Home » इंडिया » In the memory of Bapu: Mahatma Gandhi's 147th birth anniversary
 

गांधी जयंती: पाकिस्तान का बदनाम शहर ऐबटाबाद जहां महात्मा ने लंबी तक़रीर की थी

कैच ब्यूरो | Updated on: 2 October 2016, 8:10 IST
QUICK PILL
पाकिस्तान का ऐबटाबाद शहर पिछले दिनों हिंसा और आंतकवाद की वजह से खूब खबरों में रहा है. यहीं से अमेरिका और पाकिस्तान के संबंध में खटास आना शुरू हुआ है. हिंसा और प्रतिहिंसा का, कटुता का गढ़ बन गया है ऐबटाबाद. मगर एक बात आज हमारे ध्यान से हट गई है कि पाकिस्तान का यह शहर एक समय बादशाह खां के खुदाई खिदमतगारों का भी गढ़ था. आज से 73 बरस पहले यहां गांधीजी आए थे. तब उन्होंने यहां कुछ खरी-खरी बातें भी की थीं और लोगों को फख्र-ए-अफगान यानी बादशाह खान के साथ सबसे मजबूत हथियार, अहिंसा का हथियार उठाकर चलने की सलाह दी थी. गांधीजी ने उस समय ऐबटाबाद जो कुछ कहा उसे हम सभी को याद रखना चाहिए. यह लेख गांधी मार्ग पत्रिका में प्रकाशित हो चुका है.

आपने मुझे जो मानपत्र भेंट किया, उसके लिए मैं आप सबका आभारी हूं. मानपत्र में आपने अपने यहां विश्व के महानतम व्यक्ति के पर्दापण पर अपनी प्रसन्नता प्रकट की है. आपका मानपत्र सुनते समय मेरे मन में यह सवाल घूमता रहा कि आखिर वे सज्जन हैं कौन. निस्संदेह, मैं तो नहीं हो सकता! मुझे अपने दोष भली-भांति मालूम हैं.

एथेंस के महान दार्शनिक सोलन के विषय में एक कथा प्रचलित है: विश्व के सबसे धनाढ्य व्यक्ति के रुप में विख्यात क्रीसस ने उनसे पूछा, संसार का सबसे सुखी व्यक्ति कौन है. क्रीसस ने सोच रखा था कि सोलन कहेंगे, आप ही वे सुखी व्यक्ति हैं. मगर सोलन ने कहा कि मैं कुछ नहीं कह सकता, क्योंकि किसी के अंतकाल से पहले ये कैसे कहा जा सकता है कि वह सुखी है.

अगर सोलन को किसी व्यक्ति के जीते-जी उसके सुखी होने या न होने के संबंध में निर्णय देना कठिन लगा तो जरा सोचिए कि किसी व्यक्ति की महानता के बारे में कोई फतवा देना कितना कठिन है. सच्ची महानता ऊंचाई पर स्थापित कोई ऐसी प्रतिमा नहीं है जिसे लोग आसानी से देख लें.

मेरे सत्तर वर्षों का अनुभव तो मुझे यह बताता है कि अक्सर वास्तव में महान लोग तो वे होते हैं जिनके बारे में और जिनकी महानता के संबंध में संसार उनके जीवन-काल में कुछ नहीं जानता. सच्ची महानता का पारखी तो केवल ईश्वर है, क्योंकि वह मनुष्य के हृदय को पहचानता है.

ऐबटाबाद के निवासी ही नहीं, यहां का सूर्य, चंद्र और यहां के तारे भी मेरी एक झलक पाने को लालायित थे. भाइयों, तो क्या मैं यह मानूं कि आपके नहर के लिए कोई खास सूर्य और चंद्रमा तथा तारे हैं, जो वर्धा या सेगांव में नहीं चमकते? हमारे यहां काठियावाड़ में भाट नाम की एक जाति है. इस जाति के लोग पेशेवर चारण हैं, जिनका धंधा पैसा पाने के लिए अपने-अपने सरदारों को प्रशस्ति करना है.

