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दिल्ली में लोकतंत्र की हत्या, लोकतंत्र जिंदाबाद!

आशुतोष | Updated on: 4 September 2016, 8:14 IST
QUICK PILL
  • स्वतंत्र भारत में ऐसा पहले कभी निर्वाचित सरकार के साथ नहीं हुआ, जैसा वर्तमान में दिल्ली की सरकार के साथ हो रहा है. राज्यपाल का रवैया एक चुनी हुई सरकार को सच में महत्वहीन बनाता है.
  • ये समझ से परे है कि दिल्ली में विधानसभा और निर्वाचित सरकार के होने का क्या तुक है, जब उसे गैर निर्वाचित व्यक्ति की बीन पर ही नाचना है.

दिल्ली में लोकतंत्र नहीं रहा. राजतंत्र का उदय हो चुका है. प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की कृपा से राष्ट्रीय राजधानी में एक राजा फिर से जीवित हो गया है. पिछले कुछ महीनों से दिल्ली एक नए सम्राट की तानाशाही भोग रही है.

काफी समय पहले उस शख्स ने कहा था, 'मैं फ्रांसिसी सम्राट लुइस चौदहवें की तरह सरकार हूं, जिन्होंने विश्व को बताया था कि 'आई एम द स्टेट' (मैं ही राजसत्ता हूं)'.

आज उनका नाम है नजीब जंग. दिल्ली के उपराज्यपाल (लेफ्टिनेंट गर्वनर-एलजी). दिल्ली की निर्वाचित सरकार को इस शख्स ने अपनी एक प्रतिक्रिया में कहा था कि वे सरकार हैं. इसको लेकर जब उपद्रव हुआ, तब कहीं जाकर उन्होंने अपना कथन वापस लिया.

दिल्ली सरकार के अधिकार-क्षेत्र और एलजी को लेकर दाखिल याचिका पर दिल्ली के उच्च न्यायलय के फैसले के बाद जंग ने सारी शक्तियां अपने हाथ में ले लीं और लोकतांत्रिक रूप से निर्वाचित आप सरकार को सही मायने में पंगु बना दिया.

आप सरकार के पास काम की बिल्कुल गुंजाइश नहीं रही. आप ने दिल्ली उच्च न्यायालय के आदेशों को सर्वोच्च न्यायालय में चुनौती दी है.

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न्यायालय के आदेशों के बाद उपमुख्यमंत्री मनीष सिसोदिया जंग से मिले और आग्रह किया कि वे उन दो अधिकारियों का तबादला नहीं करें, जो स्वास्थ्य सेवाओं और शिक्षा के महत्वपूर्ण विकास की दो प्रमुख परियोजनाओं के लिए अहम हैं. ये वे क्षेत्र हैं, जो स्वतंत्र भारत में सबसे ज्यादा उपेक्षित रहे हैं.

निर्वाचित सरकार से चपरासियों सहित किसी भी अधिकारी को नियुक्त करने अथवा तबादले करने की सारी शक्तियां छीन लीं

पहले अधिकारी पीडब्ल्यूडी सचिव सर्वज्ञ श्रीवास्तव, दिल्ली में नए सरकारी विद्यालयों और कक्षाओं के निर्माण का काम देख रहे थे. लगभग 8,000 कक्षाओं का निर्माण हो चुका था और बाकी अगले साल 31 मार्च तक बन जाना तय था.

दूसरे अधिकारी तरुण सीम, दिल्ली के मोहल्ला क्लिनिकों के प्रभारी थे. विश्व स्तर की स्वास्थ्य सेवाओं की व्यवस्था करने और उन्हें आम आदमी को मुहैया कराने की उनकी पहल को वाशिंगटन पोस्ट और शिकागो ट्रिब्यून तक ने अपनेे स्तंभों में काफी सराहा था.

पर निर्वाचित सरकार के आग्रह के बावजूद बहुत ही निरंकुशता से न केवल इन अधिकारियों का तबादला कर दिया गया, बल्कि सरकार को इसके बारे में सूचना तक नहीं दी गई. सरकार को इसकी जानकारी मीडिया से मिली.

फिर दिल्ली के इस नए तानाशाह ने सबसे विचित्र आदेश दिया, जिसने निर्वाचित सरकार से चपरासियों सहित किसी भी अधिकारी को नियुक्त करने अथवा तबादले करने की सारी शक्तियां छीन लीं.

