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'मैं सेना से हूं और जेएनयू का समर्थन करती हूं'

प्रियता ब्रजबासी | Updated on: 10 February 2017, 1:51 IST
QUICK PILL
  • मेरे लिए सेना का मतलब सभी तरह की आजादी के अधिकारों की रक्षा करने से हैं. इसमें अभिव्यक्ति की आजादी भी शामिल है जो आज खतरे में है. वह केवल भारत की सीमा की रक्षा नहीं करते हैं बल्कि भारत के विचार की भी रक्षा करते हैं. 
  • मैं कश्मीर में अफ्सपा की वजह से होने वाली परेशानियों के प्रति उदासीन \r\nनहीं रह सकती. इस अमानवीय कानून के तहत हुई सैंकड़ों मौतो को मैं नजरअंदाज \r\nनहीं कर सकती. मैं कश्मीर में बनने वाली सरकारों द्वारा घाटी में शांति \r\nबहाली में असफलता को भी दरकिनार नहीं करती हूं.

करीब 10 दिनों पहले मैंने जेएनयू मामले में सरकार की कार्रवाई के खिलाफ फेसबुक पर एक पोस्ट लिखा था जो अभिव्यक्ति की आजादी के समर्थन में था. चौंकाने वाली खबर उस पोस्ट पर मिली प्रतिक्रिया रही. 

मेरे स्टेटस पर जिन लोगों ने कॉमेंट किया उनमें से अधिकांश मेरे दोस्त थे और सेना से जुड़े हुए थे. इनमें से कुछ सेना के अधिकारी भी थे. सामान्य प्रतिक्रिया यह थी कि मैं कैसे उस संस्थान का समर्थन कर सकती हूं जो अफजल गुरु जैसे आतंकी की फांसी का विरोध करता है. या फिर जो देश के टुकड़े करने के विचार का समर्थन करता है.

मैं कैसे जेएनयू के राष्ट्रद्रोहियों के विचार और अभिव्यक्ति के अधिकार का समर्थन कर सकती हूं जबकि देश की सीमा पर जवान हमारी आजादी की खातिर लड़ते हुए जान दे रहे हैं?

तर्क से चिंता

इससे मुझे चिंता हुई. इस बात से नहीं कि वह मेरा विरेाध कर रहे थे बल्कि उनके विचारों को देखकर मुझे चिंता हुई. अगर सीमा पर जवान हमारी और हमारी बोलने की आजादी की सुरक्षा में जान दे रहे हैं तो फिर मुझे जेएनयू और उसके छात्रों को समर्थन देकर उनका अपमान नहीं करना चाहिए.

कुछ दिनों पहले बीजेपी सांसद अनुराग ठाकुर ने जेएनयू मसले को लेकर संसद में भाषण दिया था. उन्होंने कैप्टन पवन कुमार और कैप्टन महाजन के साथ लांसनायक हनुमंथप्पा कोप्पड की शहादत का जिक्र किया. उन्होंने कहा कि जब सीमा पर जवान मर रहे हैं तब संसद में बैठे लोग (उनका इशारा कांग्रेस की तरफ था) एक ऐसे संस्थान का समर्थन कर रहे हैं जो माओवाद का समर्थन करता है और उन छात्रों को बोलने का मौका देता है जो देश को तोड़ने की बात करते हैं.

हालांकि मैं इस मामले के राजनीतिक पक्ष में नहीं जाना चाहती (कश्मीर में भाजपा की सहयोगी अफजल गुरू की फांसी का विरोध करती है). इस तरह की तुलना की शुरुआत कुछ पत्रकार, नेता और मीडिया की तरफ से की गई.

संतुलन की मजबूरी

मुझे आश्चर्य हुआ कि जेएनयू के पक्ष में बोलकर मैंने कैसे उस संस्थान का अनादर कर दिया जिसमें मेरा जन्म हुआ है. वैसा संगठन जिसमें मेरा विश्वास है. वैसा संगठन जहां मेरे पापा ने 35 सालों तक सेवा की. मेरे दादा, चाचा, जीजा सबने सेना की सेवा की है.

मेरे लिहाज से इन दोनों चीजों में कोई संबंध नहीं है. मेरे लिए सेना का मतलब सभी तरह की आजादी के अधिकारों की रक्षा करने से हैं. अभिव्यक्ति की आजादी का भी जो आज खतरे में है.

