Home » इंडिया » Catch Hindi: in three legal cases in indian courts three fundamental rights are at stake
 

भारतीय अदालतों में विचाराधीन 'बेटियों के मौलिक अधिकार'

सौरव दत्ता | Updated on: 10 February 2016, 22:33 IST
QUICK PILL
  • भारतीय अदालतों में इस समय तीन ऐसे मामले विचाराधीन हैं जिनका भारतीय संविधान में दिए गए मौलिक अधिकारों से सीधा संबंध है.
  • इनमें दो मामले हिंदू और मुस्लिम धार्मिक पूजास्थलों में महिलाओं के प्रवेश के मौलिक अधिकार से जुड़े हैं. तीसरा, मामला अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता से जुड़ा है.

भारत की तीन अलग-अलग अदालतों में तीन भिन्न-भिन्न मामले चल रहे हैं. हर मामले में सरकार और न्यायपालिका की सीमा और नागरिक मौलिक अधिकारों से जुड़े सवाल उठाए गए हैं.

इनमें से दो मामले महिलाओं के मंदिरों और उसके जैसे अन्य संस्थानों में महिलाओं के प्रवेश को लेकर हैं. तीसरा मामला अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता का है.

डॉक्टर नूरजहां साफिया नियाज़ भारतीय मुस्लिम महिला आंदोलन की संस्थापक हैं. उन्होंने बॉम्बे हाई कोर्ट में एक याचिका दायर की है. नियाज़ ने अपनी याचिका में मुंबई स्थिति हाजी अली की दरगाह के अंदरूनी हिस्से में महिलाओं के प्रवेश पर पाबंदी को अदालत में चुनौती दी है.

ऐसी ही एक याचिका सुप्रीम कोर्ट में कुछ हिंदू मंदिरों में महिलाओं के प्रवेश पर प्रतिबंध के मामले में विचाराधीन है. इस याचिका में केरल के सबरीमाला मंदिर में 10 से 50 वर्ष की महिलाओं के प्रवेश पर पाबंदी को चुनौती दी गई है. मंदिर की सदियों पुरानी परंपरा के बचाव में तर्क दिया जाता है कि इन महिलाओं के भगवान अयप्पा को 'छूने' से वो 'अपवित्र' हो जाएंगे.

डॉक्टर नूरजहां ने हाजी अली दरगाह के अंदरूनी हिस्से में महिलाओं के प्रवेश पर पाबंदी को अदालत में चुनौती दी है

तीसरा मामला भारत की केंद्र सरकार द्वारा ब्रितानी फिल्ममेकर लेजली उडविन की डाक्यूमेंट्री पर लगाए गए प्रतिबंध का है. उडविन ने दिल्ली में दिसंबर 2012 में हुए सामूहिक बलात्कार मामले पर 'इंडियाज़ डॉटर' नाम से डाक्यूमेंट्री बनाई. भारत सरकार ने उडविन पर भारत की छवि धूमिल करने और जेल नियमों का उल्लंघन का आरोप लगाते हुए उनकी फिल्म पर प्रतिबंध लगा दिया.

मौलिक अधिकारों को लेकर सरकार में असमंजस


महाराष्ट्र और केरल सरकार ने क्रमशः हाजी अली और सबरीमाला मंदिर मामले पर परस्पर विरोधाभासी रवैया अपनाया.

नौ फरवरी को महाराष्ट्र के एडवोकेट जनरल ने अदालत में मौखिक रूप से कहा कि भारत का संविधान समानता के अधिकार की गारंटी देता है इसलिए सरकार हाजी अली में मुस्लिम महिलाओं के प्रवेश के पक्ष में है.

हालांकि उन्होंने ये भी कहा कि अगर ये मामला इस्लाम के मूल पद्धति से जुड़ा है तो सरकार इसपर कुछ नहीं कह सकती क्योंकि आर्टिकल 25 और आर्टिकल 26 के अनुसार सरकार अल्पसंख्यकों के धार्मिक मौलिक अधिकारों में हस्तक्षेप नहीं करेगी.

पढ़ेंः शोध: 2000 सालों से धर्म समाज के बीच में टकराव की प्रमुख वजह है?

केरल सरकार ने सुप्रीम कोर्ट में दायर एक हलफनामे में केरल हिंदू प्लेसेज ऑफ पब्लिक वर्शिप (अथॉराइजेशन ऑफ एंट्री) रूल्स 1965 के नियम 3(b) का हवाला दिया है. इस नियम के तहत परंपरा के नाम पर मंदिर में महिलाओं के प्रवेश पर रोक है. केरल हाई कोर्ट ने 1991 में इस प्रतिबंध के पक्ष में फैसला देते हुए देवास्वोम बोर्ड को इसे लागू करने के लिए कहा था.

