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'मुस्लिमों और ईसाईयों के लिए हमारा देश खतरनाक जगह बन गया है'

तपन बोस | Updated on: 10 February 2017, 1:46 IST
QUICK PILL
  • मुस्लिम,\r\nईसाइयों\r\nऔर अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता\r\nमें यकीन रखने वालों के लिए\r\nहमारा देश खतरनाक जगह बन गया\r\nहै.
  • 1980\r\nके दशक में\r\nसरकार के विरोध के बावजूद\r\nनेशनल अवार्ड की ज्यूरी ने\r\nतपन बोस की फिल्म को अवार्ड\r\nदिया था.\r\n\r\n\r\n\r\n

हमारे देश में बुनियादी आजादी, विवेक की आजादी, अभिव्यक्ति की आजादी, आंदोलन की आजादी गंभीर खतरे में है.

आजाद भारत के इतिहास में पहले ऐसा कभी नहीं कहा गया कि हमें क्या खाना है और क्या नहीं खाना है, हम किस तरह का संगीत सुन सकते हैं और क्या नहीं सुन सकते, कौन सी किताबें पढ़ सकते हैं और कौन सी नहीं.

सत्तारूढ़ पार्टी से संबंध रखने वाले और खुद को स्वंयभू रक्षक बताने वाले समूह लोगों को डरा-धमका रहे हैं, जान से मारने की धमकी दे रहे हैं. बुद्धिजीवियों-लेखकों की हत्या करने वाले बगैर किसी सजा के बेखौफ घूम रहे हैं.

पिछले 18 महीने में ये घातक प्रवृत्ति और बढ़ी है क्योंकि मौजूदा सरकार इन उन्मादियों को नियंत्रित करने के लिए शायद कुछ नहीं कर रही है.

भाजपा से प्रोत्साहन

सबसे चिंताजनक बात ये है कि केंद्र और राज्य सरकारों के कुछ मंत्री खुलकर इन गिरोहों को प्रोत्साहित कर रहे हैं. और अब, हमारे प्रधानमंत्री के चीफ-मेंटर आरएसएस सरसंघचालक मोहन भागवत ने ''गैर-भारतीय'' धर्मों यानी मुस्लिम और ईसाई इत्यादि से संबंध रखने वाले लोगों की जनसंख्या वृद्धि दर पर लगाम लगाने के लिए सरकार से जनसंख्या नीति तैयार करने को कहा है.

हम कह सकते हैं कि मुस्लिम, ईसाइयों और जो लोग आजादी और लोकतंत्र में विश्वास रखते हैं उनके लिए हमारा देश खतरनाक जगह बन गया है.

लेखकों, कलाकारों, फिल्मकारों, संगीतकारों, वैज्ञानिकों और व्यापार जगत के लोगों ने हमारी आजादी पर हो रहे हमलों, हत्याओं और हिंसा का विरोध किया है.

ज्यादातर लोगों ने अतीत में उनके काम को मान्यता देने वाले राष्ट्रीय पुरस्कारों को वापस किया है. उन्होंने इस उम्मीद से यह पुरस्कार वापस किए हैं कि इससे सरकार को हत्याओं के खिलाफ कार्रवाई करने के लिए प्रेरित किया जा सकेगा.

सरकार की प्रतिक्रिया

सत्तारूढ़ पार्टी इन लोगों की पीडा़ समझने में पूरी तरह से विफल रही है. कट्टरपंथियों को रोकने की और लोगों में फिर से भरोसा पैदा करने के बजाय भाजपा नेता लेखकों, फिल्मकारों, वैज्ञानिकों और कलाकारों के खिलाफ हो गए हैं. सरकार ने इनलोगों पर असहिष्णुता का हौव्वा खड़ा करने का आरोप लगाया है.

सरकार के मंत्रियों ने विरोध करने वाले लेखकों, फिल्मकारों, वैज्ञानिकों और कलाकारों को अपमानित किया है. और इन्हें भारत को नीचा दिखाने वाले विदेशी ताकतों का एजेंट बताया है.

