Home » इंडिया » in fcra : bjp try to hide his face for law change
 

एफसीआरए में बदलाव: भाजपा, कांग्रेस की मिलीभगत का सच

सौरभ दत्ता नीरज ठाकुर | Updated on: 5 April 2016, 8:55 IST
QUICK PILL
  • केंद्रीय वित्त मंत्री अरुण जेटली ने इस वर्ष के केंद्रीय बजट में प्रस्तुत\r\n वित्त विधेयक में एक अतिरिक्त अनुच्छेद जोड़कर बड़ी चालाकी से फ़ॉरेन कंट्रीब्यूशन रेगुलेशन एक्ट (एफसीआरए) कानून को\r\n बदलने का प्रयास किया है
  • एफसीआरए कानून में इस संशोधन के माध्यम से बीजेपी और कांग्रेस द्वारा विदेशी कंपनी से चंदा लेकर किये गए गैरकानूनी काम को कानूनी बना दिया गया.

जबसे दिल्ली में बीजेपी ने केंद्र की सत्ता संभाली है तबसे उसका रवैया विदेशों से पैसा लेने वाले संस्थानों और गैर सरकारी संगठनों (एनजीओ) को ऐसे देशविरोधी संगठन साबित करना रहा है जो भारत में दूसरे देशों के हितों को बढ़ावा देने के काम में लगे हैं.

लेकिन उनकी यह चाल खुद के कारनामों पर पर्दा डालने की अधिक लगती है क्योंकि उनकी पार्टी चंदे के रूप में विदेशों से पैसा लेने के मामले में दूसरी पार्टियों से कहीं आगे है और देश में शीर्ष पर है.

द वायर की एक खबर के अनुसार, ‘‘भारतीय जनता पार्टी और कांग्रेस दोनों ने लंदन स्थित बहुराष्ट्रीय कंपनी ‘वेदांता’ से दान लेकर विदेशी अंशदान (विनियमन) अधिनियम 2010 (एफसीआरए) का उल्लंघन किया था लेकिन केंद्र में सत्तारूढ़ मोदी सरकार ने चुपके से दोनों पार्टियों को कानूनी शिकंजे से बाहर निकालने का काम किया है.’’

पढ़ें: अरविंद सुब्रमण्यम: इनकम टैक्स में छूट के दायरे को न बढ़ायें जेटली

दिल्ली उच्च न्यायालय ने वर्ष 2014 में अपने एक आदेश में बीजेपी और कांग्रेस दोनों को फ़ॉरेन कंट्रीब्यूशन रेगुलेशन एक्ट (एफसीआरए) के उल्लंघन का दोषी पाया और सरकार और चुनाव आयोग को उनके खिलाफ कार्रवाई करने का आदेश दिया. लेकिन अब सरकार ने इस कानून में ही परिवर्तन कर दिया है.

केंद्र सरकार ने इस मामले में उच्चतम न्यायालय का रुख किया है जहां यह मामला फिलहाल लंबित है. इसी बीच केंद्रीय वित्त मंत्री अरुण जेटली ने इस वर्ष के केंद्रीय बजट में प्रस्तुत वित्त विधेयक में एक अतिरिक्त अनुच्छेद जोड़कर बड़ी चालाकी से इस कानून को बदलने का प्रयास किया है.

यह नया अनुच्छेद पूर्वव्यापी एफसीआरए में संशोधन करते हुए विदेशी कंपनियों को ‘‘भारतीय कंपनियों’’ के रूप में परिभाषित करता है. इस प्रकार इस संशोधन के माध्यम से बीजेपी और कांग्रेस द्वारा विदेशी कंपनी से चंदा लेकर किये गए गैरकानूनी काम को कानूनी बना दिया गया है.

पढ़ें: खराब वैश्विक हालात के बावजूद 7.6% रहेगी जीडीपी दर

'द वायर' के अनुसार, एफसीआरए में वित्त विधेयक में किया गया संशोधन कुछ इस प्रकार हैः

‘‘विदेशी अंशदान (विनियमन) 2010 अधिनियम की धारा 2 में, उप धारा (1) के खंड (जे), उपखंड (vi) मेें, निम्नलिखित नया उपबंध जोड़ा जा रहा है जो कि 26 सितंबर 2010 से लागू माना जाएगा.

‘बशर्ते कि जहां शेयर पूंजी का अंकित मूल्य एक कंपनी के शेयर पूंजी के मूल्य में विदेशी धन की निर्धारित सीमा के भीतर हो जैसा कि विदेशी मुद्रा प्रबंधन अधिनियम, 1999 में वर्णित है. योगदान करने के समय में कंपनी की कुल कीमत यदि के योगदान के शेयर पूंजी का आधा से अदिक है तो इस तरह की कंपनी को विदेशी स्रोत नहीं समझा जाएगा.’

एफसीआरए सबसे पहले वर्ष 1976 में प्रभाव में आया था

एफसीआरए सबसे पहले वर्ष 1976 में प्रभाव में आया था. वर्ष 2010 में इस अधिनियम के दायरे को विस्तृत करने के लिये इसमें संशोधन किये गए. इस कानून के अनुसार राजनीतिक दल या उनके पदाधिकारी कैसा भी विदेशी चंदा नहीं स्वीकार कर सकते.

