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CJI दीपक मिश्रा ने निर्भया रेप केस में दोषियों और याकूब मेनन की फांसी को रखा था बरकरार

आदित्य साहू | Updated on: 23 April 2018, 14:36 IST

इस साल जनवरी में देश के इतिहास में पहली बार सुप्रीम कोर्ट के 4 वरिष्ठतम जजों ने मीडिया के सामने आकर सुप्रीम कोर्ट के चीफ जस्टिस दीपक मिश्रा की प्रशासनिक कार्यशैली पर सवाल खड़े कर दिए थे. ये चारों जज सुप्रीम कोर्ट में वरीयता के मामले में जस्टिस दीपक मिश्रा से नीचे दूसरे से पांचवें नंबर पर थे. जिसके बाद देश की न्यायपालिका में हड़कंप मच गया था.

इसके बाद अभी कांग्रेस समेत सात विपक्षी दलों ने जस्टिस मिश्रा पर कदाचार का आरोप लगाकर महाभियोग का प्रस्ताव लाया था. हालांकि उपराष्ट्रपति वेंकैया नायडू ने सीजेआई के खिलाफ लाए जा रहे महाभियोग प्रस्ताव को खारिज कर दिया है. उपराष्ट्रपति ने संविधान विशेषज्ञों से विचार विमर्श के बाद कांग्रेस समेत सात विपक्षी दलों के प्रस्ताव को खारिज कर दिया है. इसके बाद सीजेआई दीपक मिश्रा कि मुश्किलें फिलहाल कम हो गई हैं.

लेेकिन ये पहली बार नहीं है जब देश की न्यायपालिका के सर्वोच्च पद पर आसीन जस्टिस दीपक मिश्रा के खिलाफ बवंडर मचा है. इसके पहले भी कई मुद्दों पर वह सवालों के घेरे में आ चुके हैं.

कौन हैं दीपक मिश्रा?
चीफ जस्टिस दीपक मिश्रा का जन्म 3 अक्टूबर 1953 को हुआ था. 27 अगस्त, 2017 को पूर्व मुख्य न्यायाधीश जे एस खेहर के सेवानिवृत्ति के बाद वह भारत के 45वें मुख्य न्यायाधीश बने. उन्होने भारत के मुख्य न्यायाधीश के रूप में 28 अगस्त 2017 को शपथ ग्रहण की. 63 साल के दीपक मिश्रा की नियुक्ति वरिष्ठता के आधार पर हुई है. 13 महीने के कार्यकाल के बाद वह 2 अक्टूबर 2018 को चीफ जस्टिस के पद से रिटायर हों जाएंगे.

जस्टिस दीपक मिश्रा ने फरवरी 1977 में वकील के तौर पर अपने करियर की शुरुआत की. उन्होंने लंबे समय तक उड़ीसा हाई कोर्ट और सर्विस ट्रिब्यूनल में संवैधानिक, सिविल, क्रिमिनल, राजस्व, सर्विस और सेल्स टैक्स जैसे कई मामलों में वकालत की. साल 1996 में वो उड़ीसा हाई कोर्ट में एडिशनल जज के तौर पर नियुक्त हुए और अगले साल उनका तबादला मध्य प्रदेश हो गया.

साल 1997 खत्म होते-होते वह स्थायी जज बन गए. 23 दिसंबर, 2009 को जस्टिस मिश्रा ने पटना हाई कोर्ट के चीफ़ जस्टिस का कार्यभार संभाला और 24 मई, 2010 को वह दिल्ली हाई कोर्ट के चीफ जस्टिस बन गए. 10 अक्टूबर, 2011 को उनका प्रमोशन हुआ और वह सुप्रीम कोर्ट के जज बन गए.

जनवरी 2018 में देश के इतिहास में पहली बार सुप्रीम कोर्ट के 4 वरिष्ठतम जजों ने मीडिया के सामने आकर सुप्रीम कोर्ट के चीफ जस्टिस दीपक मिश्रा की प्रशासनिक कार्यशैली पर सवाल खड़े कर दिए थे. जिसके बाद देश की न्यायपालिका में हड़कंप मच गया था.

