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गोवा जहां भाजपा की लड़ाई हिन्दुत्ववादी दलों से है

निहार गोखले | Updated on: 7 February 2017, 8:10 IST

भारतीय जनता पार्टी के लिए गोवा एक विरोधाभासी राज्य बन गया है. पिछले साल महाराष्ट्र और हरियाणा में पार्टी की सरकारें बीफ (गौमांस) के उपभोग को लेकर कानून बना रहीं थी, उस समय पार्टी गोवा में रोमन कैथोलिक मतदान क्षेत्र होने के नाते गौमांस परोस रही थी. पार्टी ने गोवा में लोगों के बीफ खाने के अधिकार का बचाव किया था.

अब, इतिहास में शायद यह पहली बार है, जब भाजपा वैकल्पिक हिन्दुत्व गठबंधन के मुकाबले में चुनाव लड़ेगी. गोवा में 4 फरवरी को चुनाव होने हैं. इस गठबंधन का मुख्य एजेण्डा यही है-जिन लोगों ने राज्य में भाजपा को सरकार बनाने में मदद की थी, वह लोग पार्टी को क्षति पहुंचाएंगे. गठबंधन में शामिल लोगों ने भाजपा पर लोगों का विरोधी होने और कैथोलिक चर्च का पक्षपाती होने का आरोप लगाया है. 

हिन्दुत्व गठबंधन का नेतृत्व महाराष्ट्रवादी गोमान्तक पार्टी कर रही है. यह गोवा की सबसे पुरानी पार्टी है. गोवा के 1961 में पुर्तगाल से मुक्त होने के बाद इस क्षेत्रीय पार्टी ने राज्य में अपनी पहली सरकार बनाई थी. महाराष्ट्रवादी गोमान्तक पार्टी वर्तमान तक भाजपा की सहयोगी थी. आरएसएस के पूर्व नेता सुभाष वेलिंगकर ने अन्य सदस्यों के साथ मिलकर गोवा सुरक्षा मंच की स्थापना की है. वेलिंगकर गोवा के प्रांत संघ चालक थे. वह संघ से अलग हो गए थे.

पणजी में पत्रकारों से बातचीत में महाराष्ट्रवादी गोमान्तक पार्टी के अध्यक्ष दिलीप धवलीकर ने कहा कि पार्टी ने भाजपा से समर्थन वापस ले लिया है. और वह सैद्धान्तिक रूप से गोवा सुरक्षा मंच के साथ गठबंधन को सहमत हो गई है. आगामी हफ्तों में सीटों के बंटवारे पर चर्चा कर ली जाएगी.

धवलीकर ने कहा कि हमारा यह मानना है कि गोवा के लोगों के लिए एक क्षेत्रीय पार्टी की जरूरत है, जिसकी कमान अन्य कहीं न हो. यह पार्टी पश्चिम बंगाल, तमिलनाडु और ओडिशा जैसे की तरह हो सकती है.

चर्च के इशारे पर भाजपा

हकीकत तो यह है कि अन्य राज्यों में दक्षिणपंथी पार्टी का गठबंधन कमजोर होता जा रहा है. शुरुआत से ही गोमान्तक पार्टी का आधार पिछड़ी जाति के हिन्दुओं और बाहर से आए किसानों पर रहा है. गोमान्तक पार्टी 1990 के दशक तक सत्ता में थी. 

उस समय आरएसएस सुभाष वेलिंगकर के नेतृत्व में भाजपा और उसके नेता मनोहर पर्रिकर जैसे नेताओं की राज्य में पहचान बनाने की शुरुआत कर रहा था. भाजपा का दायरा राज्य में धीरे-धीरे बढ़ता गया. उसने एमजीपी के हिन्दू वोट बैंक में सेंध लगा ली और एमजीपी राज्य की राजनीति में कमजोर होती गई. आज यह हिन्दू बाहुल्य क्षेत्र पूर्व गोवा में सबसे सशक्त पार्टी है. यहां सनातन संस्था जैसे संगठनों के दफ्तर भी हैं.

केवल एक बार वर्ष 2007 को छोड़कर एमजीपी हमेशा भाजपा के साथ खड़ी कर रही है. यहां तक कि वर्तमान सरकार में भी वह भाजपा के साथ है.

एमजीपी नेताओं सुदीन और दीपक धवलीकर जैसे नेताओं के भाजपा के राष्ट्रीय अध्यक्ष नितिन गडकरी समेत अन्य पार्टी नेताओं के साथ अच्छे सम्बंध हैं. हालांकि 40 सदस्यीय विधान सभा में एमजीपी के तीन ही सदस्य हैं और इनसे सरकार की स्थिरता पर कोई असर नहीं होने वाला है. 

दो विधायक (धवलीकर बंधु) कौबिनेट मंत्री थे. मुख्यमंत्री लक्ष्मीकांत पारेस्कर ने अपनी संवैधानिक शक्तियों का उपयोग करते हुए धवलीकर बंधुओं को केबिनेट से बर्खास्त कर दिया है. सितम्बर 2016 में कैच ने पहली बार खबर दी थी कि एमजीपी का गठबंधन जीएसएम होने की खिजड़ी पक रही है.

