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'हो सकता है कि नेशनल हेरल्ड डील आपको नापसंद हो. इससे ये अपराध नहीं हो जाता'

शोमा चौधरी | Updated on: 10 February 2017, 1:48 IST
QUICK PILL

\r\n\r\n\r\n \r\n \r\n \r\n नेशनल\r\nहेरल्ड के मुद्दे पर बीजेपी\r\nऔर कांग्रेस आमने-सामने हैं. दिल्ली\r\nहाईकोर्ट ने कहा है कि प्रथम दृष्टया यह मामला \'अपराध का नजर\' आता है. वहीं कांग्रेस\r\nने कहा कि वह इस मामले में\r\nउचित कानूनी प्रक्रिया के\r\nतहत आगे बढ़ेगी. कांग्रेस\r\nका कहना है कि इस मामले में\r\nकोई भ्रष्टाचार नहीं हुआ है\r\nऔर यह आपराधिक मामला भी नहीं है.

इस\r\nमुद्दे पर कैच की एडिटर-इन-चीफ\r\nशोमा चौधरी ने पूर्व केंद्रीय\r\nमंत्री सलमान खुर्शीद से\r\nबातचीत की है. पढ़िए\r\nबातचीत के चुनिंदा अंश:\r\n\r\n

कांग्रेस ने आज सफाई दी है कि वह नेशनल हेरल्ड मामले में सोनिया गांधी और राहुल गांधी को मिले समन के विरोध में नहीं, बल्कि तीन बीजेपी नेता सुषमा स्वराज, वीके सिंह और वसुंधरा राजे के इस्तीफे की मांग पर संसद नहीं चलने दे रही है. जब आप चारों तरफ से घिर गए तब आप अपना स्टैंड बदल रहे हैं ?

यह रणनीति में बदलाव नहीं है. कई मुद्दों की वजह से संसद नहीं चल रही है. हम इस बात को स्वीकार करते हैं कि सदन चलाना विपक्ष की भी जिम्मेदारी है. लेकिन इसके लिए सरकार को भी आगे बढ़ना होगा. हमने भ्रष्टाचार और जीएसटी से जुड़ी कई महत्वपूर्ण चिंताएं उठाई हैं. अब बीजेपी को साबित करना है कि वो उनपर विचार कर रही है.

कांग्रेस चुनाव हार गयी है इसका यह मतलब नहीं है कि बीजेपी जो मन में आए वो करे. चिदंबरम ने कहा है कि हम ट्विटर और फेसबुक पर बहस नहीं कर सकते हैं. बहस के लिए संसद है. उन्हें इसके बारे में संसद में बात करनी चाहिए.

नेशनल हेरल्ड केस में कांग्रेस के कुछ सदस्यों ने उत्तेजना में आकर प्रतिक्रिया दी. पार्टी सांसदों ने अनायास प्रतिक्रिया दी. जब हम सरकार से मुद्दों पर बात कर रहे हैं तो वह हमारे पार्टी के नेताओं के साथ एेसा बर्ताव नहीं कर सकती.

जीएसटी के मुद्दे पर सरकार ने आपको बातचीत के लिए बुलाया. क्या आप यह कह रहे हैं कि आपने बीजेपी के साथ वार्ता की इसलिए उन्हें भी नेशनल हेरल्ड केस में नरमी बरतनी चाहिए? क्या यहां अापसी लेन-देन का मामला है?


बिल्कुल नहीं. क्या यह भ्रष्टाचार का मामला है? अगर यह भारतीय दंड संहिता (आईपीसी) के तहत भ्रष्टाचार के मामले में आता है तो इसमें सरकारी वकील को होना चाहिए. यह मामला किसी एक व्यक्ति से संबंधित नहीं है. कोई भी इस मामले में सरकारी वकील की भूमिका को लेकर सवाल क्यों नहीं पूछ रहा?

नेशनल हेरल्ड केस भ्रष्टाचार का मामला नहीं है. आपको भ्रष्टाचार को परिभाषित करना होगा. चूंकि आप किसी को पसंद नहीं करते हैं तो यह नहीं कह सकते कि उसने भ्रष्टाचार किया है.

मर्जर, डिमर्जर और जबरन अधिग्रहण की वजह से कंपनियों का मालिकाना हक हर दिन बदलता रहता है, लेकिन इसे भ्रष्टाचार के मामलों की तरह नहीं देखा जाता. अगर इस तरह के लेन-देन कानून के मुताबिक नहीं होते हैं या इसमें कुछ गलत है तो इसके लिए कंपनी कानून और कंपनी लॉ बोर्ड है जो इसे नामंजूर कर सकते हैं. लेकिन यह आपराधिक मामला कैसे हो गया?

