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महिलाओं से मात खाती, महिलाओं पर कहर ढा रही छत्तीसगढ़ सरकार

राजकुमार सोनी | Updated on: 25 January 2017, 8:31 IST
QUICK PILL
  • बस्तर क्षेत्र में आईजी शिवराम कल्लूरी की हरकतों ने बना दिया है सरकार का चेहरा स्त्री विरोधी.
  • इस पूरे क्षेत्र में पुलिस की मनमानी हिंसक कार्रवाइयों का शिकार बड़ी संख्या में सिर्फ महिलाएं बन रही हैं, चाहे वो आम आदिवासी महिला हो या फिर सामाजिक कार्यकर्ता या पत्रकार.

भारतीय पुलिस सेवा 1994 बैच के अफसर शिवराम कल्लूरी का महिलाओं के साथ विवाद का पुराना नाता है. कल्लूरी छत्तीसगढ़ के बस्तर ज़ोन के आईजी है. जब वे छत्तीसगढ़ के सरगुजा में पदस्थ थे तब उन पर एक महिला ने दुष्कर्म का आरोप लगाया था.

लेकिन बस्तर में उनकी पदस्थापना के बाद से जैसे महिलाओं पर अत्याचार की घटनाओं बाढ़ सी आ गई है. महिलाओं के साथ उनका व्यवहार रूढ़िवादी, सामंती और स्त्रीविरोधी मानसिकता का प्रतिबिंब है. मोबाइल पर उनकी बातचीत सामान्य शिष्टाचार के सभी मानको को ध्वस्त करती है.

कल्लूरी भारत सरकार का अंग हैं लेकिन कई मौकोंं पर ऐसा लगता है कि उन्हें भारत के संविधान की कोई परवाह नहीं है

कल्लूरी भारत सरकार के एक अंग हैं लेकिन कई मौकोंं पर ऐसा प्रतीत हुआ कि उन्हें भारत के संविधान और उसकी मर्यादा का कोई ध्यान ही नहीं है. मानवाधिकार और सामाजिक कार्यकर्ताओं का आरोप है कि खुद को माओवादियों का काल बताने वाले कल्लूरी ने अपने स्त्री विरोधी रवैए से सरकार का दामन दागदार और चेहरा स्त्री विरोधी बना दिया है.

बस्तर में महिलाओं के साथ ज्यादती के मामले में अभी इसी साल सात जनवरी को राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग को नोटिस जारी कर कड़ी टिप्पणी करनी पड़ी है. आयोग को अक्टूबर 2015 से 17 जनवरी 2016 के बीच बीजापुर, सुकमा और दंतेवाड़ा जिले में पुलिस और सुरक्षाबल के जवानों के द्वारा आदिवासी महिलाओं से दुष्कर्म और प्रताड़ना की खबर मिली थी.

इन आरोपों की जांच के लिए आयोग ने दल को मौके पर भेजा था. आयोग ने अपनी पहली पड़ताल में 40 में से 16 आदिवासी महिलाओं से दुष्कर्म की शिकायत को सही पाया.

आयोग की टीम दूसरी बार अभी हाल के दिनों में जब दोबारा बस्तर पहुंची तो मानवाधिकार कार्यकर्ता बेला भाटिया भी उनके साथ थीं, लेकिन टीम के लौटने के ठीक दूसरे दिन बाद अराजक लोगो की एक भीड़ ने उनके घर पर हमला बोल दिया.

पुलिस बनी मूक दर्शक

प्रमुख अर्थशास्त्री जॉन द्रेज़ की मित्र बेला भाटिया बस्तर के जगदलपुर के पंडरीपानी इलाके में एक किराए का मकान लेकर रहती है. बस्तर में सामाजिक एकता मंच के बाद माओवादियों से लोहा लेने के दावे के साथ अवतरित हुए संगठन अग्नि के सदस्यों का दावा है कि बेला माओवादियों को मदद करती है.

हालांकि बेला इन आरोपों को आधारहीन बताने के साथ ही कहती हैं, 'बस्तर में जो कोई भी यह सवाल खड़े करता है कि निर्दोष आदिवासियों को मौत के घाट क्यों उतारा जा रहा है तो उसे माओवादी ठहरा दिया जाता है.'

सोमवार 23 जनवरी को जब बेला अपने घर पर अकेली थीं तब कुछ लोग जीप और बाइक में उनके घर पहुंचे और उन्हें बस्तर छोड़ने के लिए धमकाया. बेला के घर पर धावे की खबर के बाद जब मानवाधिकार और सामाजिक कार्यकर्ताओं ने आपत्ति जताई तो पुलिस की तरफ से यह कहा गया कि ग्रामीणों का विरोध इस बात को लेकर हैं कि बेला माओवादियों का समर्थन करती है.

इस घटनाक्रम का हैरतअंगेज पक्ष यह है कि जब हुड़दंगी बेला के घर को आग लगाने की धमकी दे रहे थे तब पुलिस मूकदर्शक बनकर खड़ी थी. इतना ही नहीं पुलिस ने हुड़दंगियों के सामने ही बेला और उसके मकान मालिक के बीच एक कागज पर 24 घंटे के भीतर मकान खाली करने का एक पत्र भी लिखवाया.

