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असमः बीजेपी दोस्त और दुश्मन दोनों खेमों में सेंध मार सकती है

सादिक़ नक़वी | Updated on: 17 July 2016, 8:31 IST
(कैच)

असम में खबर गर्म है कि असम गण परिषद (एजीपी) का एक धड़ा बीजेपी में शामिल हो सकता है लेकिन गठबंधन सरकार की संवेदनशीलता को देखते हुए इसकी आधिकारिक घोषणा नहीं की जा रही है. बीजेपी के अंदरूनी सूत्रों की मानें तो पार्टी को उम्मीद है कि इससे उसकी राज्य में पहुंच बढ़ेगी और राज्य में सरकार चलाने में भी मदद मिलेगी.

सूत्रों के अनुसार एजीपी का एक धड़ा अतुल बोरा के नेतृत्व में बीजेपी में शामिल हो सकता है. जब राज्य में गठबंधन सरकार बनी तो मंत्रिमंडल में बोरा के धड़े को प्रफुल्ल कुमार महंत के धड़े से ज्यादा तरजीह मिली.

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एजीपी के अध्यक्ष बोरा को कृषि, पशु पालन, शहरी विकास इत्यादि मंत्रालय दिए गए. वहीं केशब महंत को जल संसाधन, विज्ञान, तकनीकी और सूचना प्रौद्योगिकी इत्यादि मंत्रालय दिए गए.

माना जाता है कि राज्य में चुनाव पूर्व गठबंधन में इन दोनों नेताओं की अहम भूमिका रही थी.

प्रफुल्ल कुमार महंत का विरोध

एजीपी के वरिष्ठ नेता और पूर्व मुख्यमंत्री प्रफुल्ल कुमार महंत राज्य में बीजेपी के लिए मुश्किल खड़ी करते रहे हैं. प्रफुल्ल ने शुक्रवार को सरकार के खिलाफ हुए विपक्षी दलों के विरोध प्रदर्शन में हिस्सा लिया था. विपक्षी नेता दिसपुर की ऑयल फील्ड की नीलामी का विरोध कर रहे थे. नीलामी का ये फैसला केंद्र सरकार ने लिया था.

इस विरोध के निशाने पर एजीपी भी है क्योंकि बोरा और केशब महंत दोनों सरकार का हिस्सा हैं.

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माना जा रहा है कि एजीपी और बीजेपी के बीच 127 वस्तुओं को वैल्यू-एडेड टैक्स (वैट) के तहत लाने पर भी गतिरोध है.

बीजेपी के अंदर एक धड़े का मानना है कि एजीपी अगर दो फाड़ हो जाती है तो इससे पार्टी को अल्पसंख्यक शरणार्थियों को नागरिकता देने जैसे विवादित मुद्दों से निपटने में सुविधा होगी. 

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एजेपी ने असम आंदोलन की अगुवाई की थी. वो शरणार्थियों को नागरिकता देने के पूरी तरह खिलाफ है. बोरा एवं अन्य नेता जहां कई बार ये कह चुका हैं कि इस मुद्दे को बीजेपी से संग बातचीत से सुलझाया जा सकता है, वहीं प्रफुल्ल कुमार महंत इसके पूरी तरह खिलाफ हैं.

चुनाव से पहले गठबंधन हो जाने के बावजूद प्रफुल्ला कुमार महंत ने अपने कई इंटरव्यू में कहा था कि एजेपी और बीजेपी का एजेंडा अलग-अलग है.

माना जाता है कि बीजेपी शरणार्थियों को नागरिकता देने के मुद्दे पर समझौता करने को तैयार नहीं है. चुनाव से पहले बीजेपी ने अवैध शरणार्थियों के मुद्दे को खूब उछाला. वो इसे भुनाने में भी कामयाब रही और दबाव में आकर एजेपी को उससे गठबंधन करना पड़ा.

असम आंदोलन से निकले नेता

राज्य के मुख्यमंत्री सर्बानंद सोनोवाल और वरिष्ठ मंत्री हेमंत बिस्व सर्मा दोनों ने अपना राजनीतिक करियर असम आंदोलन से शुरू किया था.

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सोनोवाल पहले एजेपी में थे और वो 2012 में बीजेपी में शामिल हो गए थे. एक अन्य वरिष्ठ एजेपी नेता और पूर्व पार्टी अध्यक्ष चंद्रमोहन पटवारी भी 2014 में बीजेपी में चले गए थे. ऐसे में एजेपी के दूसरे वरिष्ठ नेता बीजेपी में शामिल होते हैं तो इसपर किसी को हैरत नहीं होगी.

माना जाता है कि संसाधनों के मामले में एजेपी पूरी तरह बीजेपी पर निर्भर है. वहीं बीजेपी का मानना है कि 'एजेपी के पांच प्रतिशत वोटों' के लिए उसे बहुत ज्यादा संसाधन खर्च करने पड़ते हैं.

कांग्रेस में भी फूट की आशंका

राज्य में केवल एजेपी नेताओं के बीजेपी में जाने की चर्चा नहीं है. कई कांग्रेसी नेता भी बीजेपी में जाने की कतार में बताए जा रहे हैं.

बीजेपी के राज्य प्रवक्ता पबित्र मार्गेरिटा ने कहा, "कल ही बैथललांग्सु के विधायक मानसिंग रोंगपी ने बीजेपी में आने के लिए अपनी पार्टी और पद से इस्तीफा दे दिया."

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पबित्र ने कहा कि किसी विधायक का अपने पद से इस्तीफा दे देना बहुत बड़ी बात है. उन्होंने दावा किया कि राज्य में बीजेपी के सदस्यों की संख्या में तेजी से बढ़ोतरी हुई है. 2013 में राज्य में पार्टी के कुल 2.5 लाख सदस्य थे वहीं इस समय करीब 27 लाख सदस्य हैं.

बीजेपी के सूत्रों की मानें तो राज्य के बराक वैली इलाके के प्रमुख कांग्रेसी नेता गौतम रॉय भी बीजेपी से संपर्क में हैं.

First published: 17 July 2016, 8:31 IST
 
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