अगर मानपत्र दिया ही जाना हो तो मैं चाहूंगा कि उसमें सम्मानित व्यक्ति के दोषों और त्रुटियों का वर्णन किया जाए

खैर, मैं आपको भाट तो नहीं कहूंगा. अगर किसी का उपहास करना चाहें तब तो बात अलग है, लेकिन वैसे मैं चाहूंगा कि आप अपने नेताओं की अतिशयोक्ति प्रशंसा करने की गलती को जरा समझें. इससे न उन्हें कोई लाभ होता है और न उनके काम में ही कोई सहायता मिलती है. इसलिए इस तरह बढ़ा-चढ़ाकर यशोगान करने वाले मानपत्र भेंट करने की आदत आप हमेशा के लिए छोड़ दें, यहीं मैं चाहूंगा.

अब इस सत्तर साल की उम्र में कम-से-कम मैं तो नहीं चाहूंगा कि ईश्वर ने मुझे जो थोड़ा बहुत समय और दिया हो, उसे इस तरह के निरर्थक आडंबरो में बर्बाद कर दिया जाए. अगर मानपत्र दिया ही जाना हो तो मैं चाहूंगा कि उसमें सम्मानित व्यक्ति के दोषों और त्रुटियों का वर्णन किया जाए, ताकि वह अपने अंतर में झांककर देखने और उन दोषों और त्रुटियों को निकाल बाहर करने को प्रेरित हो सके.

जबसे इस प्रांत में आया हूं, तभी से खुदाई खिदमतगारों को अहिंसा का सिद्धांत-संपूर्ण और शुद्ध अहिंसा-सिद्धांत- समझाने की कोशिश करता रहा हूं. मैं अहिंसा के मर्म को पूर्ण रुप से समझने का दावा नहीं करता. जितना-कुछ मैं समझ पाया हूं वह तो उस संपूर्ण का, उस महान वस्तु का एक अंशमात्र है.

अहिंसा के संपूर्ण मर्म को समझना या उसका पूरा-पूरा आचरण करना मनुष्य के बस की बात नहीं है, क्योंकि वह तो स्वयं ही अपूर्ण है. यह तो केवल ईश्वर का ही गुण है, उस परम शास्ता का जिससे बड़ा सृष्टि में कोई नहीं है. लेकिन मैं आधी सदी से अधिक समय से इसे समझने और इसे अपने जीवन में उतारने का सतत प्रयास करता रहा हूं.

महान लोग वे होते हैं जिनके बारे में और जिनकी महानता के संबंध में संसार उनके जीवन-काल में कुछ नहीं जानता

इसमें संदेह नही कि खुदाई खिदमतगारों ने अहिंसा को जिस हद तक समझा है, उस हद तक उसका आचरण करने का ज्वलंत उदाहरण प्रस्तुत किया है. इसने उन्हें सबकी प्रशंसा का पात्र बनाया है. लेकिन अब उन्हें एक कदम और आगे जाना है. अपनी अहिंसा की अवधारणा को उन्हें अधिक व्यापक बनाना है और अगर उन्हें अंतिम अग्नि-परीक्षा में सफल होकर निकलना हैं तो अहिंसा के आचरण में- विशेषकर उसके विधायक पहलुओं के आचरण में- और अधिक पूर्णता और गहराई लानी है.