बेला का कहना है कि जो लोग भीड़ में शामिल थे वे पंडरीपानी रहने वाले नहीं थे क्योंकि वह अपने गांव के लोगों को अच्छी तरह से पहचानती है.

शालिनी गेरा पर हमला

पुलिस और अग्नि जैसे संगठनों के निशाने पर केवल बेला भाटिया ही नहीं हैं. बस्तर में हाल के कुछ महीनों में इसी तर्ज पर बार-बार घटनाएं घटित हो चुकी है. बस्तर के जगदलपुर में रहकर आदिवासियों को न्याय दिलाने के लिए कार्यरत शालिनी गेरा और ईशा खंडेलवाल के घर भी 17 फरवरी 2016 को पुलिस और सामाजिक एकता मंच से जुड़े हुए सदस्यों ने हमला कर दिया था.

इस घटना के बाद पुलिस ने सबसे पहले ईशा और शालिनी के मकान मालिक प्रवीण बघेल को घर से उठाया और थाने ले जाकर इस बात के लिए धमकाया कि यदि उन्होंने फिर कभी किसी महिला को घर किराए पर दिया तो अंजाम बुरा होगा.

मकान मालिक ने पुलिसिया तौर-तरीकों पर आपत्ति जताई तो उनकी कार जब्त कर ली गई. अतत: ईशा और शालिनी को जगदलपुर शहर छोड़ना पड़ा. ईशा कहती है, 'जब पहली बार पुलिस ने बस्तर छोड़ने के लिए दबाव बनाया तो हमें यह समझ में नहीं आया कि गलती क्या है, लेकिन थोड़े ही दिनों बाद यह साफ हो गया कि पुलिस आदिवासियों के साथ की जाने वाली ज्यादतियों पर लोगों को खामोश देखने की पक्षधर है.'

वो आगे बताती हैं, 'बस्तर की पुलिस माओवादियों से टक्कर लेने के नाम पर लाव-लश्कर के साथ गांवों में घुसती है और फिर गांवों के बुर्जुगों को खदेड़कर महिलाओं से दुष्कर्म करती है, अक्सर उन्हें मौत के घाट भी उतार देती है. पुलिस चाहती है कि उनकी दरिंदगी पर लोग कुछ न बोले, लेकिन ऐसा हो नहीं सकता.'

ईशा के मुताबिक जो कोई इन घटनाओं की सच्चाई सामने लाने की कोशिश करता है उसे या तो माओवादी या फिर उनका समर्थक घोषित कर दिया  जाता है. ईशा कहती है, 'हम भी कानून-सम्मत तरीके से फर्जी मुठभेड़ और आदिवासियों की गिरफ्तारियों को चुनौती दे रहे थे, लेकिन आईजी कल्लूरी को यह रास नहीं आया तो हमें माओवादियों का मददगार बताकर बस्तर छोड़ने के लिए मजबूर कर दिया गया.'

पत्रकार मालिनी के घर पर हमला

लीगल एड से जुड़ी महिला अधिवक्ताओं पर हमले के बाद सामाजिक एकता मंच और पुलिस ने अपना अगला निशाना एक न्यूज वेबसाइट के लिए खबरें लिखने वाली मालिनी सुब्रमण्यम को बनाया.

मालिनी बताती है फरवरी 2016 के पहले हफ्ते से उसे पुलिस की ओर से इस बात की धमकी दी जा रही थीं कि आदिवासियों की हिमायत करना बंद कर दें. जब वह नहीं मानी तो सबसे पहले उसके मकान मालिक और उसके घर में कार्यरत महिला को पुलिस ने हिरासत में लिया.

मालिनी के मुताबिक मकान मालिक पर दबाव बनाया गया कि वह उन्हें घर खाली करने का नोटिस दे. पुलिस की धमकियों के बावजूद जब मालिनी ने मकान खाली नहीं किया तो एक रोज सामाजिक एकता मंच के सदस्यों ने उसके घर और कार पर हमला कर तोड़फोड़ की.

सोनी सोरी पर कैमिकल अटैक

पिछले ही साल आदिवासी सामाजिक कार्यकर्ता सोनी सोरी पुलिसिया हमले का शिकार हुई थीं. फरवरी 2016 को जब अधिवक्ता ईशा खंडेलवाल और शालिनी गेरा पुलिसिया दबाव में मकान खाली कर रही थीं तब सोनी सोरी उनसे मिलने घर पहुंची थीं.

ईशा और शालिनी सोनी से मिलने के बाद एक बस में बैठकर रायपुर के लिए निकली ही थीं कि उन्हें खबर मिली कुछ लोगों ने सोरी के ऊपर केमिकल अटैक किया है.

इस घटना की तीखी प्रतिक्रिया सामने आने के बाद आईजी कल्लूरी ने एक जांच कमेटी भी बनाई, लेकिन कमेटी के किसी भी जिम्मेदार सदस्य ने अब तक सोरी का बयान दर्ज नहीं किया है.

