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बस्तर में माओवादी घटनाओं की सच्चाई जानना सबसे मुश्किल काम है

शिरीष खरे | Updated on: 4 March 2016, 22:19 IST
QUICK PILL
  • छत्तीसगढ़ में बीते हफ्ते कई माओवादी घटनाओं के चलते पूरे\r\n देश का ध्यान इस ओर गया है. इससे यह भी लगने लगा है कि सरकार के पास इस चुनौती से निपटने के लिए कोई कारगर रणनीति नहीं है
  • माओवादियों ने आरोप लगाया है कि फर्जी लोगों का समर्पण करवाया गया. इन्हें 10-10 हजार रुपए देने की घोषणा की गई और यह पुलिस \r\nकी कमाई का जरिया बन गया है.
  • आरोप है कि सुरक्षा बलों द्वारा ग्रामीणों को घेरकर \r\nथाने लाया गया. बाद में इन्हीं गांव वालों से 15 महिलाओं समेत 70 लोगों से \r\nजबरिया समर्पण का नाटक करवाया गया.

एक मार्च, 2016 को छत्तीसगढ़ के राज्यपाल बलरामदास टंडन विधानसभा बजट-सत्र के पहले दिन अपने अभिभाषण में माओवादियों से निपटने को लेकर केंद्र और राज्य सरकार की तारीफ कर रहे थे. उनका कहना था कि राज्य माओवादियों के खिलाफ निर्णायक लड़ाई जीतने की तरफ बढ़ रहा है.

माओवादी मोर्चे पर जैसे ही उन्होंने सरकार की उपलब्धियां गिनानी शुरू की, विपक्षी दल कांग्रेस के विधायक भड़क गए. उन्होंने राज्यपाल से कहा कि सरकार उनसे अभिभाषण के जरिए झूठ बुलवा रही है. कांग्रेस विधायकों के शोर-शराबे के चलते राज्यपाल अभिभाषण के पहले तीन और आखिरी के एक पैराग्राफ को ही पढ़ पाए. काग्रेस का आरोप है कि माओवाद उन्मूलन के नाम पर आत्मसमर्पण, गिरफ्तारी और मुठभेड़ की फर्जी घटनाएं हो रही हैं और इसमें बेकसूर आदिवासी मारे जा रहे हैं.

मानवाधिकार संगठनों का कहना है कि सुरक्षा बल युद्ध की रणनीति के तौर पर यौन हिंसा की वारदातों को अंजाम दे रहे हैं

इसी दिन मंगलवार को जब विधानसभा का बजट-सत्र शुरू हुआ तो पुलिस के हवाले से बताया गया कि माओवाद प्रभावित नारायणपुर जिले में संदिग्ध माओवादी ग्रामीणों की हत्याएं कर रहे हैं. पुलिस प्रशासन ने पहले दिन तीन ग्रामीणों के मारे जाने की खबर दी. अगले दिन बुधवार को पुलिस ने दावा किया कि माओवादियों ने 16 लोगों को मौत के घाट उतारा है.

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बस्तर रेंज के आईजी एसआरपी कल्लूरी की मानें तो मंगलवार को माओवादियों ने नारायणपुर जिले के पांच गांवों आलबेड़ा, कुंदला, नेतापुर, परपा और मरबेड़ा में धावा बोला और अंधाधुंध गोलियां चलाते हुए 16 ग्रामीणों को मार डाला. कल्लूरी के मुताबिक माओवादियों ने ग्रामीणों पर पुलिस के साथ मिलकर मुखबिरी का आरोप लगाया था.

यदि मामले की गहराई में जाएं तो माओवादी चेतावनी देकर या जन अदालत लगाकर ग्रामीणों की हत्या करते रहे हैं, लेकिन इस बार उन्होंने ऐसा कुछ नहीं किया. इस सवाल पर कल्लूरी का कहना है, 'पुलिस की लगातार दबिश और गिरफ्तारियों से घबराकर नक्सली कमांडर सुरक्षित ठिकानों की तलाश में हैं. ग्रामीणों का उनसे मोहभंग हो गया है और स्थानीय स्तर पर उन्हें पहले जैसा सहयोग नहीं मिल रहा है. इसलिए दहशत फैलाने के लिए वे सामूहिक हत्याएं कर रहे हैं. इसीलिए इस बार उन्होंने बिना बताएं ही ग्रामीणों पर अंधाधुध गोलियां चलाईं.'

अजब संयोग है कि ठीक इसी दिन यानी एक मार्च को पुलिस ने बस्तर संभाग की सीमा से सटे तेलगांना राज्य के खम्मन जिले के जंगल में पांच महिलाओं सहित आठ माओवादियों के मारे जाने की पुष्टि की.

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छत्तीसगढ़ के बस्तर क्षेत्र में इन माओवादी घटनाओं के चलते एक बार फिर पूरे देश का ध्यान 'लाल आंतक' की तरफ गया. इससे यह भी साफ हो गया कि प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी और गृहमंत्री राजनाथ सिंह द्वारा राज्य को माओवादियों से मुक्ति दिलाने के दावों के बावजूद केंद्र और राज्य सरकारों के पास इस चुनौती से निपटने के लिए कोई कारगर रणनीति नहीं है.

बीते दिनों माओवादियों के साथ मुठभेड़ की बढ़ती घटनाओं के चलते यह समस्या और भी गंभीर और जटिल होती जा रही है. पुलिस और माओवादियों की लड़ाई में आदिवासियों को मुसीबतों का सामना करना पड़ रहा है और दोनों के बीच संघर्ष में हजारों आदिवासी मारे जा रहे हैं.