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आदेश था- 'चपरासी और क्लर्क के तबादले विभाग का प्रभारी करेगा. प्रबंधक की रैंक के अधिकारी का तबादला सेवा विभाग करेगा, उप सचिव की रैंक के अधिकारी का तबादला मुख्य सचिव करेगा और डेनिक्स और आईएएस कैडर के अधिकारियों का तबादला एलजी खुद करेंगे. संबंधित मंत्री से कोई सलाह नहीं ली जाएगी.'

स्वतंत्र भारत में ऐसा पहले कभी निर्वाचित सरकार के साथ नहीं हुआ. यह रवैया चुनी हुई सरकार को सच में महत्वहीन बनाता है. यह और कुछ नहीं, बल्कि एक नौकरशाह रहे तानाशाह का सबकुछ अपने अधिकार में लेना है.

इस आदेश के बाद, अधिकारियों ने अपने विभाग के मंत्रियों को रिपोर्ट करने से इनकार कर दिया. वे बैठकों में नहीं आते. सिसोदिया को बुधवार के दिन तीन बैठकें निरस्त करनी पड़ीं क्योंकि अधिकारियों ने किसी न किसी बहाने से आने की असमर्थता जाहिर की.

अधिकारियों ने अपने विभाग के मंत्रियों को रिपोर्ट करने से इनकार कर दिया. वे बैठकों में नहीं आते

जब से आप सरकार बनी है तब से ही एलजी ने सारी फाइलें अपने ऑफिस में भेजने को कहा. उन्होंने इन फाइलों की जांच के लिए एक समिति भी बनाई है; इसमें उनकी गड़बड़ नीयत भी हो सकती है.

बिना प्रधानमंत्री के प्रश्रय के किस एलजी या किसी गर्वनर में ऐसे आदेश पारित करने की हिम्मत होगी? चूंकि आप और अरविंद केजरीवाल ने मोदी को चुनौती देने का साहस किया और झुकने से इनकार कर दिया था इसलिए आप को यह कीमत चुकानी पड़ी.

पर एलजी ने इस तरह का व्यवहार पहली बार नहीं किया है. आप सरकार ने फरवरी 2015 में प्रभार संभाला था. आप सरकार को पहला झटका मार्च में लगा, जब जंग ने मुख्यमंत्री को 11 दिनों के लिए अपना अंतरिम मुख्य सचिव नियुक्त नहीं करने दिया और शकुंतला गेमलिन को मुख्यमंत्री पर थोप दिया, इसके बावजूद कि संबंधित अधिकारी के संदेहास्पद व्यवहार पर गंभीर आपत्तियां उठाई गई थीं.

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भ्रष्टाचार के प्रति शून्य सहनशीलता के मुद्दे को लेकर आप सत्ता में आई थी. आप सरकार ने एक हेल्पलाइन लॉन्च की ताकि लोग संपर्क कर सकें और सरकारी महकमों में हो रहे भ्रष्टाचार के मामलों की रिपोर्ट कर सकें.

शुरू के सौ घंटों में 32,489 कॉल्स आईं. 70 लोगों ने पर्याप्त प्रमाण दिए और उन मामलों को भ्रष्टाचार-विरोधी ब्यूरो (एसीबी) को भेजा गया, जिसने तुरंत 17 वरिष्ठ अधिकारियों को गिरफ्तार कर लिया. ज्यादातर मामले दिल्ली पुलिस से संबंधित थे.

अचानक 8 जून 2015 की एक खूबसूरत सुबह एसीबी को एलजी ने पुलिस बल भेजकर अधिकार में ले लिया और जिनके विरुद्ध भ्रष्टाचार के गंभीर आरोप थे, उन्हें छोडऩे के लिए एक नए चीफ मुकेश मीणा को नियुक्त कर दिया गया.

यह कहा गया कि एसीबी पुलिस की एक इकाई है और पुलिस विभाग केंद्र सरकार के अधीन आता है. वही एसीबी शुरुआत से ही दिल्ली की लोकतांत्रिक रूप से निर्वाचित सरकार को रिपोर्ट कर रहा था.

वही एसीबी 2013-2014 में अपने शुरुआती अवतार में आप सरकार को रिपोर्ट करता था और आप सरकार के आदेश के तहत, एसीबी ने रिलायंस के मालिक मुंकेश अंबानी और दो केंद्रीय मंत्रियों के खिलाफ एफआईआर दर्ज की थी.