सोरी कहती है, 'हमले के मास्टर मांइड कल्लूरी ही हैं तो फिर जांच कैसे हो सकती है.' महिलाओं पर अत्याचार के सवाल पर सोरी बताती हैं,  'कल्लूरी ही नहीं बस्तर की पूरी पुलिस औरतों को डराती है. बस्तर की मां- बहन और बेटियां बस्तर पुलिस को अपना रक्षक नहीं भक्षक मानती है. हर बच्ची अब यह जान गई है कि बस्तर पुलिस का चरित्र कैसा है?'

सोरी आगे बताती हैं, 'पहले बस्तर की महिलाएं खामोशी से अत्याचार सह लेती थीं, लेकिन जबसे पुलिस उनके पति और जवान बच्चों को माओवादी बताकर गोलियों से भून रही हैं तब से वे बोलने लगी हैं. औरतों का मुंह खोलना पुलिस को रास नहीं आ रहा हैं. पुलिस के चेहरे से नकाब उतर रहा है.'

अंतहीन फेहरिस्त

बस्तर में आदिवासियों के हक की बात करने वाली महिलाओं पर प्रताड़ना की फेहरिस्त काफी लंबी है. पिछले साल दिल्ली की दो महिला प्रोफेसर नंदिनी सुंदर और अर्चना प्रसाद बस्तर पहुंची थीं तो पुलिस ने इनके दौरे पर सवालिया निशान लगाते हुए इन्हें माओवादी समर्थक ठहराते हुए एक ग्रामीण की हत्या में शामिल होने का आरोप लगाया था.

महिला प्रोफेसरों को सुप्रीम कोर्ट में गुहार लगानी पड़ी तब जाकर उनकी गिरफ्तारी टल पाई. बस्तर के कोंटा इलाके के एक गांव गोमपाड़ की युवती मड़कम हिड़मे और नागलगुड़ा गांव की चार युवतियों के साथ दुष्कर्म के बाद हत्या की घटना भी बीते साल ही में दर्ज हुई है. इन घटनाओं से पुलिस की खूब किरकिरी भी होती है लेकिन ऊपर के स्तर पर किसी जवाबदेही  न होने के चलते इस तरह की अमानवीय घटनाएं बदस्तूर जारी हैं.

छत्तीसगढ़ में महिलाएं बेहद असुरक्षित हैं और बस्तर में पुलिस वालों ने व्यभिचार के एक बड़े औजार में बदल दिया है

पिछले साल 19 दिसम्बर को बस्तर के दंतेवाड़ा में पीयूसीएल ने एक बैठक बुलाई थी. इस बैठक में शिरकत करने के लिए बिलासपुर की अधिवक्ता प्रियंका शुक्ला और निकिता अग्रवाल भी गई थीं, लेकिन रास्ते में पुलिस की वर्दी में कुछ लोगों ने उन्हें रोका और उनकी तस्वीरें खींच ली. बाद में इन तस्वीरों को सोशल मीडिया में यह कहते हुए प्रचारित किया गया कि दिल्ली से जेएनयू के कुछ लोग माओवादियों से मेल मुलाकात के लिए बस्तर आए हुए हैं.

इन दोनों अधिवक्ताओं को पुलिस के दुर्व्यवहार का शिकार तब भी होना पड़ा था जब वे एक ग्रामीण की संदिग्ध मौत के बाद हाईकोर्ट के निर्देश पर बस्तर जांच करने पहुंची थी. प्रियंका और निकिता के साथ बस्तर छोड़ने  के लिए विवश कर दी गई अधिवक्ता शालिनी गेरा भी थीं.

शालिनी पर एक कथित शिकायत के बाद यह आरोप लगा कि वह माओवादियों के 10 लाख रुपए बदलवाने के लिए बस्तर आई हुई थीं. महिलाओं पर बढ़ते हिंसक व्यवहार को नेता प्रतिपक्ष टीएस सिंहदेव ने बेहद गंभीर बताया है.

सिंहदेव का आरोप है कि एक अफसर को दी गई ज्यादतियों की छूट के चलते सरकार भी अच्छे-बुरे और नैतिक-अनैतिक की परिभाषा भूल गई है. सरकार की इस भूल के चलते देश और दुनिया के बीच यह संदेश चला गया है कि छत्तीसगढ़ में महिलाएं सबसे ज्यादा असुरक्षित हैं और बस्तर में पुलिसकर्मियों ने व्यभिचार के एक बड़े औजार में बदल दिया है.

पीयूसीएल की प्रदेश ईकाई के अध्यक्ष लाखन सिंह का कहना है कि कल्लूरी शासन के एक नुमाइंदे हैं लेकिन उनके कार्य-व्यवहार का प्रतिबिंब सरकार के चेहरे पर साफ-साफ दिखाई देता है. फिलहाल तो सरकार का चेहरा स्त्री विरोधी बनकर उभरा है. कल्लूरी बस्तर के उन भोले-भाले आदिवासियों से बदला ले रहे हैं जिन्होंने पिछले चुनाव में सरकार से किनारा कर लिया था.

First published: 25 January 2017, 8:31 IST
 
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