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एक साल बाद कन्हैया कुमार: 'अगर मैं देशद्रोही हूं तो साल भर बाद भी पुलिस चार्जशीट क्यों नहीं दाखिल कर पाई'

अतुल चौरसिया | Updated on: 8 February 2017, 20:06 IST

ठीक एक साल पहले 8 फरवरी के दिन दिल्ली में एक बड़े विवाद की नींव पड़ी थी. इसने अगले तीन महीने तक दिल्ली और पूरे देश को अपनी जकड़ में बनाए रखा. इस विवाद ने पूरे देश को दो साफ हिस्सों में बांट दिया था. सारा विवाद काले-सफेद दो सफहों में देखा जाने लगा, बीच के किसी विचार या विमर्श के लिए जगह शेष नहीं बची थी.

दिल्ली के दक्षिणी सिरे पर स्थित जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय में साल भर पहले आठ फरवरी की शाम कुछ लोगों ने आज़ादी के नारे लगाए. देश के टुकड़े-टुकड़े होने की बातें कहीं. इस घटना के आरोप में जेएनयू छात्रसंघ के अध्यक्ष कन्हैया कुमार समेत तीन छात्रों को गिरफ्तार किया गया. उनके ऊपर देशद्रोह का आरोप लगा कर तिहाड़ जेल भेज दिया गया.

यूनिवर्सिटी के आम छात्रों पर देशद्रोह जैसे संगीन आरोप ने विवाद को और तूल दे दिया. दिल्ली पुलिस की अक्षमता इस बात में साबित हुई कि उसने जोड़तोड़ कर तैयार किए गए एक वीडियो को इतनी संगीन धाराओं में आरोप लगाने का मुख्य आधार बनाया. बाद में उन वीडियो की सत्यता पर तमाम संदेह और सवाल उठे.

इस पूरे विवाद में मीडिया के एक हिस्से की भूमिका भी काफी संदेहास्पद रही. निहित स्वार्थों और राजनीतिक उद्देश्यों के तहत उसने तथ्यों के साथ तोड़ मरोड़ की जिसके चलते यह पूरा विवाद दिनोंदिन और जटिल होता गया. बुरी तरह से बंटे हुए जनमानस के चलते छात्रों और कानून व्यवस्था का मामला थाने और यूनिवर्सिटी परिसर से बाहर निकल कर दिल्ली और देश की सड़कों तक फैल गया. दिल्ली के सबसे सुरक्षित इलाके इंडिया गेट के पास स्थित पटियाला हाउस कोर्ट परिसर में जब कन्हैया अपनी जमानत अर्जी पर सुनवाई के लिए पहुंचे तब भाजपा के कार्यकर्ताओं ने उनके साथ जमकर मारपीट की.

अंतत: कोर्ट ने उपलब्ध सबूतों के आधार पर 2 मार्च, 2016 को कन्हैया कुमार को सशर्त जमानत दे दी. कन्हैया फिलहाल जमानत पर हैं. कन्हैया के मुताबिक उनके मामले में आजतक कोई खास प्रगति नहीं हुई है. मामला जहां का तहां अटका हुआ है. कन्हैया बताते हैं कि अब तक पुलिस ने मामले में चार्जशीट तक दाखिल नहीं की है.

इस एक साल के दौरान और भी कई बातें हुई मसलन कन्हैया ने एकाधिक अवसरों पर सेमिनार और सभाओं में भाषण दिया, उन्होंने 'बिहार से तिहाड़ तक' नाम से अपने अनुभवों पर किताब भी लिखी. इस दौरान जेएनयू को बंद करने के लिए 'शटडाउन जेएनयू' जैसे अभियान कुछ दक्षिणपंथी समूहों द्वारा चलाए गए. इनमें भाजपा नेता सुब्रमण्यम स्वामी सबसे आगे थे.

इस विवाद का एक और पहलु भी है. जिन लोगों ने वास्तव में 8 फरवरी की शाम को जेएनयू में देशविरोधी नारे लगाए, पुलिस आज भी उन तक नहीं पहुंच सकी है. यह मामला फिलहाल ठंडे बस्ते में जा चुका है. पुलिस और सरकार में शामिल कुछ सूत्रों के मुताबिक ऐसा जानबूझकर किया गया, क्योंकि नारेबाजी करने वाले कुछ कश्मीरी छात्र थे जो वापस कश्मीर चले गए. सूत्रों के मुताबिक कश्मीर में पीडीपी के साथ भारतीय जनता पार्टी की साझा सरकार है जिसके चलते इस मामले में जांच आगे नहीं बढ़ाई गई.

आज साल भर बाद इतने बड़े विवाद को कन्हैया कुमार किस तरह से देखते हैं, उनकी राजनीतिक सोच में किस तरह का बदलाव या परिपक्वता आई है, ऐसे तमाम सवालों पर उनसे विस्तार से हुई बातचीत आप कैच पर देख सकते हैं.

First published: 8 February 2017, 20:06 IST
 
अतुल चौरसिया @beechbazar

एडिटर, कैच हिंदी, इससे पूर्व प्रतिष्ठित पत्रिका तहलका हिंदी के संपादक के तौर पर काम किया

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