सेना का काम इन अधिकारों की रक्षा करना है न कि इनकी राह का रोड़ा बनना. वे सिर्फ भारत की सीमाओं की रक्षा नहीं करते हैं बल्कि उस विचार की भी रक्षा करते हैं जिससे मिलकर भारत बना है. और बारत के इस विचार में बहस-मुबाहिसा भी महत्वपूर्ण स्थान रखता है. इस दौरान कई बार असहज स्थितियां भी पैदा हो जाती है.

तो क्या आप चीन जैसे समाज में रहना चाहेंगे? जहां मानवाधिकारों पर कई तरह की बंदिशें हैं

सेना हमारे सीमा की सुरक्षा करती है जिसकी सीमा पाकिस्तान और चीन से लगी हुई है. चीन पूरी दुनिया को अपनी अर्थव्यवस्था के दम पर धमका रहा है और वह अगला सुपर पावर बनने की राह पर है. तो क्या हम चीन जैसे समाज में रहना चाहेंगे? जहां मानवाधिकारों पर कई तरह की बंदिशें हैं. जहां सरकार सबसे बड़ी है.  या फिर पाकिस्तान जहां नागरिकों का अधिकार सरकार की सबसे आखिरी चिंता है.

मैं जेएनयू के राष्ट्रविरोधी होने के आरोप का विरोध करती हूं. मैं देशद्रोह के आरोप में कन्हैया कुमार की गिरफ्तारी की विरोध करती हूं. मैं जेएनयू के खिलाफ पुलिसिया कार्रवाई की निंदा करती हूं.

मैं पटियाला हाउस कोर्ट के बाहर छात्रों औऱ पत्रकारों पर हुए हिंसक हमले का विरोध करती हूं. मैं सरकार के उस दावे का विरोध करती हूं कि जेएनयू के कार्यक्रम को हाफिज सईद का समर्थन था. लेकिन मैं उन कुछ नारों का समर्थन भी नहीं करती जो नौ फरवरी को जेएनयू में लगाए गए थे. इतनी समझ है मुझमें.

मैं कौन हूं

मैं जब यह कहती हूं कि मेरा संबंध सेना से है तो उसका मतलब यह होता है कि मैं एक सेना के अधिकारी की बेटी हूं. मेरे पिता सेना में करीब 35 सालों तक सर्जन रहे हैं और वह हाल ही में में रिटायर हुए हैं. उन्हें 16 कैंटोनमेंट्स में पोस्टिंग दी गई थी और वह करियर के दौरान लगातार पूरे देश में घूमते और सेवा देते रहें. 

उन्होंने कई बार बेहद कठिन स्थितियोंं में सेना की सेवा की है. आज बी वे मेरे बहुत से विचारों से सहमत नहीं होते.

मेरी मां भी सेना में मेडिकल कॉर्प्स में नर्सिंग ऑफिसर थीं. सेना में मेरे परिवार की तीन पीढ़ी है और मेरे अधिकांश दोस्त सेना में है.

मैंने एक सेना की जिंदगी गहराई से जी है. पूरी जिंदगी में 8 बार स्कूल बदलने पड़े. जब मेरे पापा फील्ड ड्यूटी पर होते थे तब मैं अलग-थलग पड़े फैमिली क्वार्टर में रहती थी.

मेरे पापा बंगाली ब्राह्मण जबकि मेरी मां क्रिश्चियन हैं. यह मैं इसलिए बता रही हूं क्योंकि मैं हमेशा हिंदू और ईसाई पहचान को लेकर भ्रम में रही. मेरी मां और पापा अक्सर कहा करते कि अगर कोई तुमसे यह पूछता है कि तुम कौन हो, तो तुम उन्हें बताना कि मैं भारतीय हूं.

जिन लोगों ने 9 फरवरी को जेएनयू में नारे लगाए वह भी भारतीय ही थे. मैं कहना चाहती हूं कि मैं उनसे सहमत नहीं हो सकती फिर भी मैं उसके पीछे की भावना समझ सकती हूं.

चूंकि मैं सेना पर गर्व है और सीमा पर उनकी सर्वोच्च बलिदान की किसी से तुलना नहीं हो सकती. सीमा पर उनकी सतत सेवा अनुकरणीय है. लेकिन मैं कश्मीर लंबे संघर्षपूर्ण इतिहास और वहां के लोगों से खुद को अलग नहीं कर सकती. मैं वहां कोलैटरल डैमेज के नाम पर लापता हो गए अनगिनत लोगों और असंख्य मौतों से अछूती नहीं रह सकती. 

