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क्या वीरभद्र की संभावित उत्तराधिकारी हो सकती हैं आशा कुमारी?

आकाश बिष्ट | Updated on: 1 July 2016, 8:07 IST

पार्टी की पंजाब राज्य की इकाई के प्रमुख के रूप में दागी आशा कुमारी के चुनाव को लेकर चहुंओर हो रही आलोचना से बेफिक्र कांग्रेस पार्टी ने अब विरोधियों का डटकर सामना करने का फैसला कर लिया है. उनकी नियुक्ति की आधिकारिक घोषणा होने के एक दिन बाद कांग्रेस ने बीजेपी के खिलाफ आक्रामक रुख अपनाया और पार्टी अध्यक्ष अमित शाह पर लगे ‘हत्या के आरोप’ को लेकर उनकी तीखी आलोचना की.

अंदरूनी और बाहरी, दोनों ही स्तरों पर बड़े पैमाने पर हुए विरोध के बावजूद पार्टी अपने रुख पर कायम है और सूत्रों का कहना है कि कांग्रेस नेतृत्व को कुमारी में ‘भविष्य का नेतृत्व’ दिख रहा है. उनका कहना है कि केंद्रीय नेतृत्व ने अपने इस फैसले पर टिके रहकर कुमारी को भविष्य की एक ऐसी नेता के रूप में तैयार करने के इरादे स्पष्ट कर दिये हैं जो आने वाले दिनों में संभवतः हिमाचल प्रदेश के 82 वर्षीय मुख्यमंत्री वीरभद्र सिंह की उत्तराधिकारी हो सकती हैं.

सिंह बीते काफी अरसे से भ्रष्टाचार के आरोपों से जूझ रहे हैं और लगातार जांच एजेंसियों के निशाने पर हैं जो कभी भी इन दिग्गज नेता को अपने शिकंजे में ले सकती हैं. यहां तक कि कांग्रेस के नेता भी निकट भविष्य में सिंह की गिरफ्तारी की संभावनाओं को स्वीकारते हैं. ऐसी स्थिति में हो सकता है कि राज्य को नेतृत्व के संकट का सामना करना पड़े और देश के सबसे पुराने दल को कोई निर्णय लेना पड़े. कुमारी का उदय इसी दिशा में एक कदम के रूप में देखा जा रहा है.

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राज्यसभा में कांगेेस की तरफ से विपक्ष के उपनेता का पद संभाल रहे आनंद शर्मा के नाम पर भी सिंह के स्थानापन्न के रूप में विचार किया गया लेकिन सूत्रों का दावा है कि शर्मा ने राष्ट्रीय राजनीति में अपना ध्यान केंद्रित करने का हवाला देकर खुद ही इस पद में रुचि नहीं दिखाई.

कांग्रेस के एक पदाधिकारी कहते हैं, ‘शर्मा और गुलाम नबी आजाद उच्च सदन में कांग्रेस का नेतृत्व कर रहे हैं जिसके चलते उन्हें राष्ट्रीय स्तर के नेता के रूप में पहचान मिली है. इस बात की कम ही संभावना है कि पार्टी के शीर्ष राष्ट्रीय नेता के रूप में पहचान बनाने के बाद वे खुद को राज्य स्तर की राजनीति तक सीमित करने के इच्छुक होंगे.’

ठाकुरों के वर्चस्व वाले राज्य में कुमारी की ठाकुर के रूप में पहचान होना उनके पक्ष में जाता है. हालाांकि उन्हें राज्य के दो अन्य ठाकुर दिग्गजों, कैबिनेट मंत्री कौल सिंह ठाकुर और जीएस बाली से कड़ी प्रतिस्पर्धा का सामना करना पड़ रहा है, लेकिन उम्र का पहलू उनके पक्ष में काम कर सकता है. अगर फौरी के तौर पर नहीं तो भी कांग्रेस नेतृत्व उन्हें एक ऐसी युवा नेता के रूप में देखती है जिन्हें आने वाले दिनों में इस पहाड़ी राज्य में पार्टी का नेतृत्व करने का मौका दिया जा सकता है.

कांग्रेस सचिव आशा कुमारी हिमाचल प्रदेश से पांच बार विधायक रह चुकी हैं

सचिव के रूप में निभाया गया उनका कार्यकाल भी उनके पक्ष में काम कर रहा है जिसके चलते उन्होंने अक्सर गुटबाजी से भरे रहने वाली राज्य स्तरीय राजनीति से निबटने का भी खासा अनुभव है. इसके अलावा आलाकमान का समर्थन साथ होने के चलते वे मुख्यमंत्री पद की दावेदारी में दूसरों को आसानी से पछाड़ सकती हैं. हालांकि इस दिशा में उनका भविष्य बहुत हद तक की पंजाब इकाई के प्रभारी के रूप में उनके प्रदर्शन पर निर्भर करेगा.