इस गठबंधन का मुख्य मुद्दा अंग्रेजी माध्यम के स्कूलों को फंड देने को लेकर है. यह गठबंधन मराठी और कोंकणी भाषा के स्कूलों को फंडिंग के पक्ष में है. वेलिंगकर ने इस एक सूत्रीय एजेण्डे के आधार पर भाजपा सरकार और संघ से सम्बंध तोड़ लिए थे. एमजीपी ने इस मुद्दे पर पूर्व में भाजपा का समर्थन किया था, यहां तक कि 2012 के विधानसभा चुनावों में भी.

उन्होंने भाजपा सरकार पर रोमन कैथोलिक चर्च का पक्ष लेने का आरोप लगाया है. हाल में वेलिंगकर ने कहा था कि गोवा में भाजपा आर्क-विशप की सलाह पर अपनी राजनीति कर रही है.

चर्च के समर्थन से बनी थी भाजपा सरकार

एमजीपी-जीएसएम-सेना का यह गठबंधन भाजपा के वोट बैंक में सेंध लगाते हुए निम्न जाति के हिन्दुओं तक सम्भवत: अपनी पैठ बना सकता है. कैच से बातचीत करते हुए एमजीपी नेता और विधायक लावु मामलेदर ने कहा कि उनके एजेण्डे में शामिल होगा कि भाजपा किस तरह से उच्च जाति के हिन्दुओं के साथ खड़ी है और उनका पक्ष लेती रही है. 

मामलेदर ने कहा कि आप उनकी नीतियों को देख रहे हैं. वे कम्प्यूटर शिक्षा दे रहे हैं जो स्पष्ट रूप से धनाढ्य वर्ग की है. निम्न जाति के कई अफसरों को सालों से प्रमोशन नहीं मिला है. भाजपा केवल एक वर्ग के विकास के लिए काम करती है. हम सभी का विकास चाहते हैं.

एमजीपी गोवा में कृषि भूमि को लेकर भी अंसतुष्ट है और वह इसका पूरा लाभ उठाना चाहती है. पुर्तगाली गोवा में, भूमि उच्च जाति के कुछ ही हिन्दुओं और कैथोलिक के हाथों में है, जबकि पूरी आबादी बंटाईदारों की है. राज्य की पहली सरकार जिसका नेतृत्व एमजीपी के हाथ में था, उसने 1964 में एग्रीकल्चरल टेनेन्सी एक्ट बनाया था और सभी बटाईदारों को भूमि अधिकार दिए गए थे.

इस अधिनियम को 2014 में भाजपा सरकार ने संशोधित किया. इस संशोधन में अन्य बदलावों के अलावा सभी बंटाईदारों का टेनेन्सी अधिकार तीन साल की अवधि के लिए कर दिया गया. बंटाईदारों के कड़े विरोध के बाद वर्ष 2015 में अवधि का यह प्रतिबंध तो हटा दिया गया है, पर यह कानून अभी तक बना हुआ है. मामलेदर ने कैच से कहा कि हम इस संशोधन को वापस ले लेंगे. यह बंटाईदारों को भूमि से दूर रखने की कोशिश है. इससे तो बंटाईदार संकट में पड़ जाएंगे.

राज्य में यह विभाजन भाजपा के भविष्य के लिए अच्छा नहीं दिखाई दे रहा है. भाजपा राज्य में वर्ष 2012 में सत्ता में आई थी. सत्ता पर काबिज होने के लिए उसे एमजीपी के मतदाताओं, उसके हिन्दुत्ववादी वोट बैंक के साथ ही रोमन कैथोलिक वोट बैंक का भी सहारा मिला था. हाल में जो कुछ घटित हुआ है, उसमें पहले के दो आधार तो खतरे में हैं और कैथोलिक पर भरोसा नहीं किया जा सकता. पिछली बार उन्होंने भ्रष्ट कांग्रेस शासन को उखाड़ फेंकने के लिए वोट किया था.

दक्षिण पंथी दल में विभाजन से कांग्रेस और आम आदमी पार्टी में कुछ आशा की किरण जगी है. अन्य मुद्दों की परवाह किए बिना ही इन दलों को उम्मीद है कि हिन्दू बाहुल्य क्षेत्र से उन्हें वोट मिल जाएंगे. राज्य कांग्रेस के प्रवक्ता तार्जनो डि मैलो ने कैच से बातचीत में कहा कि राजनीतिक दल चुनावों के बाद गठबंधन कर सकते हैं. डि मेलो ने कहा कि यह देखा जाना बाकी है कि उनकी आपसी समझ कैसी है. यदि वे चुनावों के बाद खुले दिल से साथ आना चाहते हैं तो उन्हें अपना रुख स्पष्ट करने की जरूरत है या वे फिर वे केवल जनता को मूर्ख बना रहे हैं.

First published: 6 January 2017, 10:22 IST
 
निहार गोखले @nihargokhale

संवाददाता, कैच न्यूज़. जल, जंगल, पर्यावरण समेत नीतिगत विषयों पर लिखते हैं.

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