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अगर मोदी पाकिस्तान से बातचीत बहाल कर पाए तो भारत माता उन्हें आशीर्वाद देंगी

सत्यब्रत पॉल | Updated on: 12 April 2016, 8:08 IST

हिंदू राष्ट्र में रहने का सबसे बड़ा फायदा यह है कि यहां कभी मृत्यु नहीं होती. मृत्यु असल में अगले जन्म की शुरुआत भर होती है. भारत माता जन्म देती है, और भारत माता उसे वापस ले लेती है. लेकिन भारत माता उसे अपने पास नहीं रखती बल्कि उसे बार-बार फिर से वापस करती रहती है. अगर मैं 'भारत माता की जय' नारे के शाब्दिक अर्थ पर जाऊं तो मेरी मातृभाषा बंगाली में इसका अर्थ होगा भारत माता कहां जा रही हैं? लिहाजा यह सुनते ही हम डर जाते हैं.

मेरे ख्याल से इस समय अभिसारिका के रूप में राष्ट्र की कल्पना एक शानदार विचार है. इससे पहले की इस तुलना के लिए हमें राष्ट्र विरोधी घोषित कर दिया जाय, यह काम कर लेते हैं. याद रहे भरत ने अपने नाट्यशास्त्र में दरबार में पेश होने वाली भाव-भंगिमाओं और मुद्राओं को परिभाषित किया था. इसमें स्त्री रूप में नृत्य की विभिन्न मुद्राओं को परिभाषित किया गया है. कलाहंतरिता यानी अपने कमरे में बैठकर सफलता का जश्न मनाना जैसी कि उफा के बाद हुआ.

वासकसज्जा यानि सज संवर कर हिस्सा लेना जैसा कि लाहौर की चाय पार्टी में हुआ. विरहोत्कंठिता यानी कहीं सफल होता न देखकर निराशा होना. खंडिता यानी आक्रामक हो जाना जैसा कि पठानकोट हमले के बाद हुआ. विप्रलब्धा यानी चोट खाकर वापस आना जैसा कि जेआईटी के दौरे के बाद हुआ. और इस सबके अंत में मंच पर अभिसारिका का पदार्पण होता है.

पाकिस्तानी जनरलों के लिए शांति सबसे बड़ा दु;स्वप्न है

लेकिन इन तुलनाओं का कोई मतलब नहीं है अगर रिश्तों का रोमांच खत्म हो जाय, रुमानियत चली जाय. पाकिस्तान के हाई कमीशन ने दावा किया है कि समग्र बातचीत की प्रक्रिया स्थगित कर दी गई है. उन्होंने अपने देश की भलाई के लिए एक झूठ फैलाया कि बातचीत की मौत हो गई लेकिन हमारे यहां भारत में कुछ भी मरता नहीं. भारत माता हमेशा उभयमुद्रा में रहती हैं. मृत्यु के बाद बार-बार जन्म होता रहता है जब तक कि आप अपना कर्म करते रहते हैं.

भारत माता के प्रधानमंत्री ही इस नए मंत्र का उच्चार कर सकते हैं ताकि मृतक की देह में दोबारा जान फूंकी जा सके. लेकिन अपने दो पूर्ववर्ती समकक्षों के विपरीत मौजूदा प्रधानमंत्री अगलेे जन्म के लक्ष्यों को लेकर भ्रमित हैं. अटल बिहारी वाजपेयी और मनमोहन सिंह अपने समय में शांति चाहते थे. एक अकल्पनीय चाहत. इससे पाकिस्तानी जनरल हमेशा आतंकित रहते थे. उनके लिए शांति सबसे बड़ा दु;स्वप्न है.

मोदीजी! यह कटु सत्य है, पाकिस्तान आतंकवाद नहीं छोड़ सकता

नरेंद्र मोदी के स्वप्न अपने पूर्ववर्तियों जैसे नहीं हैं. लेकिन मोदी के पूर्ववर्ती भी दो बार जनरलों और नवाज शरीफ के हाथ धोखा खा चुके हैं. लाहौर यात्रा से यह बात स्थापित हो चुकी है कि नवाज शरीफ एक अस्थिर और एकतरफा सोच वाले व्यक्ति हैं. दोनों के बीच यह घातक गठजोड़ है. ये सारे गैर जरूरी उकसावे जो पाकिस्तानी जनरल दे रहे हैं उसका मकसद शरीफ को अलग-थलग करना है.

