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'मैं इस नए दक्षिणपंथ के भीतर एक नया वाममार्गी नहीं बनना चाहता'

श्रेयस शर्मा | Updated on: 10 February 2017, 1:51 IST

शुरुआत में ही साफ कर दूं कि मेरा झुकाव दक्षिणपंथी राजनीति की ओर है. मेरा परिवार हिंदू धर्म की सबसे पवित्र नगरी वाराणसी से ताल्लुक रखता है और जबसे राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ इस शहर में पहुंचा तब से उससे जुड़ा हुआ है.

मुझे अपने भारतीय होने पर गर्व है, हिंदू (हालांकि हर रोज मैं मंदिर जाना जरूरी नहीं समझता) होने पर गर्व है. मैं दुध से बने उत्पादों को पसंद करने वाला शुद्ध शाकाहारी व्यक्ति हूं और जैसे मेरा सरनेम बताता है कि मैं एक ब्राह्मण हूं (लेकिन मैं एक व्यक्ति के सरनेम के जरिए व्यक्तियोंं में श्रेष्ठता का अंतर नहीं करता). मेरा पालन-पोषण काफी हद तक सुविधासंपन्न परिवार में हुआ है.

दक्षिणपंथ और वामपंथ के बीच तय करना हो तो मैं खुद को दक्षिणपंथी दायरे में पाता हूं. मुझे लगता है कि अपनी निहित खामियों के बावजूद मुक्त बाजार बेहतर आर्थिक व्यवस्था है, और इसकी आज देश को किसी भी अन्य चीज के मुकाबले सबसे ज्यादा जरूरत है. मेरा मानना है कि एक बेहतर भारत का निर्माण करने के लिए समान नागरिक संहिता को लागू करना चाहिए जो कि भाजपा का चुनावी वादा भी था.

मेरा मानना है कि वर्तमान समय में भारतीय वामपंथ की जो दशा है वह बेहद पुरानी पड़ चुकी है (सीपीआई, सीपीएम) या फिर शोर मचाने वाली हिंसक औऱ जनविरोधी है (माओवादी) है. इतिहास इस बात का गवाह है कि हिंसारहित साम्यवाद पूरी दुनिया में विफल सिद्ध हुआ है.

मैं मानता हूं कि नाम के पहले या आखिरी शब्द को ध्यान में रखे बिना इस देश के गरीब और वंचितों की दशा ऊपर उठाने की जरूरत है न कि बैसाखी की.

अस्वीकार्य नारे

दिल्ली विश्वविद्यालय के एक छात्र के रूप में एक दशक से अधिक वक्त तक मैंने गर्व के साथ जेएनयू के वाम आंदोलन का मजाक उड़ाया है.

अभी भी मैं कह रहा हूं कि जो नारे जेएनयू परिसर में लगाए गए वे अस्वीकार्य थे.

मैं उन लोगोंं को पसंद नहीं करता लिहाजा उनकी कारस्तानी मुझे अस्वीकार्य हैं. मैं यह स्वीकार नहीं कर सकता क्योंंकि मेरा मानना है कि मैं एक महान देश का नागरिक हूं, और मैं किसी को भी जो इसे हजार टुकड़ों में विभाजित करने की बात करते सुन नहीं सकता.

लेकिन मैं यह भी स्वीकार नहीं कर सकता कि कोई इसके लिए कन्हैया कुमार को राजद्रोह के आरोप में गिरफ्तार कर ले, उमर खालिद को जैश-ए-मोहम्मद का सदस्य घोषित करे, अदालत के बाहर रिपोर्टिंग करने गए पत्रकारों को पीटे. और जब यह सब हो रहा था तब हमारे पास एक पुलिस कमिश्नर है जो किसी फिल्म की लाइनें सबके साममने गुनगुना रहा था कि आगे आगे देखिए होता है क्या.