अहिंसा का मतलब केवल शस्त्र-त्याग नहीं है. यह कोई कमजोरों और नपुंसक लोगों का भी हथियार नहीं है. लाठी उठाने में असमर्थ कोई बच्चा तो अहिंसा का आचरण नहीं करता. सारे शस्तास्त्रों से अधिक सशक्त और सक्षम अहिंसा संसार में एक अद्भुत शक्ति के रूप में अवतरित हुई है. जिसने यह अनुभव करना नहीं सीखा है कि यह पशुबल की अपेक्षा लाख गुनी अधिक सक्षम शक्ति है, उसने इसके सच्चे स्वरूप को नहीं पहचाना है. इस अहिंसा की शक्ति को शब्दों में व्यक्त नहीं किया जा सकता. इसकी ज्योति तो हमारे हृदय में ही जल सकती है. और वह ज्योति जलेगी तब जब हमारी उत्कट प्रार्थना के परिणामस्वरूप हमें भगवत्कृपा प्राप्त होगी.

अहिंसा का मतलब केवल शस्त्र-त्याग नहीं है. यह कोई कमजोरों और नपुंसक लोगों का भी हथियार नहीं है

कहते हैं, आज एक लाख खुदाई खिदमतगार ऐसे हैं, जिन्होंने अहिंसा को अपने धर्म-रूप में स्वीकार किया है. लेकिन इनसे बहुत पहले, 1920 में ही खान साहब ने अहिंसा को सबसे कारगर हथियार के रूप में जान लिया था. अहिंसा के अठारह वर्षों के आचरण से इसमें उनकी श्रद्धा और भी सुदृढ़ ही हुई है. उन्होंने खुद देखा है कि इसने उनके लोगों को किस प्रकार निर्भीक और सबल बना दिया है. अपनी छोटी-मोटी नौकरियां खो बैठने की आशंका से ही पहले वे घबरा जाते थे. लेकिन आज वे कुछ और ही महसूस करते हैं.

सत्तर साल की इस अवस्था में अहिंसा में स्वयं मेरी श्रद्धा आज इतनी प्रबल है, जितनी पहले कभी नहीं थी. लोग मुझसे कहते हैं, "आपका अहिंसा का कार्यक्रम तो देश के सामने लगभग दो दशकों से पड़ा हुआ है. लेकिन आपने जो स्वराज्य दिलाने का वादा किया था, वह कहां है?" मेरा उत्तर यह है कि कहने को तो अहिंसा को करोड़ों लोगों ने अपना लिया, लेकिन उसका आचरण बहुत कम लोगों ने किया और जिन्होंने किया उन्होंने भी उसे एक नीति मानकर ही किया. लेकिन इस सबके बावजूद जो परिणाम सामने आया है, वह मुझे खुदाई खिदमतगारों के बीच अपना प्रयोग जारी रखने के लिए प्रोत्साहित करने की दृष्टि से काफी अच्छा है.

अहिंसा का मतलब केवल शस्त्र-त्याग नहीं है. यह कोई कमजोरों और नपुंसक लोगों का भी हथियार नहीं है

जब मैं यहां आया तब मैंने सोचा भी नहीं था कि इस बार भी, जब यह तीसरी बार मैं आपके प्रांत में आया हूं, आप मुझे मानपत्र इनायत करेंगे. मैंने तो समझा था कि मैंने आपके प्रांत के साथ अपना इतना अधिक तादातम्य स्थापित कर लिया है कि आप मुझे अपने में ही गिनेंगे और मुझे मानपत्र भेंट करने या अन्य शिष्टाचार की कोई जरूरत नहीं मानेंगे.

तो क्या मुझे यह समझना चाहिए कि अब भी मुझे आपसे प्रमाणपत्र प्राप्त करना बाकी है? पिछली बार तो आपने मुझे मानपत्र और थैली दोनों दिए थे, लेकिन इस बार सिर्फ मानपत्र ही दिया है- थैली नहीं. क्या मैं जान सकता हूं कि अपने किस गुनाह के कारण मैं इस तरह आपकी 'नजरों से गिर गया हूं?'