फिलहाल तो शांति प्रक्रिया बेमानी चीज है. भारत पाकिस्तान के बीच शांति कभी आएगी तो अचानक से आएगी और अपने अतीत के काली छाया को पीछे छोड़कर भविष्य की बात करेगी. उसके लिए इंतजार करना होगा. लेकिन पाकिस्तानी जनरल मौजूदा स्थिति में इस बात से संतुष्ट हो सकते हैं कि अब मोदी के भारत में जो कुछ भी होगा उससे उनकी सेहत पर कोई फर्क नहीं पड़ेगा.

यह विरोधाभासी स्थिति है कि अगर भारत, पाकिस्तान में किसी नागरिक सरकार को मजबूत करना चाहता है तो इसके लिए एक ही रास्ता है कि वह पहले पाकिस्तानी सेना को पूरी तरह से विश्वास में ले. इसके बदले में भारत को काफी कुछ मिल सकता है, आईएसआई से होने वाला प्रायोजित हमला रुक सकता है, और अगर एक बार पाकिस्तानी सेना को यह भरोसा हो गया कि भारत के शांति प्रस्ताव से उसके हितों पर नकारात्मक असर नहीं हो रहा है और शांति प्रक्रिया उनकी शर्तों और हितों को पूरा कर रही है तब शायद वे इसे और खुले मन से सहयोग दें.

पीएम मोदी के पूर्ववर्ती भी दो बार जनरलों और नवाज शरीफ के हाथ धोखा खा चुके हैं

सवाल है कि हमारे प्रधानमंत्री उनकी शर्तों पर राजी क्यों होंगे? जब हमें पता है कि पाकिस्तान हमें अपना बाजार, निवेश, पर्यटन आदि कुछ भी नहीं देगा जिसकी भारत को जरूरत है तो फिर प्रधानमंत्री इसके लिए क्यों राजी होंगे. प्रधानमंत्री की प्राथमिकताएं यही हैं. लेकिन उन्हें यह भी पता है कि वे पाकिस्तान को किसी चारदीवारी में बांध कर भारत को विकास की बुलंदियों पर नहीं ले जा सकते. पाकिस्तानी जनरल ऐसा होने नहीं देंगे. हालांकि जनरलों को पता है कि पाकिस्तान बहुत पीछे छूट चुका है. दोनों देशों के बीच अंतर बहुत बढ़ चुका है. लेकिन पाकिस्तानी जनरल इस गड्ढे को विशाल खाई में भी नहीं बदलने देना चाहेंगे.

लेकिन अगर मोदी की नीतियां भारत को आगे बढ़ाने में कारगर रहीं तो वे उन्हें नजरअंदाज नहीं करेंगे. जितना ज्यादा हम खुद को विश्वस्तर पर शोशेबाजी और ताकतवर के रूप में प्रदर्शित करेंगे पाकिस्तानी जनरल उतना ही ज्यादा भारत से असुरक्षित महसूस करेंगे, भारत को अपने स्तर पर घसीट लाने की कोशिश करेंगे, नतीजतन भारत में और आतंकवाद बढ़ेगा.

'मोदी और ग़नी को मज़ार-ए-शरीफ़ पर हमले का संकेत समझना होगा'

हम उस हाइफन को हटाना चाहते हैं जो हमें पाकिस्तान से जोड़ता है लेकिन पाकिस्तानी जनरल ऐसा नहीं होने देंगे क्योंकि यह हाइफन उनकी जीवन रेखा है. हम एक निश्चित बंटवारा चाहते हैं. हम दुनिया को यह बता सकते हैं कि हम बिना दुश्मनी के पाकिस्तान से निपट सकते हैं. बस हमें अपनी बातचीत को केवल सीमापार से होने वाली गोलीबारी तक सीमित रखना होगा. इसके साथ यह भी ध्यान देना होगा कि हम दोनों परमाणु हथियार संपन्न देश हैं जो दुनिया के लिए खतरा बन सकता है.

