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तीन तिगाड़ा: आईआईटी, एनआईटी और राज्य इंजीनियरिंग कॉलेज एक ही परिसर में

निहार गोखले | Updated on: 7 August 2016, 8:24 IST
(कैच न्यूज)
QUICK PILL
  • गोवा के फारमागुडी में आईआईटी, एनआईटी और इंजीनियरिंग कॉलेज एक ही परिसर से चल रहे हैं.
  • राज्य के तकनीकी शिक्षा निदेशालय ने सात जनवरी 2016 के नोट में इसे एक \'दुष्कर कार्य\' बताया है.
  • कैच ने दो अगस्त को अपनी खबर में लोलियम गांव में बनाए गए इस परिसर को लेकर आगाह किया था.

क्या आपने कभी देखा है कि आईआईटी, एनआईटी और राज्य का इंजीनियरिंग कॉलेज एक ही परिसर में संचालित हो रहे हों? यदि आप यह देखना चाहते हैं तो गोवा को देखना चाहिए.

पूर्वी गोवा के फारमागुडी स्थित गोवा इंजीनियरिंग कालेज (जीईसी) में यह असम्भव कार्य कर दिया गया है. यहां नेशनल इंस्टीट्यूट ऑफ टेक्नोलॉजी (एनआईटी) और इंडियन इंस्टीट्यूट ऑफ टेक्नालॉजी के परिसरों के लिए अतिरिक्त रूप से कमरे बनवाए गए हैं. एनआईटी यहां वर्ष 2010 से चल रहा है.

गोवा सरकार के दस्तावेजों से पता चलता है कि अफसरों ने वहां आईआईटी न खोलने की सलाह दी थी.

गत 30 जुलाई को मानव संसाधन मंत्री प्रकाश जावड़ेकर ने मुख्यमंत्री लक्ष्मीकांत पारसेकर और अन्य नेताओं की मौजदूगी में यहां आईआईटी के अस्थाई परिसर का उद्घाटन किया. कक्षाएं दो अगस्त से चलनी शुरू हो गईं हैं.

गोवा सरकार के दस्तावेजों से पता चलता है कि कि केन्द्र और राज्य की सरकार ने अपने ही अधिकारियों की उस सलाह को ही दरकिनार कर दिया जिसमें अफसरों ने वहां आईआईटी न खोलने की सलाह दी गई थी.

जगह की कमी

गोवा के तकनीकी शिक्षा निदेशालय के अतिरिक्त निदेशक दीपक सीएस के सात जनवरी 2016 के नोट में एक ही परिसर में तीन संस्थानों को चलाए जाने को 'दुष्कर कार्य' बताया गया है. नोट में यह भी अनुरोध किया गया है कि जब तक स्थाई परिसर को अंतिम रूप न दे दिया जाए, आईआईटी को नहीं खोला जाना चाहिए. यह नोट कैच ने देखा है.

इस नोट में यह भी लिखा गया है कि एनआईटी को जीईसी के परिसर में केवल दो साल के लिए अस्थाई रूप से चलाने की बात हुई थी लेकिन छह साल गुजर जाने के बाद भी अभी तक एनआईटी यहां चल रहा है क्योंकि स्थाई परिसर के लिए भूमि ही नहीं तलाशी जा सकी है और उसे अंतिम रूप नहीं दिया जा सका है.

एनआईटी को जीईसी परिसर में केवल दो साल चलाने की बात हुई थी, लेकिन 6 साल बाद भी हालात नहीं बदले.

इन सब स्थितियों में यह निर्धारित किए जाने की जरूरत है कि आईआईटी जैसे स्तर के संस्थान को जीईसी परिसर में चलाया जाना चाहिए जहां सीमिति संसाधन हों? इसमें हॉस्टल और अन्य सुविधाओं की कमी का मुद्दा भी उठाया गया है.

नोट में यह बात भी कही गई है कि आईआईटी को अधिकतम पहले दो साल के लिए जीईसी परिसर में समायोजित तो किया जा सकता है लेकिन बाद में जीईसी के लिए और ज्यादा समय तक उसे चलाना मुश्किल होगा.

नोट के इस हिस्से को तकनीकी शिक्षा विभाग के निदेशक विवेक कामत ने अंडरलाइन किया है और अपने हाथ से लिखा है कि कृपया इस मामले पर समुचित विचार कीजिए. यह कठिन काम है. इसे आसानी से सम्पादित नहीं किया जा सकता है. इस नोट पर सात जनवरी को हस्ताक्षर हुए हैं.

आगे बढ़ने की जल्दी

इस सलाह के विपरीत कक्षाएं शुरू कर दी गईं. आईआईटी मुम्बई के एक अधिकारी ने कैच को बताया कि जमीन अभी तक उसे नहीं सौंपी गई है. आईआईटी गोवा इकाई के एक अधिकारी ने बताया कि राज्य सरकार भूमि अर्जित करना चाहती है और वह जल्द ही संस्थान को सौंप देगी. प्रक्रिया चल रही है. इस संबंध और ज्यादा जानकारी राज्य सरकार ही दे सकेगी.

कैच ने दो अगस्त को खबर दी थी कि लोलियम गांव जहां यह परिसर बनाया जाना है, वहां की भूमि बेहद नाजुक और महत्वपूर्ण है. स्थानीय ग्रामीणों ने भूमि देने का इस आधार पर विरोध किया है कि यह भूमि चरागाह है और यहां से ग्राउंड वाटर को रिचार्जिंग किया जाता है.