दीपक मिश्रा अपने कार्यकाल में काफी चर्चा में रहे हैं. आप भी जानिए-

निर्भया केस में आरोपियों की फांसी की सजा रखी थी बरकरार
दीपक मिश्रा कई आदेशों को लेकर चर्चा में रहे हैं. कुछ फ़ैसले उन्होंने दिल्ली हाई कोर्ट के चीफ़ जस्टिस रहते हुए सुनाए तो कुछ सुप्रीम कोर्ट में जज रहते हुए सुनाए. दिल्ली के निर्भया गैंगरेप के दोषियों की फांसी की सज़ा बरकरार रखना और चाइल्ड पोर्नोग्राफ़ी वाली वेबसाइटों को बैन करना उनके प्रमुख फैसलों में शामिल है. केरल के सबरीमाला मंदिर के द्वार महिला श्रद्धालुओं के लिए खोलने के आदेश भी जस्टिस मिश्रा ने ही दिए थे.

 

सिनेमाघरों में राष्ट्रगान किया था अनिवार्य
30 नवंबर, 2016 को जस्टिस दीपक मिश्रा की अगुवाई वाली सुप्रीम कोर्ट की बेंच ने ही पूरे देश में सिनेमा घरों में फिल्म शुरू होने से पहले राष्ट्रगान चलाये जाने को अनिवार्य किया था. इसमें यह भी था कि इस दौरान सिनेमा हॉल में मौजूद तमाम लोग खड़े होंगे. हालांकि सुप्रीम कोर्ट ने 9 जनवरी, 2018 को सिनेमाघरों में राष्ट्रगान बजाने की अनिवार्यता खत्म कर दी थी.

 

याकूब मेमन की फांसी को रखा बरकरार
साल 1993 के मुंबई बम धमाकों में दोषी ठहराए गए याकूब मेमन ने फांसी से ठीक पहले अपनी सज़ा पर रोक लगाने की याचिका डाली थी. इस मामले में 29 जुलाई 2013 की रात को अदालत खुली. सुनवाई करने वाले तीन जजों में जस्टिस मिश्रा भी शामिल थे. जस्टिस मिश्रा ने दलीलें सुनने के बाद सुबह 5 बजे फैसला सुनाया था. उन्होंने कहा, "फांसी के आदेश पर रोक लगाना न्याय की खिल्ली उड़ाना होगा. इसकी याचिका रद्द की जाती है." इसके कुछ घंटों बाद याकूब को फांसी दे दी गई थी.

 

प्रमोशन में आरक्षण पर लगाई थी रोक
उत्तर प्रदेश में मायावती के सरकार के समय प्रमोशन में आरक्षण की नीति पर इलाहाबाद हाई कोर्ट ने रोक लगा दी थी. इसके बाद मामला सुप्रीम कोर्ट में आया था. सुप्रीम कोर्ट ने भी इलाहाबाद हाई कोर्ट के फ़ैसले को बरकरार रखा था. तब दो जजों की बेंच ने कहा था कि प्रमोशन देने से पहले सावधानी से जानकारियां जुटाई जाएं. इस बेंच में दीपक मिश्रा भी थे.

 

24 घंटे के भीतर FIR की कॉपी वेबसाइट पर डालने के दिए थे आदेश
7 सितंबर, 2016 को जस्टिस दीपक मिश्र और जस्टिस सी नगाप्पन की बेंच ने राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों को आदेश दिया कि FIR की कॉपी 24 घंटों के अंदर अपनी वेबसाइट पर अपलोड करें. इससे पहले जब जस्टिस मिश्र ने दिल्ली के चीफ़ जस्टिस थे, 6 दिसंबर, 2010 को उन्होंने दिल्ली पुलिस को भी ऐसे ही आदेश दिए थे. उनका तर्क था कि इससे लोगों को बेवजह चक्कर नहीं काटना पड़ेगा.

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आपराधिक मानहानि की संवैधानिकता रखी बरकरार
13 मई, 2016 को सुप्रीम कोर्ट की बेंच ने आपराधिक मानहानि के प्रावधानों की संवैधानिकता को बरकरार रखने का आदेश सुनाया था. जिस बेंच ने यह आदेश दिया था उसमें दीपक मिश्रा भी थे. यह फ़ैसला सुब्रमण्यन स्वामी, राहुल गांधी, अरविंद केजरीवाल व अन्य बनाम यूनियन के केस में सुनाया गया था. बेंच ने स्पष्ट किया था कि अभिव्यक्ति का अधिकार असीमित नहीं है.

First published: 23 April 2018, 14:36 IST
 
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