महाराष्ट्र सरकार की तरह केरल सरकार ने भी इसे 'धर्म की मूल पद्धति' से जोड़ा है और दावा किया है कि संविधान इसमें हस्तक्षेप करने की इजाजत नहीं देता.

मौलिक अधिकार बनाम न्यायिक रोक


धार्मिक स्थानों में महिलाओं के प्रवेश के दो मामलों में दो मौलिक अधिकारों के बीच गतिरोध है. एक, धार्मिक स्वतंत्रता का अधिकार और दूसरा है महिलाओं की धार्मिक आजादी और किसी भी पूजास्थल में प्रवेश का मौलिक अधिकार.

ज्यादातर धार्मिक नेता महिलाओं के प्रवेश पर ये कहकर रोक लगाने की बात करते हैं कि वो 'स्वच्छ' नहीं होती या उनकी मौजूदगी से देवता 'अपवित्र' हो जाएंगे.

भारत में जब भी अल्पसंख्यकों की धार्मिक स्वतंत्रता की बात आती है तो मामला राजनीतिक हो जाता है. इसलिए अदालत के लिए 'मूल धार्मिक पद्धति' पर निर्णय लेना काफी कठिन होता है. 1954 में सुप्रीम कोर्ट ने अपने एक फैसले में कहा था कि न्यायपालिका को ये तय करने का अधिकार है कि किसी धर्म से जुड़ा कौन सा नियम या परंपरा उस धर्म की
'मूल धार्मिक पद्धित' से जुड़ा है.

अदालत के इस रुख की कानून के कई जानकार आलोचना करते रहे हैं. आलोचकों का कहना है कि अदालत को धार्मिक गुरुओं या मौलानाओं की पीठ सहलाने से बचना चाहिए.

केरल के सबरीमाला मंदिर में 10 से 50 वर्ष की महिलाओं के प्रवेश पर पाबंदी को सुप्रीम कोर्ट में चुनौती दी गई है

अगर हाजी अली और सबरीमाला मामले में अदालत महिलाओं के प्रवेश पर प्रतिबंध को जारी रहने देती है तो उसके सामाजिक सुधार के दायित्व का क्या होगा? जब धार्मिक नेता जेंडर के आधार पर भेदभाव कर रहे हों तो अदालत की भूमिका और ज्यादा महत्वपूर्ण हो जाती है.

हाजी अली और सबरीमाला मामले में अभी तक अदालतों ने सरकारी पक्ष की दलीलों की कड़ी समीक्षा करते हुए प्रगतिशील रुख अपनाया हुआ है. लेकिन उडविन के मामले में अदालत हस्तक्षेप करने के प्रति अनिच्छुक लग रही है. वहीं सरकार इस मामले में अपना पक्ष रखने के लिए समय की जरूरत पर इसे खींच रही है.

पढ़ेंः समलैंगिकता के मामले की सुनवाई के लिए सुप्रीम कोर्ट ने बनाई संवैधानिक पीठ

उडविन की डाक्यूमेंट्री पर पिछले साल प्रतिबंध लगा था. सीनियर एडवोकेट और भारत की पूर्व एडिशनल सॉलिसिटर जनरल इंदिरा जयसिंह ने सरकार के इस फैसले के खिलाफ कड़ी आपत्ति दर्ज करायी थी.

इस मामले के केंद्र में 'अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता' का मौलिक अधिकार है. इसके महत्व को समझते हुए अदालत को इसमें तेजी दिखाना चाहिए था. लेकिन दिल्ली हाई कोर्ट ने अभी तक इसपर अंतिम फैसला नहीं दिया है. मंगलवार को इस मामले पर हुई सुनवाई महज 15 मिनट चली. सरकार ने जवाब देने के लिए समय मांगा जिसे अदालत ने स्वीकार कर लिया.

इन तीनों मामलों का जो भी नतीजा हो उनका राजनीतिक असर जरूर होगा. साथ ही भारत के संवैधानिक और न्यायिक प्रक्रिया पर इनका मूलभूत प्रभाव पड़ना तय है.

First published: 10 February 2016, 22:33 IST
 
सौरव दत्ता @SauravDatta29

Saurav Datta works in the fields of media law and criminal justice reform in Mumbai and Delhi.

पिछली कहानी
अगली कहानी