निवेश और तकनीक वैसे देश में नहीं आती जहां संघर्ष की स्थिति बनी रहती है. ऐसी जगहों पर पर्यटक भी नहीं आते. मोदी भारत को आगे ले जा सकते हैं लेकिन इसके लिए वे पाकिस्तानी जनरलों को नजरअंदाज नहीं कर सकते. बल्कि उन्हें इसका स्थायी समाधान निकलना होगा.

यही वजह है कि वह बातचीत शुरू करना चाहते हैं ताकि सामान्य स्थिति बहाल हो सके. उन्होंने दिखाया है कि वह सवालों को नजरअंदाज कर सकते हैं. पठानकोट हमला, दिनानगर पुलिस स्टेशन पर हुए हमले से कम भयानक नहीं था. न ही यह तंगधार के आर्मी कैंप और उधमपुर में हुए हमले से कम था. ये सब सीमापार से आने वाले जेहादी संगठनों के कारनामे थे.

मोदी भारत को आगे ले जा सकते हैं लेकिन इसके लिए वे पाकिस्तानी जनरलों को नजरअंदाज नहीं कर सकते

एयरफोर्स, सेना के मुकाबले कोई ज्यादा पाक साफ नहीं है. दुनिया भर में निहत्थे नागरिकों पर होने वाला कोई भी आतंकी हमला रक्षा प्रतिष्ठानों या सैनिकों पर होने वाले हमलों से ज्यादा अस्वीकार्य माना जाता है क्योंकि सुरक्षा बल तो फिर भी अपनी रक्षा के लिए लड़ सकते हैं, उनके पास हथियार होते हैं. तो फिर सारा ध्यान पठानकोट पर ही क्यों केंद्रित कर दिया गया है. इसके पहले औऱ बाद के तमाम हमलों को नजरअंदाज कर दिया गया है. जबकि उन हमलों में निर्दोष नगरिक मारे गए हैं. दुनिया की नजर में यह बड़ा अपराध है.

अगर यह पाकिस्तान के लिए अग्निपरीक्षा है तो वह इसमें विफल होगा. फिर क्या होगा? क्या आतंकवाद खत्म हो जाएगा? ऐसा नहीं होगा. क्या हम पाकिस्तानी आर्मी की ईर्ष्या से खुद को बचाते हुए हम मेक इन इंडिया को आगे बढ़ा पाएंगे? हम ऐसा भी नहीं कर सकते.

'पाकिस्तानी सेना और सरकार ने भारत की कमजोरी भांप ली है'

क्या हम पाकिस्तान पर दबाव बना सकते हैं? हम ऐसा भी नहीं कर सकते और मोदी यह बात अच्छी तरह से जानते हैं. यही वजह है कि उन्होंने 2014 की लोकप्रियता को एक तरफ रखते हुए नवाज शरीफ के साथ बात शुरू करने की कोशिश की थी. मोदी के पास एक सधी हुई जुबान है. इसके सहारे वे देश को समझा सकते हैं कि पाकिस्तान के साथ बातचीत करके ही वो भारत को आगे ले जा सकते हैं.

जब वो कहते हैं कि प्राचीन काल में भारत में प्लास्टिक सर्जरी होती थी तब उनके समर्थक उन पर भरोसा करते हैं. अगर किसी को यह लगता है कि यह कहानी जितना मोदी कह रहे हैं उससे भी कहीं ज्यादा बड़ी तब भी वह उनकी बात का भरोसा कर लेता है. अगर वो ऐसा करते हैं तो भारत माता हमेशा उन्हें आशीष ही देंगी.

(ये लेखक के निजी विचार हैं. संस्थान का इससे सहमत होना जरूरी नहीं है)

First published: 12 April 2016, 8:08 IST
 
सत्यब्रत पॉल @Catchhindi

लेखक पाकिस्तान में भारतीय उच्चायुक्त रह चुके हैं.

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