अनेक बार मैंने यह शिकायत सुनी है कि हिंदू-मुस्लिम एकता में इसलिए देर हो रही है कि मैं उसके लिए काफी प्रयत्न नहीं कर रहा हूं, और अगर मैं मात्र इसी पर अपनी शक्ति केंद्रित कर दूं तो आज ही यह एकता स्थापित हो सकती है. क्या मैं आपको विश्वास दिलाऊं कि अगर आज मैं ऐसा करता हुआ मालूम नहीं पड़ रहा हूं तो इसका कारण यह नहीं है कि हिंदू-मुस्लिम एकता में मेरा उत्साह कम हो गया है. बात यह है कि इस महान काम के लिए अपनी अपूर्णता और ऐसे बड़े उद्देश्यों की पूर्ति के लिए केवल बाहरी साधनों की अपर्याप्तता जितनी मुझे अब महसूस हुई है, उतनी पहले कभी नहीं हुई थी. मैं पूर्णतः प्रभु की कृपा पर निर्भर रहने का पाठ अधिकाधिक सीखता जा रहा हूं.

हिंदू-मुस्लिम एकता

अगर आप मेरे दिल को चीरकर देख सकें, तो आप पाएंगे कि उसमें सोते-जागते चौबीसों घंटे, लगातार हिंदू-मुस्लिम एकता के लिए प्रार्थना और आध्यात्मिक साधना चलती रहती है. मैं हिंदू-मुस्लिम एकता अवश्य चाहता हूं- और किसी कारण से नहीं तो इस कारण से कि मैं जानता हूं उसके बिना स्वराज्य हासिल नहीं हो सकता. किसी को इस भ्रम में नहीं रहना चाहिए कि हिंदुओं का बहुमत होने के कारण वे दूसरी जातियों के समर्थन या सहायता के बगैर सविनय अवज्ञा संगठित करके हिंदुस्तान के लिए या खुद अपने लिए ही स्वराज्य हासिल कर लेंगे.

जैसाकि मैंने अक्सर कहा है, सविनय अवज्ञा अगर बिल्कुल शुद्ध रूप में हो तो कुछ आदमियों तक सीमित होने पर भी वह प्रभावकारी हो सकती है. लेकिन जरूरत यह है कि वे चंद व्यक्ति ऐसे हों जिनके पीछे सारे राष्ट्र की स्वीकृति, इच्छा और शक्ति हो.

सशस्त्र युद्ध में भी क्या यही बात नहीं होती? लड़ने वाली फौजों के पीछे सारे गैर-फौजी लोगों की मदद और सहयोग होना जरूरी होता है. ऐसा न होने पर वे अपंग हो जाते हैं. जब स्वराज्य के लिए मैं अधीर हूं तब हिंदू-मुस्लिम एकता के लिए तो मेरा अधीर होना जरूरी ही है. और मुझे पूरा विश्वास है कि देर में या जल्दी, बल्कि शायद जल्दी ही, हिंदुओं और मुसलमानों के बीच ऐसी एकता स्थापित हो जाएगी जो जोड़-तोड़कर किया हुआ कोई राजनीतिक समझौता न होकर सच्ची और स्थायी दिली एकता होगी.

यह एक ऐसा सपना है जो बिल्कुल बचपन से ही मेरे जीवन में ओत-प्रोत रहा है. अपने पिता के वक्त की मुझे अच्छी तरह याद है. मुझे स्मरण है कि तब राजकोट के हिंदू-मुसलमान किस प्रकार आपस में मिलते-जुलते थे और किस तरह एक-दूसरे के पारिवारिक और धार्मिक समारोहों में सगे भाइयों की तरह शामिल होते थे. मेरा विश्वास है कि देश में वे सुनहरे दिन एक बार फिर आएंगे. दोनों जातियों के बीच इस समय जो तू-तू मैं-मैं और जरा-जरा सी बात पर झगड़े-फसाद होते रहते हैं, वे मतिभ्रम के कारण हो रहे हैं. वे हमेशा कायम नहीं रह सकते.    

