीजेपी पश्चिम में फैली है और पूर्व के राज्य में अपनी पैठ बनाई है. वहीं पूर्वोत्तर के राज्य में सरकार बनाने में सफल रही बीजेपी दक्षिण में भी अपन प्रभाव बढ़ाने में सफल रही है. इसका पूरा श्रेय मोदी की अपील और उनके काम को जाता है.

बीजेपी ने असम में स्थानीय नेतृत्व को आगे बढ़ाया और वहीं के नेता को पार्टी का मुख्यमंत्री पद का उम्मीदवार बनाया

विदेशी विश्लेषकों ने इस बात को स्वीकार कियाा कि मोदी और उनकी पार्टी ने बिहार और दिल्ली से मिले सबक को समझा. असम वैसा राज्य था जहां बीजेपी के सरकार बनाने की संभावना थी. बीजेपी ने असम में स्थानीय नेतृत्व को आगे बढ़ाया और वहीं के नेता को पार्टी का मुख्यमंत्री पद का उम्मीदवार बनाया.

गठबंधन बनाने में राजनीतिक चतुराई दिखाई गई और चुनाव प्रचार अभियान को साधारण रखा गया. ढाका ने इस बात को गंभीरता से देखा. मसलन बांग्लादेशी प्रवासियों के मुद्दे पर प्रचार अभियान को आक्रामक नहीं रखा गया.

राज्यों की राजनीति में विदेश विश्लेषक बहुत ज्यादा दिलचस्पी नहीं लेते हैं. हालांकि इसमें भारत के सीमाई राज्य अपवाद हैं. नतीजों का सबसे अहम पहलू यह रहा कि कांग्रेस बेहद दबाव में जा चुकी है. कांग्रेस के लिए कुछ भी काम करता नहीं दिख रहा है. हालांकि बिहार चुनाव कांग्रेस के लिए ठीक रहा. 

पिछले दो सालों के दौरान विदेशी विश्लेषकों कोे यह जरूर लगा होगा राहुल गांधी से की जाने वाली उम्मीद इन चुनावों के साथ और धूमिल हो गई है. इससे मोदी को और टिकाऊ नेता के तौर पर स्थापित होने में मदद मिलेगी.

अगर इन चुनावों से कोई संकेत मिलता है तो यह कि असली परीक्षा 2019 में होगी. जिन लोगों की इस देश में लंबे समय के लिए आर्थिक और रणनीति मामलों में रुचि है वह इन बदलावों का आकलन जरूर करेंगे. इन विदेशी विश्लेेषकों को अगले उत्तर प्रदेश चुनाव तक इंतजार करना होगा. जिसके बाद स्थिति साफ हो पाएगी.

मोदी की 2014 में जीत इस लिहाज से बड़ी थी कि 1984 के बाद किसी पार्टी को लोकसभा में इनती बड़ी सफलता मिली थी. हिंदी क्षेत्र में बीेजेपी की सफलता चौंकाने वाली रही. इन राज्यों की 282 सीटों में से पार्टी को 190 सीटें मिलीं.

उत्तर प्रदेश में पार्टी को सबसेे ज्यादा सीटें मिली. उत्तर प्रदेश परंपरागत तौर पर जाति के आधार पर वोट करता है. इसलिए मायावती एससी समुदाय को प्रतिनिधित्व देती है तो मुलायम सिंह यादव ओबीसी और अल्पसंख्यकों के नेता हैं.

कांग्रेस और बीजेपी जैसे बड़े राष्ट्रीय दल इन जातियों के बीच लोकप्रिय हैं. मोदी लहर ने जातीय सीमा को तोेड़ते हुए बीजेपी को फायदा दिलाया. पार्टी को इसी वजह से राज्य में 40 फीसदी वोट मिले.  यह चौतरफा लड़ाई में निर्णायक हिस्सेदारी थी.

क्या मोदी 2017 के उत्तर प्रदेश चुनाव में वहीं जादू दोहर पाएगी? अगर बिहार की तरह विपक्ष एकजुट नहीं हो पाता है तो क्या मोदी विकास के एजेंडे को आगे बढ़ा पाएंगे? अगर मामूली तौर पर धु्रवीकरण होता है तो क्या 2014 के नतीजे फिर से सामने होंगे?

यह सभी ऐसे सवाल है जिसका जवाब विदेशी विश्लेषकों को खोजना होगा. बेशक उन्होंने असम में मोदी की जीत का आकलन ही क्यों न कर लिया हो.

First published: 21 May 2016, 18:35 IST
 
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