नागरिक होने के कारण आप इस लेन-देन से असहमत हो सकते हैं लेकिन यह भ्रष्टाचार नहीं है. यदि आपको कोई पसंद नहीं है या उससे असहमति है तो वह अपराधी नहीं हो जाता. हमलोग इस मूर्खतापूर्ण दृष्टिकोण के साथ देश को बर्बादी की तरफ धकेल रहे है.

समाज के भीतर कई परते हैं. यहां अनैतिकता और अयोग्यता हो सकती है. हर अनैतिक चीज अपराध नहीं है. गैर-कानूनी और आपराधिक कार्रवाई भी पूरी तरह एक-दूसरे से अलग मामला है. 

आप नेशनल हेरल्ड केस को किस श्रेणी में रखना चाहेंगे? दिल्ली हाईकोर्ट का भी कहना है कि "पहली नजर में यह मामला आपराधिक लगता है. "  कोर्ट का यह बयान मामले को गंभीर बना देता है.


कोर्ट ने जो कहा है उसमें कोई संदेह नहीं है और हम उसे स्वीकार करते हैं. हम इस मामले में कानूनन आगे बढ़ेंगे. हर भ्रष्टाचार और आपराधिक मामलों की जांच की जिम्मेदारी राज्य की है. 

एक निजी नागरिक के रूप में सुब्रमण्यम स्वामी इस केस की जांच नहीं कर सकते. इस मामले में सरकारी वकील क्या कह रहे हैं? उनसे क्यों कोई भी नहीं पूछ रहा है? सरकार कह रही है कि उसे इस मामले से कोई लेना-देना नहीं है.

प्रवर्तन निदेशालय ने इस मामले की जांच की. जो जांच बंद कर दी गई थी उसे अचानक फिर से खोल दिया गया?


उस समय भी प्रवर्तन निदेशालय ने एक जांच क्यों नहीं की थी? क्या यहां फंड का कोई गलत इस्तेमाल हुआ है? क्या कोई काला धन आया है? ये आरोप है? वास्तव में यह विपरीत मामला है: जब कंपनी का मालिकाना हक बदला गया तब कंपनी के पास पैसा नहीं था. नेशनल हेरल्ड कांग्रेस पार्टी का अखबार था जिसका अधिग्रहण यंग इंडियन ने किया ताकि इसे फिर से जिंदा किया जा सके. अगर इसमें कुछ गड़बड़ी होती तो रजिस्ट्रार ऑफ कंपनी इसे नहीं मानती और शेयरों के ट्रांसफर पर रोक लगा देती.

इस लेन-देन में कुछ भी गलत नहीं है. इस मामले को अनावश्यक रूप से गलत तरीके से पेश किया जा रहा है. आपसी सहमति से आए दिन कंपनियों के मालिकाना हक और बोर्ड में बदलाव होता है. तो क्या इन  सभी कंपनियों को भ्रष्टाचार के मामले में कटघरे में खड़ा कर देना चाहिेए? 

यहां तक कि छद्म तरीकों की मदद से किए गए अधिग्रहण के मामले में माइनॉरिटी शेयर होल्डर भी इसे अपने हितों के खिलाफ बताते हुए कंपनी लॉ बोर्ड के पास जा सकता है. इसके बाद लॉ बोर्ड लेन-देन की अनुमति देता है या ठुकरा देता है. लेकिन फिर भी यह लेन-देन आपराधिक नहीं हो जाता.

यहां मुद्दा एसोसिएटेड जर्नल्स लिमिटेड (एजेएल) के रियल एस्टेट के मालिकाना हक का है जो नेशनल हेरल्ड की प्रकाशक है. यह सभी प्रॉपर्टी यंग इंडियन को स्थानांतरित कर दी गई, जिसमें सोनिया और राहुल गांधी सबसे बड़े शेयर होल्डर हैं. सीधे शब्दों में कहें तो पार्टी के 90 करोड़ रुपये के कर्ज को बट्टा खाते में डाल दिया गया और प्रॉपर्टी का पूरा नियंत्रण सोनिया-राहुल के हाथों में दे दिया गया.

तो इसमें समस्या क्या है? यंग इंडियन, धारा 25 के अंतर्गत एक गैर लाभकारी कंपनी है. इससे कोई भी अनावश्यक लाभ या फायदा नहीं उठा सकता. यह एक ट्रस्ट की तरह काम करती है. इस पूरी कवायद का मकसद अखबार और इसकी संपत्ति को बचाने की कोशिश थी.

