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साहसिक निर्णयों के अभाव में लकीर पीटता मंत्रिमंडल विस्तार

कैच ब्यूरो | Updated on: 6 July 2016, 14:46 IST

यदि पूरे केंद्रीय मंत्रिमंडल के विस्तार और फेरबदल से कोई संदेश जाता है तो वह यह है कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने रूढ़ियों को न तोड़ने का रास्ता चुना है. कार्यकाल के दो साल पूरे होने के बाद सरकार में बदलाव का यह समय संभवतः किसी भी रूप में सबसे अच्छा समय था. हालांकि यह एक बड़ा विस्तार सिद्ध हुआ लेकिन इससे प्रधानमंत्री मोदी का यथास्थितिवाद उजागर हो गया.

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कुल 19 नए चेहरों को मंत्रिमंडल में शामिल किया गया और छह को बाहर किया गया. एक को पदोन्नत कर दिया गया. मंत्रिमंडल में फेरबदल की पूरी कसरत पर आगामी विधानसभा चुनावों की चुनावी गणना हावी नजर आती है. इसी कारण दो चुनावी राज्यों उत्तर प्रदेश और गुजरात से तीन-तीन चेहरों को मंत्रिमंडल में जगह दी गई है. दलितों को आगे लाने की नीति स्पष्ट दिख रही है, क्योंकि इस समुदाय से पांच मंत्रियों को शामिल किया गया है.

सिर्फ एक मंत्री का कद बढ़ाया गया है और छह कम जाने-पहचाने मंत्रियों को हटा दिया गया है. ऐसे में मंत्रिमंडल फेरबदल में कामकाज का मूल्यांकन शायद पूरी तरह से नजरअंदाज कर दिया गया है. सरकार ने पिछले दो साल में बहुत से बेकार लोगों को मंत्री बना दिया था, इनसे छुटकारा पाने का यह सही अवसर था. लेकिन सरकार ने इस अवसर को गंवा दिया.

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मोदी सरकार में कई मंत्री ऐसे हैं जो या तो सिर्फ विवाद या हंगामा करने वाले हैं या फिर वे हैं जिनसे चूक होती रहती है. जैसे संजीव बालियान, निरंजन ज्योति, मनोहर पार्रिकर, वीके सिंह, महेश शर्मा और गिरिराज सिंह.

कई मंत्री ऐसे भी हैं जो नतीजे नहीं दे पाए और जिन्हें अपने-अपने क्षेत्रों में प्रगति की कमी के लिए जवाबदेह ठहराया जाना चाहिए. आर्थिक गतिविधियों में तेजी नहीं आई है, नौकरियां मिल नहीं पा रही हैं, विवाद विश्वविद्यालयों के प्रशासन को पटरी से उतार रहे हैं, रेलवे के दिन बदलना अभी बाकी है, जल संसाधन घट रहे हैं और गंगा अभी स्वच्छता से कोसों दूर है. अल्पसंख्यक उनकी उपेक्षा पर लगातार रो रहे हैं, किसानों की आत्महत्या बेरोकटोक जारी है और सूखे को प्रभावी ढंग से हल किया जाना दूर की कौड़ी है.

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फिर भी प्रधानमंत्री ने किसी बड़े साहसिक फेरबदल की हिम्मत नहीं की. उन्होंने सभी दिग्गजों की कुर्सी बरकरार रखी, कम कद वाले अधिकांश मंत्रियों को भी नहीं छेड़ा और उस तरह के लोगों को शामिल करना पसंद किया जिन्हें संसद में मसखरा या विदूषक माना जाता है.

मोदी सरकार में कई मंत्री ऐसे हैं जो या तो सिर्फ विवाद या हंगामा करने वाले हैं.

कई समस्याओं से घिरी उनकी सरकार इस समय किंकर्तव्य विमूढ़ सी स्थिति में है. इसे देखते हुए उनसे उम्मीद की जा रही थी कि वे कुछ साहसिक निर्णय लेंगे, लेकिन ऐसा न करके उन्होंने केवल अपने रूढ़िवादी पक्ष को उजागर किया है.

प्रधानमंत्री को लेकर कहा जाने वाला वह जुमला एक बार फिर से सही साबित होता दिख रहा है जिसके मुताबिक वे सामान्य लोगों से घिरे रहना पसंद करते हैं ताकि सबके बीच सिर्फ वही चमकदार चेहरा नजर आ सकें.

दो विशिष्ट निर्णयों की सराहना किए जाने की जरूरत है, भले ही वे बहुत देर से लिए गए हैं. जिन मंत्रियों को बाहर का दरवाजा दिखाया गया है, उनमें कम से कम दो लोग एेसे थे जो न केवल विवादास्पद थे, बल्कि उन संवैधानिक मूल्यों पर एक प्रहार के समान थे, जिन मूल्यों से सरकार चलाई जाती है. इनमें एक निहालचंद, जिन पर बलात्कार का आरोप लगा है और दूसरे हैं राम शंकर कठेरिया जो कई मुस्लिम विरोधी भाषणों के कारण कई बार सुर्खियों में रहे हैं.

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हालांकि यह अभी भी स्पष्ट नहीं है कि उन्हें किस लिए बाहर का रास्ता दिखाया गया है. वे सरकार के लिए शर्मिंदगी थे या फिर उन्हें हटाकर बाकियों के लिए रास्ता बनाने के मकसद से यह किया गया, कहा नहीं जा सकता. कारण जो भी हो इतने बड़े विस्तार में ये कुछ छोटे शुभ संकेत हैं.

First published: 6 July 2016, 14:46 IST
 
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