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मानव तस्करी-2016: आदिवासी और मुस्लिम लड़कियों की मांग सबसे ज्यादा

श्रिया मोहन | Updated on: 11 February 2017, 5:48 IST
(कैच)
QUICK PILL
  • राष्ट्रीय अपराध रिकॉर्ड ब्यूरो द्वारा गत वर्ष जारी किए गए आंकड़ों के अनुसार मानव तस्करी का यह दूसरा सबसे बड़ा अपराध 14 गुना बढ़ा और वर्ष 2014 में 65 प्रतिशत बढ़ा है.
  • रिपोर्ट के अनुसार वर्ष 2012-15 में 5,000 से ज्यादा बच्चे लापता हुए. छत्तीसगढ़ और झारखंड के आदिवासी परिवारों में से किसी न किसी परिवार की बेटी का गायब होना रोजमर्रा की बात है.

23 साल पहले असम के एक गांव में जन्मी शीबा ने कभी सपने में भी नहीं सोचा था कि उसकी जिंदगी उसे किस दोराहे पर लोकर खड़ा कर देगी.

एक साल पहले असम के एक गांव से उसका अपहरण कर भिवानी में उसे हरियाणा के एक जाट परिवार को 60,000 रुपए में बेच दिया गया. उसे एक जाट युवक की पत्नी बनाने के लिए यहां लाया और बेचा गया था.

डरा धमका कर शीबा की शादी कर दी गई और उसके साथ जोर जबरदस्ती करके उसका मुस्लिम नाम बदलवा कर हिन्दू रखवाया गया. उसका धर्म परिवर्तन करवाया गया और चौबीसो घंटे निगरानी की जाने लगी. छह माह बाद वह गर्भवती हो गई.

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करीब एक सप्ताह पहले उसने किसी तरह अपने माता-पिता को फोन लगाया, जो अपनी बेटी को ढूंढने में लगे हुए थे. इसके बाद शक्ति वाहिनी नाम के एक एनजीओ के लोग हरियाणा पहुंचे और स्थानीय पुलिस की मदद से शीबा को मुक्त करवाया.

एनसीआरबी के आंकड़ों के मुताबिक पिछले एक दशक से लड़कियों और महिलाओं की देश भर में तस्करी बढ़ गई है.

फिलहाल शीबा भिवानी पुलिस थाने में है और अपने माता-पिता का इंतजार कर रही है. पांच माह की गर्भवती शीबा को अपने गर्भ में पल रहे बच्चे के बारे में कुछ समझ नहीं आ रहा, क्योंकि पांच माह का हो जाने के बाद अब उसका गर्भपात करवाना भी मुश्किल है.

नाबालिग लड़कियों की तस्करी

राष्ट्रीय अपराध रिकॉर्ड ब्यूरो (एनसीआरबी) द्वारा गत वर्ष जारी किए गए आंकड़ों के अनुसार मानव तस्करी का यह दूसरा सबसे बड़ा अपराध 14 गुना बढ़ा और वर्ष 2014 में 65 प्रतिशत बढ़ा है.

मानव तस्करी विरोध दिवस के मौके पर कैच इस विषय को उठा रहा है. इस रपट, जिसमें काफी दूर-दूर तक फैले इस अपराध के अनदेखे पहलुओं, अपराध के नए तौर-तरीकों, इसके बढ़ते बाजार और महिलाओं के इस अवैध बाजारीकरण के नए तौर तरीकों पर प्रकाश डाला गया है ताकि इस बात पर गौर किया जा सके कि अपराधियों और दोषियों के खिलाफ कार्यवाही में कमी और उन्हें खुला छोड़ देना ही मानव तस्करी के मौजूदा भयावह तस्वीर का कारण है.

आदिवासी, मुस्लिम और बच्चे

असम से सीआईडी की एक रिपोर्ट के अनुसार वर्ष 2012-15 में 5,000 से ज्यादा बच्चे लापता हुए. छत्तीसगढ़ और झारखंड के आदिवासी परिवारों में से किसी न किसी परिवार की बेटी का गायब होना रोजमर्रा की बात है. दो हफ्ते पहले इलाहबाद से 32 युवतियों को छुड़वाया गया था. ये सब छत्तीसगढ़ के गांवों के जंगलों से थीं. इनमें से 18 नाबालिग थीं.

एनजीओ शक्ति वाहिनी के ऋषिकांत ने कैच को बताया, 'इन लड़कियों से उत्तर प्रदेश में मजदूरी करवाई गई, इलाहाबाद में देह व्यापार में धकेला गया. इन्हें हर कुछ माह में अपने परिवार से मिलने भेज दिया जाता था.'

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टाइम्स ऑफ इंडिया की एक रिपोर्ट के अनुसार वेश्यावृत्ति के लिए कुख्यात उत्तर प्रदेश के बराऊ गांव से लड़कियों की तीसरी खेप राज्य में लौटी है. ये लड़कियां बलोड और राजनंद गांव की हैं. इससे पहले जो लड़कियां आईं वे जांजगीर-चम्पा, बलोडा बाजार और कोरबा के आस-पास के गांवों की थीं.