अगर यह एक ट्रस्ट के रूप में कार्य कर रही थी तो क्यों इसमें प्रतिष्ठित नागरिकों को शामिल करने की जरूरत क्यों नहीं समझी गई? क्यों गांधी परिवार ही इस कंपनी का प्रमुख भागीदार रहा? कांग्रेस द्वारा जारी तथ्य बताते हैं कि इस लेन-देन के बाद एजेएल की प्राॅपर्टीज को विकसित किया गया और इससे बैलेंस शीट सुधर गई.

नेशनल हेरल्ड कांग्रेस पार्टी का अखबार था इसलिए यंग इंडियन में गांधी परिवार की प्रमुख भागीदारी पूरी तरह उचित है.

इस बात पर भी चर्चा की गई थी कि कुछ प्रॉपर्टीज बेचकर 90 करोड़ रुपये के कर्ज का भुगतान कर दिया जाए. लेकिन यह भी दो विकल्पों के बीच का एक था. यह गैरकानूनी नहीं है.

यहां दो ही रास्ते बचे थे. पहला कि प्रॉपर्टी का कुछ हिस्सा बेचकर कर्ज चुका दिया जाए.  और दूसरा विकल्प यह था कि कुछ रकम का नुकसान उठाते हुए प्रॉपर्टी बचा ली जाए. दोनों ही विकल्पों में आप को कुछ नुकसान होता और कुछ फायदा. 

यहां यह देखना महत्वपूर्ण है कि इससे कंपनी के किसी भी साझेदार को कोई फायदा नहीं हुआ. यंग इंडियन एक गैर लाभकारी कंपनी है और वे दोनों केवल इसके काम को देख रहे थे.

लेकिन यंग इंडियन को बनाने का क्या उद्देश्य था? क्या इसका कहीं उल्लेख किया गया कि यह नेशनल हेरल्ड को पुनर्जीवित करने के लिए बनाई गई थी? चूंकि अब प्रॉपर्टीज को बचाते हुए उसे डेवलप कर लिया गया है और इससे मुनाफा भी आ रहा है तो इस मुनाफे का इस्तेमाल कहां होगा?


सच कहूं तो, मुझे यह पता नहीं है. यंग इंडिया के पास तमाम अधिकार हैं. लेकिन में यह बात पूरे यकीन से कह सकता हूं कि इसका मकसद अखबार को पुनर्जीवित करना था. मुझे पता है कि कपिल सिब्बल यह बात पहले भी कह चुके हैं. 

मैं आपको यह बता सकता हूं कि नेशनल हेरल्ड को पुनर्जीवित करने के बारे में पिछले कुछ वर्षों में काफी चर्चा हुई. साथ ही इस दिशा में कई कोशिशें भी कई गईं. हम सभी ने इसकी सदस्यता ली और वादा किया हर सदस्य 100 से ज्यादा लोगों को इससे जोड़ेगा. हर कोई जानता है कि राजनीतिक दल को अपने लिए एक मीडिया मंच की जरूरत होती है. उदाहरण के लिए केरल में हमारा अपना चैनल है.

इस मामले का कांग्रेस ने जिस तरीके से सामना किया उससे पार्टी बंटी हुई नजर आने लगी. कुछ लोगों ने कहा कि यह सौदा "अगर आपराधिक नहीं भी है तो नैतिक और न्यायिक दृष्टि से इसका बचाव नहीं किया जा सकता." वहीं कुछ लोगों का मानना है कि कांग्रेस को इस मुद्दे पर संसद की कार्यवाही को ठप नहीं करनी चाहिए.

जितने मुंह उतनी बातें बिलकुल लाज़मी है. भारत में पर्दे के पीछे खड़े होकर राय देने वाले लोगों की कमी नहीं है. कुछ ही दिनों में सभी मतभेद दूर हो जाएंगे. जो सामने रहकर काम कर रहे हैं आपको उन्हें काम करने देना होगा.

First published: 13 December 2015, 7:06 IST
 
शोमा चौधरी @shomachaudhury

एडिटर-इन-चीफ़, कैच न्यूज़. तहलका की संस्थापक मैनेजिंग एडिटर रही. इसके अलावा आउटलुक, इंडिया टुडे, द पायनियर आदि संस्थानों में भी काम किया. गोवा में होने वाले 'थिंक' फेस्ट के निदेशकों में रहीं.

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