जब फिल्म अभिनेता शाह रुख खान ने कहा कि असहिष्णुता देशभक्ति के खिलाफ अपराध है तो उनके बयान की प्रतिक्रिया में एक भाजपा नेता का कहना है कि खान की 'आत्मा पाकिस्तान में रहती है.

मैं अरुण जेटली के उस दावे से सबसे ज्यादा चकित हूं जिसमें उन्होंने कहा कि लेखक, फिल्मकार, वैज्ञानिक और कलाकार असहिष्णु हैं जबकि भारत में असहिष्णुता नहीं है.

दंभ एक गंभीर बीमारी है. इस बीमारी से पीड़ित व्यक्ति की दृष्टि बिगड़ जाती है, उनके देखने-सुनने और सोचने की क्षमता पर बुरा प्रभाव पड़ता है. मैं उम्मीद करता हूं कि वह बहुत जल्द इस बीमारी से उबर जाएंगे.

मेरी फिल्म को 80 के दशक में प्रतिबंधित कर दिया गया था. फिर भी नेशनल अवॉर्ड ज्यूरी सरकार के खिलाफ गई थी उसने मेरी फिल्म को पुरस्कार के लिए चुना था.

असहिष्णुता की संस्कृति लगातार मजबूत हो रही है. इससे निराश होकर मैंने अवार्ड लौटा रहे अपने दोस्तों का साथ देने का फैसला किया है. 80 के दशक में मेरी फिल्मों के लिए मुझे दो नेशनल अवॉर्ड मिले थे जिसे मैंने वापस कर दिया.

'एन इंडियन स्टोरी'' डॉक्यूमेन्ट्री भागलपुर पुलिस और विचाराधीन कैदियों पर बनी थी. यह घटना 1979-80 की है. और ''भोपाल: बियांड जेनोसाइड'' डॉक्यूमेन्ट्री 1984 में भोपाल में हुए विश्व के सबसे बड़े औद्यौगिक हादसे पर बनी है. इस हादसे में 2,500 लोग मारे गए थे. डॉक्यूमेन्ट्री में न्याय के लिए संघर्ष करते हुए पीड़ितों की भी कहानी है.

इन दोनों फिल्मों को उन समय की सरकार ने बैन कर दिया था. हमें मुकदमेबाजी की लंबी प्रक्रिया के बाद सेंसर प्रमाण पत्र मिला था. इन दोनों फिल्मों को बेस्ट ''नॉन-फिक्शन फिल्म'' की श्रेणी में मिला राष्ट्रीय पुरस्कार दिखाता है कि उन दिनों नेशनल अवॉर्ड ज्यूरी के सदस्य अपने निर्णय लेने के लिए स्वतंत्र थे और उन्हें सरकार की नाराजगी से डर नहीं था.

यह साफ है कि अब ऐसी आजादी नहीं है. मुझे विश्वास है कि जिस ज्यूरी ने इन फिल्मों को अवॉर्ड दिया है वो असहिष्णुता और डर के माहौल को खत्म करने में सरकार की असफलता के विरोध में मेरे पुरस्कार वापसी के फैसले की सराहना करेगी.

मुझे पूरी उम्मीद है कि मौजूदा सरकार सभी नागरिकों की जीवन और स्वतंत्रता की रक्षा के लिए कदम उठाएगी. सरकार अगर नागरिकों की सुरक्षा और स्वतंत्रता बचाने में नाकाम रहती है तो उसकी वैधता पर सवाल उठेंगे. और हम जल्द अराजकता की ओर जा सकते हैं.

(यह विचार व्यक्तिगत है और यह हमारे संस्थान की भावना को व्यक्त नहीं करता.)
First published: 12 November 2015, 3:15 IST
 
तपन बोस @catchhindi

राष्ट्रीय पुरस्कार विजेता फिल्मकार और डॉक्युमेंट्री निर्माता

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