पढ़ें: 2016 में अर्थव्यवस्था को मोदी सरकार से बड़ी उम्मीदें

इसी प्रकार सांसद, चुनाव में खड़े उम्मीदवार और राजनीतिक प्रकृति के संगठन भी इस कानून के दायरे में आते हैं और उनके भी किसी भी प्रकार का विदेशी चंदा लेने पर रोक है.

भारत में तमाम राजनीतिक दल आयकर से पूरी तरह मुक्त हैं. हालांकि इस छूट को हासिल करने के लिये उन्हें 20 हजार रुपये से अधिक के प्रत्येक दान से संबंधित जानकारी चुनाव आयोग के सामने प्रस्तुत करनी होती है.

सरकार की आलोचना

इस खबर पर प्रतिक्रिया देते हुए आम आदमी पार्टी (आप) ने एफसीआरए कानूनों में बदलाव करने के लिये बिना मौका गंवाए बीजेपी पर हमला किया.

पार्टी ने एक प्रेस विज्ञप्ति जारी कर कहा, ‘‘श्री जेटली का गुपचुप तरीके से एफसीआरए कानून में बदलाव करने का निर्णय राजनीतिक अवसरवाद का सबसे बड़े उदाहरण है. स्पष्ट है कि उनका यह कदम बीजेपी और कांग्रेस को चुनाव आयोग की कार्रवाई से बचाने में मददगार साबित होगा.’’

वर्ष 2013 में केंद्र सरकार ने औद्योगिक घरानों को राजनीतिक दलों को चुनावी चंदा देने के लिये न्यास बनाने की एक योजना को अधिसूचित किया था. राजनीतिक दलों द्वारा पेश की गई चंदे संबंधी रिपोर्ट की जांच में यह तथ्य सामने आया कि कुछ राजनीतिक दलों ने इन चुनावी न्यासों द्वारा प्राप्त चंदे को भी घाषित कर रखा है.

पढ़ें: क्या भारत की लोकतांत्रिक व्यवस्था 8 से 10 प्रतिशत की विकास दर हासिल कर सकती है?

इन न्यासों से चंदा पाने वाले दलों में भारतीय जनता पार्टी और कांग्रेस दोनों ही शामिल थीं. इन दोनों ही पार्टियों ने विशेष रूप से तीन औद्योगिक घरानों द्वारा स्थापित एक निश्चित न्यास से चंदा लेना स्वीकार किया है.

इन कंपनियों की वेबसाइट के मुताबिक ये तीनों कंपनियां पूर्ण रूप से यूनाईटेड किंगडम में पंजीकृत एक कंपनी की सहायक कंपनियां हैं.

नतीजतन व्यावसायिक लहजे से देखने पर सिद्ध होता है कि दोनों पार्टियों द्वारा प्राप्त पूंजी वास्तव में पूरी तरह से विदेशी चंदा है और इस प्रकार इन पर एफसीआर के उल्लंघन का मामला बनता है.

अब तक सरकारें एफसीआरए को अपनी खिलाफत करने वालों के विरुद्ध इस्तेमाल करती आई हैं

अब तक सरकारें एफसीआरए को अपनी खिलाफत करने वालों के विरुद्ध इस्तेमाल करती आई हैं. यहां तक कि यह सरकार इससे भी एक कदम आगे बढ़ते हुए असंतुष्टों के खिलाफ इस कानून का कड़ाई से पालन कर रही है.

उदाहरण के लिये सरकार ने अपने सबसे प्रखर आलोचकों में से एक रही सामाजिक कार्यकर्ता तीस्ता शीतलवाड़ और वकील और सामाजिक कार्यकर्ता इंदिरा जयसिंह के खिलाफ एक ‘एफसीआरए युद्ध’ जैसा छेड़ दिया है और इन दोनों को गाहे-बगाहे अदालत तक घसीट रही है.

पढ़ें: भारत-जापानः वाजपेयी-मोरी के सपनों को पूरा करेंगे मोदी-अबे?

लेकिन अब जब बात खुद पर आई तो सरकार चालबाजी खेलने के स्तर पर उतर आई और बीती तारीखों में कानून में संशोधन कर खुद को कानूनी कार्रवाई के दायरे से बाहर कर लिया.

बेशक सरकार के पास ऐसा करने की ताकत है और उसके पास ऐसा करने के लिये अधिकार भी मौजूद हैं. लेकिन उसका यह कदम राजनीतिक रूप से अनैतिकता की श्रेणी में आता है.

आज के समय में जब जवाबदेही और इमानदारी समय का सबसे बड़ा तकाजा है तब सरकार क्यों इस प्रकार के कदम उठा रही है?

एसोसिएशन फाॅर डेमोक्रेटिक रिफाॅर्म के संस्थापक प्रो. जगदीप छोकर कहते हैं, ‘‘यह सरकार के स्तर पर किया जाने वाला एक बेहद शर्मनाक काम है. सरकार ने यह कदम देश के दो सबसे बड़े राजनीतिक दलों को बचाने के लिये उठाया है जिनमें से एक (बीजेपी) का प्रतिनिधित्व वह खुद करती है.’’

First published: 5 April 2016, 8:55 IST
 
पिछली कहानी
अगली कहानी