अगर आप मेरे दिल को चीरकर देख सकें, तो आप पाएंगे कि उसमें चौबीसों घंटे हिंदू-मुस्लिम एकता की साधना चलती है

इस दुनिया में बड़े से बड़े काम केवल मनुष्य के प्रयत्न से नहीं होते. वे तो समय आने पर ही होते हैं. अपने साधनों के चुनाव करने का ईश्वर का यह अपना तरीका है. हो सकता है, लगातार हार्दिक प्रार्थना के बावजूद मैं इस महान कार्य के लिए उपयुक्त न पाया जाऊं. हम सबको हर क्षण कटिबद्ध रहना चाहिए, क्योंकि कब और किसको वह अपने काम के लिए चुन ले, यह हम नहीं जानते. मेरे ऊपर सारी जिम्मेदारी डालकर आपको अपनी जिम्मेदारी से नहीं बचना चाहिए.

मेरे लिए आप यह दुआ मांगें कि मेरे जीवनकाल में ही मेरा सपना सच हो जाए. हमें कभी निराश या हताश नहीं होना चाहिए. मनुष्य की हिकमत के मुकाबले ईश्वर की लीला तो अपरंपार है. 

इसका हल तो आपके अपने ही हाथों में है

मुझे यह जानकर बहुत दुख हुआ है कि इस प्रांत के कांग्रेसजनों में भी अंदरूनी झगड़े पैदा होने लगे हैं. कल एक घंटे से अधिक समय तक आपकी प्रांतीय कांग्रेस कमेटी के सदस्यों से एकांत में मेरी बातचीत हुई है. उन्होंने मुझसे कहा कि मैं उन्हें इससे निकलने का कोई रास्ता बतलाऊं. मैं कहता हूं कि इसका हल तो आपके अपने ही हाथों में है. खान साहब अब्दुल गफ्फार खां को आपने अपना बेताज बादशाह माना है. आपने उन्हें 'बादशाह खान' और 'फख्र-ए-अफगान' की गौरवपूर्ण उपाधियां बख्शी हैं.

अतः आपके लिए, पहले की तरह ही, उनका शब्द ही कानून होना चाहिए. दलीलों में उनका विश्वास नहीं है. वे तो जो कुछ कहते हैं अपने दिल से कहते हैं. आपने उन्हें जो उपाधियां दी हैं, अगर वे दिखावटी नहीं हैं और उनको आप सही साबित करना चाहते हैं, तो आपको अपने आपसी मतभेदों को भुलाकर उनके नेतृत्व में एक संगठित दल की तरह काम करना सीखना चाहिए.

फिर, सीमा-प्रांत की जनता में फैली हुई गरीबी का भी सवाल है. मुझे बताया गया है कि उनमें से बहुतों को भर-पेट खाना भी मुश्किल से ही मिलता है. पठान जैसी हट्टी-कट्टी कौम को ऐसी दुर्दशा में रहना पड़े, यह उसके लिए बड़े अपमान की बात है. लेकिन इसका इलाज भी बहुत हद तक आपके ही हाथों में है. आप लोगों को अपने हाथों से काम करना और श्रम की गरिमा समझना सिखाएं. इसमें शक नहीं कि मंत्रिमंडल सुविधाएं उपलब्ध करवा सकता है और कराएगा. लेकिन तफसीलों का ध्यान रखते हुए आरंभिक प्रयत्न तो स्वयंसेवकों को ही करना पड़ेगा.

ईश्वर आपको सही मार्ग दिखलाए. मैं यह जानता हूं कि जब हम आपस में झगड़ते भी हैं तो स्वाधीनता के आगमन की गति में तेजी लाने के लिए इस आशा से ही झगड़ते हैं कि उसके आने पर हमारे सारे दुख मिट जाएंगे.

ईश्वर करे, आजादी की हमारी लगन- हमें अलग करने वाले तमाम मतभेदों की तुलना में- हमारे बीच एकता स्थापित करने वाला ज्यादा मजबूत सूत्र साबित हो.                  

First published: 2 October 2016, 8:10 IST
 
पिछली कहानी
अगली कहानी