अगर पार्टी के सूत्रों पर यकीन करें तो उनका कहना है कि कुमारी को शर्मा का भी समर्थन मिला हुआ है क्योंकि दोनों को ही वीरभद्र विरोधी खेमे का हिस्सा माना जाता है. एक अन्य कांग्रेसी नेता कहते हैं, ‘जमीन हड़पने के मामले में अदालत से सजा मिलने के बावजूद पार्टी ने उन्हें पद देने का फैसला किया और निःसंदेह यह काम पार्टी के वरिष्ठ नेताओं के साथ विचार-विमर्श के बाद ही उठाया गया होगा. बहरहाल इसके बावजूद वे प्रभारी सचिव के रूप में कार्यरत थीं और ऐसा नहीं लगता है कि उनके सजायाफ्ता होने का कोई प्रभाव पार्टी नेतृत्व पर पड़ा है.’

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कुमारी ने इंडियन एक्सप्रेस को बताया कि इस बारे में घोषणा करने से पहले ही पार्टी आलाकमान ने उनके इस मामले से जुड़े तमाम कागजात देख लिये थे जिससे स्पष्ट हो जाता है कि यह मामला पहले से ही नेतृत्व की नजरों में था और वे इसके परिणामों से भी अच्छी तरह वाकिफ थी. और इसके बावजूद पार्टी ने अपने इस निर्णय की घोषणा करने में कोई संकोच नहीं किया जो शीर्ष नेतृत्व के साथ उनके बेहतर तालमेल का सबूत है.

यहां तक कि कांग्रेस की पंजाब इकाई के शीर्ष नेतृत्व के साथ भी उनके बेहतर संबंध बेहद मधुर माने जाते हैं. सूत्रों का कहना है कि जब उनका नाम राज्य कांग्रेस के प्रमुख कैप्टन अमरिंदर सिंह के सामने रखा गया तो उन्होंने बिना समय गंवाए तुरंत हामी भर दी. इसी तरह प्रदीप सिंह बाजवा और कुमारी के बीच भी अच्छा तालमेल है और उन्होंने घोषणा होने के बाद दिल्ली में उनसे मुलाकात की.

सबसे दिलचस्प बात यह है कि एक तरफ जहां कमलनाथ को 1984 के सिंख विरोधी दंगों में कथित संलिप्तता के चलते पंजाब में विरोध का सामना करना पड़ा वहीं ऐसा लगता है कि कुमारी का विरोध उनके नाम की घोषणा होने के कुछ ही दिनों में धराशायी हो गया. यहां तक कि आम आदमी पार्टी (आप) ने भी इस मुद्दे को इतना तूल नहीं दिया जितना उन्होंने कमलनाथ को लेकर किया था.

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हालांकि उनके विरोधियों का दावा है कि आप आने वाले महीनों में जमीन हड़पने का मामला उठा सकती है और हो सकता है कि वे तब इस विशेष मामले को उठाकर कांग्रेस को घेरें. नाम न छापने की शर्त पर पंजाब कांग्रेस के एक नेता कहते हैं, ‘‘बीजेपी ने केजरीवाल को दिल्ली में ही व्यस्त कर रखा है जिसके चलते वे अबतक आशा कुमारी पर हमला करने में नाकाम रहे हैं. लेकिन ऐसा अधिक दिनों तक नहीं होगा क्योंकि उनकी सारी राजनीति भ्रष्टाचार के इर्द-गिर्द ही केंद्रित है.’’

ऐसा लगता है कि कांग्रेस उस स्थिति से निबटने के लिये भी रणनीति तैयार कर चुकी है. सूत्रों का दावा है कि पार्टी ने किसी भी असहज स्थिति से निकलने के लिये योजना तैयार कर रखी है. कुमारी को प्रभार सौंपे जाने से एक दिन पहले ही कांग्रेस के एक वरिष्ठ नेता ने सोची-समझी रणनीति के तहत दावा किया कि यह एक अस्थायी व्यवस्था है. इसके पीछे विचार यह है कि अगर उनका दागी अतीत चुनावी मुद्दा बनता है तो पार्टी के पास प्रभार किसी और को सौंपने का मौका होगा और एक लंबे समय से लंबित संगठनात्मक फेरबदल को अंजाम दिया जा सके.

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चुनाव से ऐन पहले ऐसा विवादस्पद फैसला उल्टा भी पड़ सकता है लेकिन इससे इतना साफ होता है कि केंद्रीय नेतृत्व को कुमारी में पूरा विश्वास और भरोसा है और वे एक ऐसा चेहरा हैं जिनपर आने वाले समय में सबकी नजरें टिकी होंगी.

First published: 1 July 2016, 8:07 IST
 
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