सीआईडी के अतिरिक्त पुलिस महानिदेशक राजीव श्रीवास्तव ने अखबार को बताया 'छत्तीसगढ़ की आदिवासी लड़कियों की तस्करी सबसे ज्यादा होती है लेकिन ऑपरेशन स्माइल और किसी व्यक्ति के लापता होते ही एफआईआर दर्ज करने की हमारी टीम की कड़ी मेहनत का नतीजा है कि मानव तस्करों पर दबाव बढ़ा है. मेट्रो को छोड़ कर ये लोग अर्धशहरी इलाकों तक पहुंचने लगे हैं, जहां खतरा कम है. लेकिन ग्रामीण इलाकों में मानव तस्करी की दरें उच्च स्तर पर पहुंच गई हैं. हम पंचायत स्तर से सूचनाएं जुटा रहे हैं.'

ऋषिकांत कहते हैं, 'सांवले रंग की लड़कियों की मांग कुछ ज्यादा है. छत्तीसगढ़ और झारखंड के ग्रामीण इलाकों की आदिवासी लड़कियों की तस्करी सर्वाधिक होती है.'

मानव तस्करी के अपराध मेें लिप्त एक व्यक्ति ने नाम न छापने की शर्त पर बताया, 'सबसे ज्यादा चिंताजनक स्थिति यह है कि मुस्लिम लड़कियों को हरियाणा में बेच कर जबरन जाट युवकों से शादी करवाई जा रही है. मैं गारंटी के साथ कह सकता हूं कि असम और बंगाल के गांवों से लाई जाने वाली दस में से 7 लड़कियां मुस्लिम हैं. उन्हें अपना नाम, पहचान और धर्म बदलने को मजबूर किया जाता है और नौकरों की तरह रखा जाता है.'

भारत में मानव तस्करी के सर्वाधिक मामले पश्चिम बंगाल में होते हैं. वर्ष 2013 में यहां 669 मामले मानव तस्करी के सामने आए जो कि देश भर में सर्वाधिक है. इसके बाद तमिलनाडु, आंध्र प्रदेश, कर्नाटक और महाराष्ट्र का नंबर आता है.

कम लोगों को सजा क्यों

कुछ सप्ताह पहले सीबीआई ने एक मानव तस्करी गिरोह का पर्दाफाश किया था. दिल्ली से 8,000 औरतों को दुबई भेजा गया. हाल ही में एक आदमी के झारखंड से 5,000 आदिवासी बच्चों की तस्करी करने की खबरें थीं. परन्तु ये धरपकड़ केवल नाम मात्र का है. ज्यादातर मामले तो दर्ज ही नहीं होते और न ही पकड़े जाते हैं.

मानव तस्करी के मामले पिछले पांच सालों में 38.3 प्रतिशत बढ़ गए. 2009 में 2,848 मामले थे, जो 2013 में बढ़कर 3,940 हो गए. इनमें से केवल 45 मामलों में सजा हुई. 2009 में जहां 1,279 मामलों में सजा हुई, वहीं 2013 में केवल 702 मामलों में.

ऋषिकांत कहते हैं मामलों में कम दोषी ठहराए जाने के लिए न्यायपालिका जिम्मेदार है. ज्यादातर लड़कियां दूर दराज के इलाकों से आती हैं. आत्मविश्वास की कमी के चलते ये लड़कियां ठीक से बात भी नहीं कर पाती. एफआईआर दर्ज करने के दौरान पूछताछ अधिकारी लड़कियों से अजीबोगरीब असंवेदनशील सवाल पूछते हैं और जब लड़कियां ढंग से जवाब नहीं दे पातीं तो मामला ही दर्ज नहीं हो पाता. एफआईआर से केवल यही पता चलता है कि पीड़ित कहां से पकड़ा गया. तस्करी का अगर सिरे से पता लगाया जाए तो बहुत से लोगों को सजा हो सकती है.

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ऋषिकांत कहते हैं एक बार रिपोर्ट दर्ज होने के बाद पीड़ित को सरकारी वकील का असंवेदनशील बर्ताव झेलना पड़ता है. पीड़ित को कभी कोई अच्छा वकील नहीं मिलता. केवल आरोपियों के वकील एक तरह से एकतरफा केस लड़ते हैं क्योंकि उनका हर सवाल पीड़ित महिला को और कमजोर कर देता है.

कुछ साल पहले मिदनापुर से अपहृत एक लड़की ने जीबी रोड से खुद दीवार तोड़कर जान बचाई थी. उसने एक नौकरी पेशा व्यक्ति से शादी कर ली थी, जिससे उसे प्यार हुआ था. आज उसके दो बच्चे हैं. अब जब पलिस उसे पूछताछ के लिए बुलाती है तो वह आने से मना कर देती है. वह बेदर्द न्यायपालिका के साथ अपने बुरे अनुभवों को याद नहीं करना चाहती.

First published: 1 August 2016, 7:12 IST
 
श्रिया मोहन @shriyamohan

एडिटर, डेवलपमेंटल स्टोरी, कैच न्यूज़

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