पर्यावरणविदों ने भी इस स्थान पर आईआईटी का विरोध किया है क्योंकि यहां जो जगह है, वह वन्यजीव अभ्यारण्य और टाइगर रिजर्व से जुड़ी हुई है. लोलियम ग्रामसभा अब आईआईटी की इस योजना पर मत संग्रह कराने की योजना बना रही है.

कैच ने खबर दी थी कि लोलियम गांव जहां यह परिसर बनाया जाना है, वहां की भूमि बेहद नाजुक और महत्वपूर्ण है.

लोलियम गांव के स्थानीय लोगों के समूह ने भी दीपक सीएस के पत्र का हवाला देते हुए मानव संसाधन मंत्रालय और राज्य के तकनीकी शिक्षा निदेशालय को पत्र लिखा है.

पत्र में कहा गया है कि आईआईटी को जीईसी के परिसर में स्थापित नहीं करना चाहिए. इस उद्देश्य के लिए लोलियम साइट का जो चयन किया गया है, वह अनुपयुक्त है. इसके लिए कभी पर्यावरणीय अनुमति भी नहीं मिल पाएगी. यह साइट पारिस्थितिकी-संवेदनशील पहाड़ी मैदान है जिसे किसी भी हालत में क्षति नहीं पहुंचाई जा सकती.

रुचिकर तो यह है कि एनआईटी को भी लोलियम गांव में ही बनाया जाना था (हालांकि दूसरी जगह पर) लेकिन स्थानीय लोंगो की आपत्तियों के चलते यह योजना खारिज कर दी गई. दीपक सीएस से उनकी प्रतिक्रिया जानने के लिए सम्पर्क नहीं हो सका जबकि निदेशक तकनीकी शिक्षा, विवेक कामत ने नोट पर टिप्पणी करने से इनकार कर दिया.

भूमि की समस्या

आईआईटी गोवा के लिए भूमि की समस्या हमेशा ही रही है. जब कक्षाएं शुरू किए जाने की योजना थी ही, तब इसे ताक पर क्यों रखा गया. माना जाता है कि गोवा के मुख्यमंत्री लक्ष्मीकांत पारसेकर जो आईआईटी, मुम्बई के परामर्शदाता भी हैं, ने पहले ही आईआईटी मुम्बई से कहा था कि वह अपने परिसरों को मुम्बई में ही शुरू करे.

नोट के अनुसार गोवा के तकनीकि शिक्षा विभाग ने जून 2015 में पहली बार सूचित किया था कि आईआईटी गोवा की कक्षाएं इस साल से शुरू हो जाएंगी. जहां तक स्थाई परिसर के लिए साइट का मामला है, उसे साइट सलेक्शन कमेटी द्वारा अप्रूव किया जा रहा है. कमेटी ने इस साल लोलियम गांव का दौरा किया था और उसे अंतिम रूप दे दिया था. इसके बाद कैबिनेट ने तत्काल आईआईटी को अप्रूव कर दिया.

समस्याएं

आईआईटी की जल्दी शुरुआत का असर छात्रों पर पड़ेगा. आईआईटी, गोवा का परिसर अभी जीईसी के खनन विभाग में चल रहा है. कम्प्यूटर साइंस, इलेक्ट्रिकल और मेकैनिकल इंजीनियरिंग की कक्षाओं में आईआईटी के 90 छात्र होंगे.

नोट में यह भी कहा गया है कि जीईसी के पास अपने खुद के 2,000 छात्रों और एनआईटी के 500 छात्रों के लिए पर्याप्त जगह है. इसके अलावा एक अन्य संस्थान को जोड़ना और तीनों संस्थानों का प्रबंध करना कठिन होगा.

आईआईटी, गोवा का परिसर अभी जीईसी के खनन विभाग में चल रहा है.

जीईसी के एक वरिष्ठ अधिकारी ने कैच से कहा कि अच्छी गुणवत्ता वाली फैकल्टी के साथ विचारों के आदान-प्रदान से कॉलेज को तो लाभ हो रहा है, लेकिन कालेज ढेर सारी चुनौतियों का भी सामना कर रहा है. कैम्पस के लिए 285 एकड़ की जमीन तो पर्याप्त है लेकिन छात्र सुविधाओं की कमी है.

एक अधिकारी ने अपने नाम का खुलासा न करने की शर्त पर बताते हैं कि आईआईटी छात्रों के लिए हॉस्टल की कोई जगह नहीं है. जीईसी छात्रों के साथ वे रूम शेयर कर रहे हैं लेकिन एक साल के बाद उन्हें हॉस्टल की अपनी व्यवस्था खुद करनी होगी.

उन्होंने कहा कि एनआईटी ने भी तो परिसर के बाहर हॉस्टल की व्यवस्था की हुई है. इस अधिकारी ने यह भी कहा कि पर्याप्त संख्या में प्रयोगशालाएं और उपकरण भी नहीं हैं. हमसे कहा गया था कि प्रयोगशालाओं के लिए उनके खुद के उपकरण होंगे लेकिन इस बारे में अभी तक हमारे पास कोई जानकारी नहीं है.

First published: 7 August 2016, 8:24 IST
 
निहार गोखले @nihargokhale

Nihar is a reporter with Catch, writing about the environment, water, and other public policy matters. He wrote about stock markets for a business daily before pursuing an interdisciplinary Master's degree in environmental and ecological economics. He likes listening to classical, folk and jazz music and dreams of learning to play the saxophone.

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