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हैदराबाद सेंट्रल यूनीवर्सिटी की जेएनयू को सलाह: जाति को दफन करो

सौरव दत्ता | Updated on: 11 April 2016, 9:07 IST
QUICK PILL
  • हैदराबाद सेंट्रल यूनीवर्सिटी के दलित छात्र रोहित वेमुला की आत्महत्या की \r\nपृष्ठभूमि में आयोजित परिचर्चा इस बात पर केंद्रित रही कि वर्तमान में \r\nसत्ताधारी केंद्र सरकार किस तरह बारीक तरीके से जातिगत-भेदभाव कर रही है.
  • हैदराबाद सेंट्रल यूनीवर्सिटी के प्रोफेसरों ने कहा कि पहले जातिगत भेदभाव का तरीका अपरिपक्व होता था जैसे \r\nछात्रावास देने से मना कर देना, आम नल से पानी पीने के अधिकार से वंचित कर \r\nदेना आदि.

कुछ दिन पहले जब आईआईटी की फीस में भारी वृद्धि की घोषणा की जा रही थी तब स्मृति ईरानी के मानव संसाधन विकास मंत्रालय ने चतुराई बरतते हुए अनुसूचित जाति/जनजाति की पृष्ठभूमि से आने वाले छात्रों को फीस वृद्धि के दायरे से बाहर कर दिया.

उससे पहले, रोहित वेमुला की आत्महत्या (जिसके बारे में कई दलित समूहों का जोर देकर कहना है कि वह एक “संस्थागत हत्या”के अलावा कुछ नहीं था) पर बोलते हुए संसद में स्मृति ईरानी ने जोर देकर कहा था कि इस हादसे से जाति का कोई लेना-देना नहीं था.

मानव संसाधन विकास मंत्रालय अपनी एक हालिया रिपोर्ट में कुछ चुनिंदा शिक्षण संस्थानों को "उत्कृष्टता के केंद्र” का दर्जा देते हुए बहुत खुश था. इन संस्थानों की सूची में तीसरा नंबर जवाहरलाल नेहरू यूनीवर्सिटी का था जबकि चौथे स्थान पर हैदराबाद सेंट्रल यूनीवर्सिटी थी.

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बहरहाल पांच अप्रैल को एक पैनल परिचर्चा में हैदराबाद सेंट्रल यूनिवर्सिटी के दो प्रोफेसरों- टी रथनाम (समाजशास्त्र) और तथागत सेनगुप्ता (गणित और सांख्यिकी) ने जेएनयू की एक असेम्बली को बताया कि तथाकथित 'उत्कृष्टता के केंद्र' जाति आधारित भेदभाव और सामाजिक बहिष्कार के अड्डे भी हैं.

भेदभाव के "परिष्कृत” तरीके

हैदराबाद सेंट्रल यूनीवर्सिटी के दलित छात्र रोहित वेमुला की आत्महत्या की पृष्ठभूमि में आयोजित यह परिचर्चा इसी बात पर केंद्रित रही कि वर्तमान में सत्ताधारी केंद्र सरकार (संविधान के अनुच्छेद 17 में प्रतिबंधित होने के बावजूद) किन बारीक तरीकों से जातिगत-भेदभाव को बढ़ावा दे रही है.

उदाहरण के तौर पर केंद्र सरकार ऐसे चुनिंदा लोगों को शैक्षणिक प्रशासनिक पदों पर नियुक्त कर रही है जो लोग अपने जातिवादी पूर्वाग्रह अपने सीने पर चिपकाए रहते हैं.

प्रोफेसरों ने कहा कि पहले जातिगत भेदभाव का तरीका अपरिपक्व होता था- जैसे छात्रावास देने से मना कर देना, आम नल से पानी पीने के अधिकार से वंचित कर देना आदि. लेेकिन अब यह भेदभाव बहुत परिष्कृत रूप ले चुका है.

उदाहरण के तौर पर- “मेरिट” की आड़ में शैक्षणिक प्रशासक दलितों, अनुसूचित जाति और अनुसूचित जनजाति के छात्रों को बाहर रखने के लिए अपनी सीमा से पार भी चले जाते हैं. इन छात्रों को वे प्रसासक अक्सर कक्षा में अपमानित करते हैं.

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इतना ही नहीं, वे हाशिए पर रह रहे समुदायों के छात्रों की उस आर्थिक सहायता को काट देने या पूरी तरह बंद कर देने के लिए भी काम करते हैं जिनके न सिर्फ वे छात्र हकदार होते हैं, बल्कि उन्हें इसकी सख्त जरूरत भी होती है.

छात्रों की आर्थिक सहायता को काट देना या पूरी तरह बंद करना सही नहीं था

यह धीरे-धीरे छात्रवृत्ति की मंजूरी को रोकने का रूप धारण कर लेता है (जो अन्य कारकों के साथ मिलकर अंत में किसी गरीब रोहित को अपनी ही जिंदगी खत्म कर लेने पर मजबूर कर देता है). साथ ही, वे पहले से आवंटित छात्रवृत्ति को मंजूरी देने में टांग अड़ाने लगते हैं.

प्रोफेसरों ने यह भी कहा कि हैदराबाद सेंट्रल यूनिवर्सिटी ने भी अनुसूचित जाति/जनजाति के छात्रों के लिए अलग से गोल्ड मेडल स्थापित किया है, क्योंकि इस यूनीवर्सिटी का मानना था कि मेरिट तो सिर्फ कुछ लोगों का ही विशेषाधिकार है अर्थात वह तो कुछ लोगों की पहुंच तक सीमित है.