पर आप सरकार को निष्क्रिय बनाने के लिए यही काफी नहीं था. 21 मई 2015 को केंद्र ने एक आदेश जारी करके दिल्ली सरकार को अपने अधिकारियों की नियुिक्त, तबादले अथवा पदोन्नति करने की सभी शक्तियों से अलग कर दिया.

पूरी केंद्र सरकार हमारे खिलाफ

जले पर नमक छिड़कने के लिए गृह मंत्रालय ने राज्य सरकार से बिना सलाह और सूचना के अधिकारियों को हटाना और उनका तबादला करना शुरू कर दिया.

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सभी अच्छे अधिकारी जिन्हें महत्व के काम दिए गए थे, एक-एक करके हटा दिए गए. यह आप सरकार को पटरी से उतारने और दिल्ली के लोगों के लिए उसे काम न करने देनेे की कोशिश थी.

दूसरी ओर, विधानसभा को भी पंगु बनाने की कोशिश की गई. दिल्ली विधानसभा द्वारा पारित विनियोग विधेयक सहित 23 बिल गृह मंत्रालय के पास भेजे गए थे, पर केंद्र ने उन पर प्रतिक्रिया नहीं की.

वे छह महीने से लेकर एक साल से भी ज्यादा समय तक टालते रहे. कुछ विधेयक शिक्षा और न्यूनतम पगार से संबंधित थे. यहां तक कि 20,000 से ज्यादा अस्थाई शिक्षकों को स्थाई करने, दिल्ली की सरकारी स्कूलों में बच्चों को अच्छा खाना मिल सके, इसके लिए मिड-डे मील-अक्षय पात्र जैसे पददलितों के लिए कल्याणकारी कार्यों को एलजी ने अस्वीकार कर दिया.

यहां तक कि बाजार दर के साथ समरूपता लाने के लिए आप सरकार ने जब किसानों की भूमि के भाव प्रति एकड़ 56 लाख से 3 करोड़ करना चाहा, तो उसे भी एलजी ने रोक दिया.

सूचि अंतहीन है. मैं इसकी भी चर्चा नहीं कर रहा कि किस तरह आप विधानसभा सदस्यों पर झूठे आरोप लगाकर उन्हें गिरफ्तार किया गया और किस तरह मुख्यमंत्री कार्यालय पर सीबीआई ने छापा मारा और मुख्य सचिव को गिरफ्तार किया. इन सारे कारनामों से कुछ मौलिक प्रश्न उठते हैं-

-क्या यह संविधान की आत्मा के विरुद्ध नहीं है, जिसमें जनता द्वारा चुनी हुई सरकार और जनप्रतिनिधियों को लोकतंत्र और जनता पर शासन के लिए मजबूत स्थिति दी गई है?

- विधान सभा और निर्वाचित सरकार के होने का क्या तुक है, जब उसे गैर निर्वाचित व्यक्ति की बीन पर नाचना है?

- यदि गैर निर्वाचित नौकरशाह को सरकार चलानी है, तो प्राथमिकता से चुनाव क्यों कराए जाते हैं?

- और पार्टी के उन वादों का क्या होगा, जिसे दिल्ली के लोगों ने इस उम्मीद से मत दिया है कि सरकार में आने वाली पार्टी अपना घोषणा-पत्र लागू करेगी?

ये सरल प्रश्न हैं. हम सब जवाब जानते हैं. पर सबसे बड़ा सवाल यह है कि दुनिया का सबसे बड़ा लोकतंत्र राष्ट्रीय राजधानी में ऐसा कैसे होने दे सकता है? नागरिक समाज मौन क्यों है?

मैं समझ सकता हूं कि आप पूरी व्यवस्था को चुनौती देने की कीमत अदा कर रही है. मुझे सुकरात की याद हो आई, जिसे व्यवस्था को चुनौती देने के दंड में जेल और जहर मिला.

हम लोकतंत्र में रहते हैं. यदि लोकतंत्र में ऐसा होता है, तो यह भविष्य में बहुत ही गंभीर और खतरनाक समय के संकेत हैं.

(लेखक आम आदमी पार्टी के राष्ट्रीय प्रवक्ता है)

First published: 4 September 2016, 8:14 IST
 
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