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कैराना मामला: इस गैरजिम्मेदारी की भी कुछ कीमत तय होनी चाहिए

गोविंद चतुर्वेदी | Updated on: 15 June 2016, 8:12 IST

उत्तर प्रदेश के शामली जिले से भाजपा सांसद, हुकुम सिंह ने मंगलवार को अपनी चार दिन पुरानी सूची वापस ले ली. चार दिन पहले उन्होंने आरोप लगाया था कि, कैराना से 350 के करीब हिन्दू परिवार पलायन कर गए हैं. उन्होंने इसकी बाकायदा नात-पते सहित सूची भी जारी की थी. इसकी वजह भी उन्होंने साफ-साफ मुस्लिमों का डर बताया. अब मंगलवार को उन्होंने यू-टर्न ले लिया.

उन्होंने कहा कि, जो लोग कैराना से अपना घर-बार छोड़ कर गए, वेे साम्प्रदायिक डर से नहीं गए. उन्होंने यह भी कहा कि, कैराना छोड़ने वाली लिस्ट में अकेले हिन्दू नहीं, हिन्दू-मुस्लिम दोनों ही परिवारों के लोग शामिल हैं. अब उन्होंने इसकी वजह साम्प्रदायिकता नहीं बल्कि कानून-व्यवस्था के खराब हालात बताया है. कमोबेश यही सब बातें, मीडिया की जांच में पहले ही सामने आ चुकी हैं. उसमें यह भी आया है कि, ये सारे परिवार साल-छह माह में घर छोड़ कर नहीं गए. कम से कम पिछले 15-20 वर्षों में गए हैं और आतंक की वजह से नहीं धंधे-रोजगार की तलाश में गए हैं.

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उत्तर प्रदेश ही नहीं, देश की जनता के सामने आज सबसे बड़ा प्रश्र यह है कि, क्या हुकुम सिंह को उनके आरोप वापस लेने की इजाजत दे दी जाए? विशेषकर तब जब उनके आरोप को आधार बनाकर उनकी पार्टी के राष्ट्रीय अध्यक्ष ने इलाहाबाद की कार्यकारिणी में इसे अगले चुनाव का मुद्दा बनाने का संकेत दिया है. और यदि जनता ऐसा कर भी दे तब क्या हुकुम सिंह के आरोप इतिहास के पन्नों से मिट जाएंगे.

कैराना छोड़ने वाली लिस्ट में अकेले हिन्दू नहीं, हिन्दू-मुस्लिम दोनों ही परिवारों के लोग शामिल हैं: हुकुम सिंह

सब जानते हैं, उत्तर प्रदेश साम्प्रदायिक दृष्टि से कितना संवेदनशील हैं. आज से नहीं जमाने से. जरा-जरा सी बात पर वहां हालात खून-खराबे तक पहुंचते रहे हैं. दादरी के अखलाक का उदाहरण तो ताजा है ही, लेकिन उसके पहले मुजफ्फरनगर से लेकर मुरादाबाद और आजमगढ़ से लेकर बरेली तक.

जगह-जगह, छोटी-छोटी बातों पर नाहक ही खून खौलता रहा है. जिसकी सजा भी जान देकर बेगुनाहों ने ही भोगी है. हुकुम सिंह का आरोप भी इसी तरह का है. वो तो ऊपर वाले का अहसान मानना चाहिए कि, चार दिन में कुछ नहीं हुआ पर यदि कुछ हो जाता तब उसकी सजा कौन भोगता? उत्तर प्रदेश और देश का आम आदमी! शर्मसार कौन होता? इंसानियत और देश के प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी. वैसे ही जैसे गुजरात के दंगों के वक्त तत्कालीन प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी हुए. उन्हें सार्वजनिक रूप से कहना पड़ा कि, अब मैं दुनिया को क्या मुंह दिखाऊंगा.

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हुकुम सिंह बच्चे नहीं हैं. करीब-करीब 80 साल के हैं. राजनीति में भी नए नहीं हैं. विधायक भी रहे हैं और मंत्री भी. इसलिए यह मानना भी नासमझी होगी कि, उन्होंने जो कहा यूं ही कह दिया. अपने कहे का मतलब और असर वे भी जानते हैं और जनता भी.

वर्ष 2013 के मुजफ्फरनगर दंगे सबको याद हैं. और अकेले हुकुम सिंह की ही क्यों, यहां जिक्र आजम खान का भी जरूरी है और असदुद्दीन का भी. अकबरुद्दीन औवेसी का भी तो साक्षी महाराज और ठाकरे भाईयों का भी. उन सभी का, जो संविधान की शपथ भी खाते हैं और उसकी धज्जियां भी उड़ाते हैं.

कम से कम सांसद-विधायकों से देश की जनता इतनी तो उम्मीद कर ही सकती है कि, वे जो बोले तोल-मोल कर बोलें. अमृत वर्षा न भी करें तो जहर तो नहीं उगलें. यह तो सुनिश्चित करके बोलें कि, उनके श्रीमुख से निकले शब्दों की गति थूक कर चाटने जैसी नहीं होगी. जो कहेंगे उसे सिद्ध करेंगे.

यदि वे इतने जिम्मेदार नहीं रहते तब यह सरकार का जिम्मा है कि, वह उन्हें पाबंद करे. नहीं मानें तो उन पर कानूनी कार्रवाई हो. हुकुम सिंह अपने शब्दों को वापस ले लें. आजम खान के शब्दों (कि, प्रधानमंत्री अपनी लाहौर यात्रा के दौरान दाऊद इब्राहिम से मिले) का सरकार नोटिस ही नहीं ले तब क्या माना जाए. यही कि, सरकार भी चाहती है, यही सब चलता रहे. राजनीति का चूल्हा जलता रहे और चुनावी रोटियां सिकती रहे.

First published: 15 June 2016, 8:12 IST
 
गोविंद चतुर्वेदी @catchhindi

लेखक राजस्थान पत्रिका के डिप्टी एडिटर हैं.

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