क्या सरकार अम्बेडकर के खिलाफ है?

प्रोफेसरों ने जोर देकर कहा कि सरकार जातिवाद और पूंजीवाद के खिलाफ बोलने वाली ताकतों के एकजुट होने के खिलाफ है.

उन्होंने जिक्र किया कि किस तरह मार्क्सवादी विचारधारा रखने वाले अम्बेडकर स्टडी सर्कल्स को हैदराबाद यूनिवर्सिटी के डिस्कशन हॉल में प्रवेश देने से रोक दिया गया.

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उन्होंने इस बात के लिए सरकार की खिंचाई की कि वह बीआर अम्बेडकर को सिर्फ एक संविधान के विद्वान के रूप में घोषित करने की कोशिश कर रही है. जबकि दूसरी ओर वही सरकार जाति एवं धर्मनिरपेक्षता पर अम्बेडकर के कट्टर विचारों और आदर्शों को कुचल रही है.

गौरतलब है कि वर्तमान केंद्र सरकार की आलोचना में वे वाम दल भी शामिल हैं, जिन पर प्रोफेसरों ने आराेप लगाया कि वे वर्ग की बात कर जाति की सच्चाई को दबा देते हैं.

पुलिस बर्बरता की आलोचना

22 मार्च को हैदराबाद में पुलिस बलों ने एक इस तरह की कार्रवाई शुरू की, जैसी कभी-कभा ही देखने को मिलती है. दोनों प्रोफेसरों ने आरोप लगाया कि पुलिसकर्मियों का एक दल, जिसमें सिर्फ पुरुष थे, हैदराबाद सेंट्रल यूनीवर्सिटी के परिसर में घुस आया और छात्रों पर बल प्रयोग शुरू कर दिया. उनको छात्राओं को दबोचने और छेड़छाड़ करने में जरा भी झिझक नहीं थी.

उन्होंने छात्राओं को बालों से पकड़कर घसीटा, कुछ के कपड़े भी फाड़ डाले. पानी और भोजन की आपूर्ति बंद कर दी गई थी. जो लोग यूनिवर्सिटी परिसर में रह रहे थे, उन्हें प्रताडि़त होने और बयान न की जा सकने वाली पीड़ा झेलने के लिए छोड़ दिया गया था.जाहिर है, यह पुलिस कार्रवाई हैदराबाद सेंट्रल यूनिवर्सिटी के कुलपति अप्पा राव पोदिल्ले के इशारे पर हुई थी, जिन्हें वर्तमान सत्तारूढ व्यवस्था का चहेता माना जाता है.

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ये दोनों प्रोफेसर जो बहुत अलग शैक्षणिक (और राजनीतिक) पृष्ठभूमि से आते हैं. एक गणित से हैं तो दूसरे राजनीति शास्त्र की पृष्ठभूमि वाले, लेकिन फिर भी दोनों इस बात पर एकमत थे कि अप्पा राव नैतिक तौर पर किसी विश्वविद्यालय के कुलपति होने के लिए उपयुक्त नहीं हैं.

यह निंदा मानव संसाधन विकास मंत्रालय के उस फैसले के बाद सामने आई है, जिसमें मंत्रालय ने (रोहित वेमुला की आत्महत्या के कारण निलंबित) अप्पा राव को कुलपति पद पर बहाल करने का निर्णय लिया है. उन्हीं अप्पा राव को, जिन्होंने कथित तौर पर पुलिस कार्रवाई का आदेश दिया था.

जाति और उच्च शिक्षा का निजीकरण

सुप्रीम कोर्ट ने टीएमए पई (2001) और पीए इमामदार (2005) जैसे मामलों में ऐतिहासिक व्यवस्थाएं दी हैं. उसी सुप्रीम कोर्ट ने कहा है कि जो संस्थान सरकारी सहायता का लाभ नहीं लेते, उनमें प्रवेश और उनकी प्रशासनिक नीतियां बनाने या उन्हें इस बारे में सलाह देने का काम सरकार न करे.

चर्चा में पैनलिस्ट के तौर पर शामिल दिल्ली यूनिवर्सिटी के राजनीति शास्त्र के प्रोफेसर एन. सुकुमार ने कहा कि माना जाता है कि इन्हीं दो व्यवस्थाओं ने शिक्षा के निजीकरण का मार्ग प्रशस्त किया. इन्हीं ने जाति आधारित भेदभाव को और गहरा कर दिया.

प्रो. सुकुमार ने कहा कि चूंकि सरकार द्वारा संचालित ऐसे संस्थानों की पहले ही कमी है (जो जाति आधारित भेदभाव को कुछ हद तक कम करने वाली आरक्षण नीतियां लागू करने को बाध्य हैं), सुप्रीम कोर्ट द्वारा इस तरह की "छूट" सिर्फ जाति पूर्वाग्रह को गहरा करने में सहायता करती है.

इस चर्चा का महत्व ऐसे माहौल में बढ़ जाता है जहां सांप्रदायिक हिंसा और जातिवादी संघर्ष व्याप्त है और सरकार पर शिक्षा के "भगवाकरण” के आरोप लग रहे हैं.कोई संदेह नहीं कि हवा में "स्मृति ईरानी मुर्दाबाद" और "रोहित वेमुला जिंदाबाद" के नारे तैर जाते हैं. हम जोर से तालियों के साथ इसका स्वागत कर रहे हैं.

First published: 11 April 2016, 9:07 IST
 
सौरव दत्ता @SauravDatta29

Saurav Datta works in the fields of media law and criminal justice reform in Mumbai and Delhi.

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