पुलिस और माओवादियों की लड़ाई के बीच हजारों आदिवासी मारे जा रहे हैं

आम आदमी पार्टी के प्रदेश संयोजक संकेत ठाकुर बताते हैं, 'सरकार माओवादी हिंसा को सिर्फ कानून व्यवस्था की समस्या मान रही है, जबकि इसकी जड़ में सामाजिक और आर्थिक कारण छिपे हैं, लेकिन इस ओर कोई कदम नहीं उठाया जा रहा है.'

माओवाद प्रभावित इलाकों के लोग आज भी सड़क, पानी, स्वास्थ्य और शिक्षा जैसी बुनियादी सुविधाओं के लिए तरस रहे हैं. इसी साल राज्य सरकार ने युक्तिकरण के नाम पर अकेले बस्तर संभाग के साढ़े सात सौ स्कूलों को बंद कर दिया है.

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कुछ मानवाधिकार कार्यकर्ता सरकार पर आरोप लगा रहे हैं कि वह माओवादियों को क्रूर तरीके से पेश करने के लिए फर्जी वारदातों कां अंजाम देकर उन्हें जिम्मेदार ठहरा रही हैं. यही माओवादी उन्मूलन का सरकारी तरीका है. सच्चाई बस्तर से बाहर जाने न पाए, इसके लिए सामाजिक कार्यकर्ता वकील और पत्रकारों तक को निशाना बनाया जा रहा है, उन्हें छत्तीसगढ़ छोड़ने पर मजबूर किया जा रहा है.

वरिष्ठ पत्रकार आलोक पुतुल के मुताबिक बस्तर में माओवाद से जुड़ी किसी भी घटना की सच्चाई जानना सबसे मुश्किल काम हो गया है.

कांग्रेस के प्रदेश अध्यक्ष भूपेश बघेल ने हालिया नक्सली वारदातों और ग्रामीणों की हत्या को लेकर आरोप लगाया है, 'बस्तर के इलाकों में महिलाओं के साथ अनाचार और अपहरण की घटनाएं हो रही हैं. कई घटनाओं में पुलिस की संलिप्तता सामने आई है, लेकिन पुलिस का मनोबल न टूट जाए, यह दलील देकर किसी भी जिम्मेदार व्यक्ति के खिलाफ कार्रवाई नहीं की जा रही है.'

माओवाद प्रभावित बीजापुर जिले में इसी साल एक घटना चर्चा में रही. वहां कि आदिवासी महिलाओं ने आरोप लगाया कि 11 से 14 जनवरी के बीच बासागुड़ा थाने के अलग-अलग गांवों में सुरक्षा बल पहुंचे और उन्होंने उनके साथ सामूहिक अनाचार किए.

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इस मामले में बस्तर संभाग के आईजी कल्लूरी की सफाई थी कि इस तरह की शिकायतें पुलिस के खिलाफ माओवादी समर्थकों के दुष्प्रचार का हिस्सा है. वहीं, मानवाधिकार संगठनों का कहना है कि सुरक्षा बल के जवान युद्ध की रणनीति के तौर पर यौन हिंसा की वारदातों को अंजाम दे रहे हैं.

बस्तर की परेशानी है कि यहां लोकतंत्र इस हद तक खत्म कर दिया गया है कि हर मुठभेड़ के बाद जितने मुंह उतनी बातें होती हैं

बस्तर की परेशानी है कि यहां की सच्चाई सामने आने के लिए व्यवस्था में जितनी पारदर्शिता होनी चाहिए, नहीं है. यहां लोकतंत्र इस हद तक खत्म कर दिया गया है कि हर मुठभेड़ के बाद जितने मुंह उतनी बातें होती हैं. हो भी क्यों नहीं? एक जनवरी, 2016 को चिंतलनार थाना अंतर्गत बस्तर रेंज के आईजी कल्लूरी की मौजूदगी में हुए 70 कथित माओवादियों के आत्मसमर्पण की घटना पूरी तरह फर्जी साबित हुई थी.

इस घटना में पता चला कि चिंतलनार और आसपास के ग्रामीणों तथा साप्ताहिक हाट-बाजार गए लोगों को सुरक्षा बलों द्वारा घेरकर थाने लाया गया. बाद में इन्हीं गांव वालों से 15 महिलाओं समेत 70 लोगों से जबरिया समर्पण का नाटक करवाया गया.

राजस्थान पत्रिका ने इस खबर को उद्घाटित किया था. जिन लोगों ने फर्जी समर्पण से इंकार कर दिया, उन्हें जेल भेज दिया गया.

जिन लोगों ने समर्पण किया है, उन्हें 10-10 हजार रुपए देने की घोषणा की गई है. माओवादियों ने आरोप लगाया है कि आत्मसमर्पण की मनगढंत कहानी बताकर पुलिस कमाई में जुटी है. उनका कहना है कि पिडमेल, कसलपाड, रामुम और पावुरगुडा में पीएजीए ने सुरक्षा बलों को भारी नुकसान पहुंचाया है. दूसरी तरफ पुलिस भी माओवादियों का जबरदस्त नुकसान पहुंचने का प्रचार कर रही है.

कहानी का लब्बोलुआब यह है कि छत्तीसगढ़ में नक्सलवाद की कहानी को समझना लगभग नामुमकिन है.

First published: 4 March 2016, 22:19 IST
 
शिरीष खरे @catch_hindi

विशेष संवाददाता, राजस्थान पत्रिका

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