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अरुणाचल में राष्ट्रपति शासन की मंजूरी

कैच ब्यूरो | Updated on: 27 January 2016, 15:00 IST

राष्ट्रपति प्रणब मुखर्जी ने मंगलवार को केंद्र की सिफारिश के आधार पर अरुणाचल प्रदेश में राष्ट्रपति शासन को अपनी मंजूरी दे दी है.

इस मामले में केंद्रीय गृहमंत्री राजनाथ सिंह ने सोमवार को राष्ट्रपति प्रणब मुखर्जी से मुलाकात कर उन्हें राज्य में संवैधानिक संकट का बारे में जानकारी दी. उसके बाद राष्ट्रपति ने इस फैसले पर अपनी मंजूरी दी.

वहीं कांग्रेस ने केंद्र सरकार की इस सिफारिश खिलाफ पहले से ही सुप्रीम कोर्ट में याचिका दायर कर रखी है. जिसमें आज सुनवाई होगी.

राज्य में राष्ट्रपति की मंजूरी के साथ ही राष्ट्रपति शासन संबंधित औपचारिकताएं भी शुरू हो गई हैं. समाचार एजेंसी के सूत्रों के मुताबिक राष्ट्रपति इस मामले में कानूनी विशेषज्ञों से सलाह लेने और सभी पक्षों के दावों पर गंभीरता से परखने के बाद इस फैसले पर अपनी मुहर लगाई है.

अरुणाचल के पूर्व सीएम नबाम तुकी का कहना है कि अब यह मामल सुप्रीम कोर्ट में है और हम इस मामले में कानूनी लड़ाई लड़ेंगे. पूर्व सीएम ने कहा कि कांग्रेस को वर्तमान विधानसभा में पूर्ण बहुमत प्राप्त है. माननीय उच्चतम न्यायालय ही इस मामले में अब कोई फैसला देगी.

नबाम तुकी ने कहा, 'गुजरात में दंगों के बाद भी वहां पर राष्ट्रपति शासन नहीं लगाया गया. अरुणाचल में तो एक मच्छर भी नहीं मरा फिर भी हमें परेशान किया जा रहा है. हम राष्ट्रपति के सामने और सुप्रीम कोर्ट में विरोध दर्ज करेंगे.'

वहीं दूसरी तरफ कांग्रेस सरकार के खिलाफ बगावत के नेतृत्व कर रहे कलिखो पुल ने इस मामले में कहा कि राज्य में राष्ट्रपति शासन के लिए तुकी ही जिम्मेदार है. बीजेपी इसके लिए कतई जिम्मेदार नहीं है.

ज्ञात हो कि इस मामले में कांग्रेस अध्यक्ष सोनिया गांधी के नेतृत्व में पार्टी के प्रतिनिधिमंडल ने राष्ट्रपति प्रणव मुखर्जी से मुलाकात कर उनसे अनुरोध किया था कि वह अरुणाचल प्रदेश में राष्ट्रपति शासन लगाने की केंद्र सरकार की सिफारिश को स्विकार न करें.

कांग्रेस ने केंद्रीय कैबिनेट के इस फैसले को गैर संवैधानिक करार देते हुए इसका विरोध किया था. लेकिन अब इस फैसले को राष्ट्रपति की मंजूरी मिलने से कांग्रेस को जबरदस्त धक्का लगा है.

गृह मंत्रालय की ओर से अरुणाचल प्रदेश में राष्ट्रपति शासन की सिफारिश के मामले में यह दलील दी थी कि चूंकि अरुणाचल प्रदेश में विधानसभा का सत्र 21 जुलाई को समाप्त हुआ और राजनैतिक हालात की वजह से 6 महीनों के भीतर यानी 21 जनवरी तक दोबारा सत्र का आयोजन नहीं हुआ है.

संवैधानिक बाध्यता की वजहसे किसी भी सरकार को 6 महीनों के भीतर सत्र बुलाना होता है. लेकिन अरुणाचल प्रदेश की सरकार इस अहर्ता को प्राप्त करने में असफल रही है. इसलिए राज्य में राष्ट्रपति शासन लगाना ही एक मात्र विकल्प है. 

मालूम हो कि 18 जनवरी को अरुणाचल प्रदेश में एक नाटकीय घटनाक्रम में कांग्रेस के बागी विधायकों ने भाजपा सदस्यों के साथ मिलकर बैठक करके मुख्यमंत्री नबाम तुकी को पद से हटाने और उनकी जगह कांग्रेस के एक बागी विधायक को चुनने का फैसला किया.

तब इस मामले में राज्यपाल जेपी राजखोवा के हस्तक्षेप से नाराज गुवाहाटी उच्च न्यायालय ने राज्य ‘विधानसभा’ के बागियों द्वारा लिए गए सभी फैसलों पर रोक लगा दी जिसमें विधानसभा अध्यक्ष नाबम रेबिया को हटाने का निर्णय भी शामिल था.

First published: 27 January 2016, 15:00 IST
 
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