मैं उमर खालिद नहीं हूं. मैं कन्हैया कुमार नहीं हूं. पिछले हफ्ते से पहले तो मुझे उनके बारे में कुछ भी पता नहीं था

पिछले एक सप्ताह से अधिक वक्त से मैं फेसबुक और ट्विटर से दूरी बनाए हुए हूं. मैं जो भी कुछ देख रहा हूं वो जेएनयू के इर्द-गिर्द मसलन राष्ट्र विरोधी, कन्हैया, उमर, बस्सी, अर्नब और पटियाला हाउस अदालत में हिंसा के इर्द-गिर्द सिमटा हुआ है. इसके खिलाफ जो नाम मेरे सामने आ रहे हैं वो हैं, भक्त, सेक्युलर, प्रेस्टीट्यूट, राष्ट्र विरोधी, गद्दार और देशद्रोही.

इसी समय में एक परिचित की फेसबुक पोस्ट मेरे सामने आई है. वे अक्सर खुद को नरेंद्र मोदी और भाजपा समर्थक या आजकल की प्रचलित शब्दावली में भक्त हैं. वे लिखते हैं, "कुछ लोगों ने जेएनयू में राष्ट्र विरोधी नारे लगाए. जेएनयू को बंद किया जाना चाहिए. मेरे फ्रिज में कुछ महीने पुरानी रोटी थी जो बदबूदार हो गई. मैंने इसे फ्रिज से बाहर फेंक दिया."

यह पढ़कर मुझे धक्का पहुंचा. हम जो हर वक्त आरएसएस से बिना बहस किए दक्षिणपंथी बन जाते थे, आज हमारे पास इसका समर्थन करने के लिए कुछ नहीं है. हमें आज देशभक्तों और देश विरोधियों के बीच से किसी एक को चुनने की मजबूरी है.

विचारणीय सवाल

क्या मौर्य, गुप्त, चौहान और मुगलों से भरे भारत के इतिहास पर गर्व होना गलत है? क्या इस पर विश्वास करना गलत है कि हमनें दुनिया को आज के विज्ञान और गणित का आधार दिया?

क्या यह विश्वास करना गलत है कि आज दुनिया के सबसे बड़े लोकतंत्र की आधारशिला रखने वाले नेहरू, गांधी और आंबेडकर जो भले ही संपूर्ण नहीं थे लेकिन उन सभी के दर्शन और नीतियों से ही मौजूदा भारत सामने आया?

क्या हिंदू होने पर गर्व करना गलत है, जो मानता है कि इस धर्म कि जड़ें प्रकृति से जुड़ी होने के साथ ही यह जीवन के संकटों-परेशानियों के लिए बहुत ही प्रशंसनीय हल सुझाता है?

तो फिर क्यों 'राइट विंगर' (दक्षिणपंथी) को गलत नजरिये से देखा जाता है? ऐसा क्यों नहीं हो सकता कि मैं उपरोक्त बातों पर अपना यकीन कायम रखते हुए भी बौद्धिक और समझदार समाज के योग्य माना जाऊं? क्यों मुझे हर उस बदमाश के साथ जोड़ दिया जाता है जिसने दाभोलकर, पंसारे या कलबुर्गी को गोली मारी? क्यों मुझे गोडसे का वंशज बुलाया जाना चाहिए? क्या मैं हर एक वामपंथी को माओवादी (हिंसाप्रेमी) का तमगा दूं?

अगर मैं तुम्हारी हर बात से सहमत नहीं होता हूं तो यह मुझे राष्ट्र विरोधी, देशद्रोही या प्रेस्टीट्यूट नहीं बना देता

वहीं दूसरी ओर क्यों दक्षिणपंथी विचारधारा खुद को नफरत का पर्याय बनाती जा रही है?

क्यों हर उस व्यक्ति को पाकिस्तान भेज देना चाहिए जो मुझसे असहमत है? क्यों मुझे एक मुसलमान या एक ईसाई को 'अन्य' के रूप में देखना होगा? क्यों मुझे समलैंगिक होने पर तुच्छ व्यक्ति समझा जाएगा जबकि वह चुपचाप अपने बेडरूम कुछ भी करे क्या फर्क पड़ता है.

वह क्या है जो हमें इंसान बनाता है?