मैं कश्मीर में अफ्सपा की वजह से होने वाली परेशानियों के प्रति उदासीन नहीं रह सकती. इस अमानवीय कानून के तहत हुई सैंकड़ों मौतो को मैं नजरअंदाज नहीं कर सकती. मैं कश्मीर में बनने वाली सरकारों द्वारा घाटी में शांति बहाली में असफलता को भी दरकिनार नहीं करती हूं.

अगर मैं कश्मीर में अफ्सपा के कारण लोगों हो रही दुश्वारियोंं के कारण समर्थन नहीं कर सकती

कुछ साल पहले मैं कश्मीर घाटी के एक मुस्लिम दोस्त से मिली. उसके साथ बातचीत में मुझे पत चला कि वह कश्मीर की पूरी आजादी के पक्ष में है. इसने मुझे गुस्से से भर दिया.

मैंने उसे लंबा भाषण सुना दिया कि कैसे सेना आतंकियों से कश्मीरियों और देश की सुरक्षा के लिए खुद को वहां मार रही है. मैंने उससे कहा कि इस देश ने उसे इतना कुछ दिया फिर भी वह कितना एहसान फरामोश है.

उसने जवाब दिया कि उसके पास कुछ नहीं है. नब्बे के दशक में आतंकवाद के उभार के बाद अपनी आजीविका गंवा देने के बाद वह अलगाववादी बना था. वह तब तक अलगाववादी नहीं था जब आफ्सपा के कारण उसके चाचा को मार दिया गया. उसकी इस बात ने मुझे असहज कर दिया. लेकिन ऐसा मैं पहली बार नहीं सुन रही थी.

उसने कहा, जब आप अपने बचपन से सिर्फ अस्थिरता और हिंसा देखते हैं, लोकतंत्र जब तानाशाही की तरह काम करता है, पुलिस भरोसेमंद न हो, सरकार अक्षम हो तब आपके सामने आत्मनिर्णय का अधिकार ही एकमात्र विकल्प रह जाता है.

उसने मुझसे पूछा अगर तुम मेरी जगह होती तो क्या करती. मैंने कहा पता नहींं.

मैं अभी तक उलझन में हूं. मैं ऐसे किसी स्थान पर नहीं रह सकती. अगर मैं आफ्स्पा के समर्थन में कोई तर्क नहीं दे सकती तो फिर मैं इसका बचाव भी नहीं कर सकती.

सेना की सीख

सेना ने मुझे धर्म के आधार पर किसी के साथ भेदभाव नहीं करने के लिए सिखाया है. इसलिए जब उमर खालिद (स्वघोषित नास्तिक और कट्टर माओवादी) को मुस्लिम होने की वजह से निशाना बनाया गया तो मैंने उसका विरोध किया. जब मीडिया ने उसका ट्रायल किया और उसे जेहादी बोला तो मुझे लिखने के लिए मजबूर होना पड़ा.

सेना ने मुझे जाति और धर्म के आधार पर भेदभाव करना नहीं सिखाया है. इसलिए जब मुझे रोहित वेमुला को उसकी जाति की वजह से निशाना बनाया गया तो मुझे लिखना पड़ा. मैं जानती थी कि उसकी कहानी उसके साथ नहीं मरनी चाहिए.

उसकी आत्महत्या ने हमारे समाज में गहराई तक धंसी रूढ़ि को उजागर किया है और साथ ही सरकार की अकर्मण्यता को भी.

जीवन के हर मोड़ पर सेना ने मुझे समानता के बारे में सिखाया है. सेना ने मुझे भेदभाव और गलती के खिलाफ खड़ा होने के लिए सिखाया है.

आज जब हर तरफ देशभक्त और देशद्रोह को लेकर बहस छिड़ी है, लोकतंत्र पर खतरा कायम है, तब मैं अपनी इस सीख पर दृढ़ता से कायम हूं. मैं इतनी आसानी से राष्ट्रवाद के नाम पर कुछ निर्दोष छात्रों को खलनायक नहीं बनने दूंगी.

उनके विचार पर बहस हो सकती है. उनके दावों का विरोध हो सकता है. लेकिन उनके बोलने की आजादी के खिलाफ और उन्हें देशद्रोही घोषित कर देना राष्ट्रप्रेमी होने की मूल भावना के खिलाफ है. यह भारतीय लोकतंत्र की पहचान है जो हमे दूसरों से अलग करता है.

(लेख में व्यक्त विचार लेखक के निजी हैं. इन विचारों से संस्थान का सहमत होना जरूरी नहीं है)

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First published: 4 March 2016, 7:47 IST
 
प्रियता ब्रजबासी @priyatab

फोटो जर्नलिस्ट, कैच न्यूज

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