मेरी पत्नी और मैंने एक साल पहले एक कुत्ते को अपनाया. तब से हम पशुओं के व्यवहार को काफी बेहतर ढंग से समझने लगे.

जानवर एक उम्मीद के मुताबिक ही प्रतिक्रिया देते हैं. चाहे वो मेरा पालतू कुत्ता हो या एक आवारा, दोनों का एक ही आवेग होगा- अपने क्षेत्र की रक्षा, धमकी या डराने पर हमला, भोजन की तलाश और शारीरिक जरूरतों को पूरा करना.

हालांकि इंसान अलग हैं. हम में से हर कोई एक ही परिस्थिति में एक जैसी प्रतिक्रिया नहीं करता. 

जानवर एक उम्मीद के मुताबिक ही प्रतिक्रिया देते हैं. हालांकि इंसान अलग हैं

हमारी बातचीत करने की क्षमता हमें इससे अलग कर देती है. हममें से हर एक का एक अलग आवेग होता है, एक अलग प्रतिक्रिया होती है और एक अलग विचार होता है. कल्पना कीजिए एक बातचीत की जहां पर हर किसी का एक ही नजरिया हो और सभी एक दूसरे के साथ सहमत हों. यह कब तक जारी रह सकेगा?

मैं उमर खालिद नहीं हूं. मैं कन्हैया कुमार नहीं हूं. पिछले हफ्ते से पहले तो मुझे उनके बारे में कुछ भी पता नहीं था.

लेकिन अगर मैं उनसे मिलने और बातचीत के लिए जाऊंगा तो मैं उनसे अपने अलग राजनीतिक दृष्टिकोण की बहस करूंगा. मैं उन्हें पूंजीवाद और समान नागरिक संहिता के लाभ में निहित भावना देखने वाला बनाने की कोशिश करूंगा. लेकिन मुझे नहीं लगता है कि इससे काम बनेगा.

वे शायद मुझे यह समझाने की कोशिश करेंगे कि एक आर्थिक प्रणाली के रूप में समाजवाद, पूंजीवाद को पीछे कर सकता है, लेकिन वे शायद इसमें सफल नहीं होंगे.

तो हम क्या करें? एक शिकायत का पुलिंदा बनाएं? एक-दूसरे को मारें? या अपने जीवन के रास्ते पर आगे बढ़ चलें?

कन्हैया के खिलाफ राजद्रोह का आरोप लगाकर मौजूदा दक्षिणपंथी सरकार ने खुद को ही निशाना बना लिया है.

किसी भी तरह उन लोगों को खोजें जिन्होंने भारत विरोधी नारे लगाए और विश्वविद्यालय प्रशासन या पुलिस के स्तर पर उनके खिलाफ कार्रवाई की जाए.

लेकिन एक व्यक्ति जो अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता और असहमति के अधिकार का इस्तेमाल कर रहा है उसके ऊपर 'देशद्रोही' का तमगा न लगाएं.

दो संदेश

अपने साथियोंं को देने के लिए मेरे पास दो संदेश हैं. पहला दक्षिणणपंथी साथियों के लिए.

जिसपर तुम्हें गर्व है, मुझे भी उस पर गर्व है और तुम्हारी बहुत सी मांगों से मैं सहमत भी हूं. लेकिन जिस चीज से मै सहमत नहीं हूं वह यह कि हर गड़बड़ी हमें देशद्रोही या प्रेस्टीट्यूट नहीं बनाती.

दूसरा जेएनयू के उन लोगो से जो छात्रों के समर्थन में खड़े हैं.

कृपया अपनी बेहतर लड़ाई जारी रखें. मैं चाहता हूं आप लोग तर्क के साथ मुझसे बहस करें, ताकि हम बातचीत की यह प्रक्रिया जारी रख सकें जो हमें बेहतर इंसान बनाती है. हम दक्षिणपंथ के समर्थकों, भारत के समझदार लोगों को आप की जरूरत है, पहले से कहीं ज्यादा.

मैं इस नए दक्षिणपंथ के भीतर एक नया वाममार्गी नहीं बनना चाहता.

First published: 19 February 2016, 1:15 IST
 
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