Home » इंडिया » in up election bjp not to serious, just taken for granted
 

उत्तर प्रदेश भाजपाः अजगर जैसी सुस्ती, हिमालय जैसा संकट

पाणिनि आनंद | Updated on: 31 March 2016, 9:17 IST
QUICK PILL
  • भाजपा में राज्यस्तर पर नेतृत्व और आम राय का सर्वथा अभाव है. पार्टी के सांसद न तो पार्टी से खुश हैं और न ही केंद्र सरकार से
  • यूपी में जो भाजपा कार्यकर्ता मोदी की तारीफ करते नहीं थकता था, आज सरकार के प्रदर्शन से \r\nअपना मुंह बंद करके मौन की मुद्रा में नजर आता है.
  • राज्य में भाजपा के पास \r\nढेर सारे कद्दावर नेता हैं लेकिन इसके बावजूद प्रदेश भाजपा सशक्त नेतृत्व का रोना रोती रहती है

आजकल उत्तर प्रदेश में भाजपा के लिए एक चुटकुला काफी लोकप्रिय हो रहा है. लोग कह रहे हैं कि भाजपा के पास राज्य से जितनी संख्या (73) लोकसभा में चुनकर आई है, विधानसभा चुनाव में पार्टी शायद उतने विधायक भी न जीत पाए.

प्रदेश भाजपा की ताज़ा स्थिति का अंदाज़ा इसी से लगाया जा सकता है. राज्य विधानसभा का कार्यकाल अगले वर्ष की शुरुआत में पूरा हो रहा है और सूबा नई विधानसभा के लिए मतदान करेगा. राज्य की 403 सीटों वाली विधानसभा में भाजपा के मात्र 47 विधायक हैं.

संकट यह है कि यह चुटकुला केवल विपक्षी दल नहीं सुना रहे, भाजपा के अपने लोग भी इस स्थिति से इनकार नहीं कर रहे और उनका मानना है कि पार्टी नेतृत्व की सूबे के प्रति उदासीनता और निर्णय लेने में देरी इस संकट को और गहरा करती जा रही है.

भाजपा के सामने आज की तारीख का सबसे बड़ा प्रश्न और चुनौती उत्तर प्रदेश है

भाजपा के सामने आज की तारीख का सबसे बड़ा प्रश्न और चुनौती उत्तर प्रदेश है. वहां पार्टी के संगठन से लेकर आगामी विधानसभा चुनाव तक की चुनौती सुरसा की तरह मुंह बाए खड़ी है. संकट यह है कि इस स्थिति से निपटने की कोशिश करने के बजाय भाजपा अजगर की तरह मुंह खोलकर बैठी है कि शायद चुनौतियों का समाधान खुद उनके मुंह का ग्रास बनकर उस तक आ जाए.

यह चुनौती तब और गंभीर होती नज़र आती है जब ध्यान आता है कि समय मुट्ठी की रेत की तरह निकलता जा रहा है और संकटों के निस्तारण में पार्टी देर पर देर करती जा रही है.

पढ़ें: यूपी बीजेपीः सिंह चाहते सिंह, शाह चाहें सिन्हा

उत्तर प्रदेश में जब 2014 के आम चुनावों के लिए वर्तमान राष्ट्रीय अध्यक्ष अमित शाह को ज़िम्मेदारी सौंपी गई थी तो यह माना जा रहा था कि चुनाव प्रबंधन के महारथी, शाह मोदी के लिए जीत का आकड़ा जुटाने का काम तो करेंगे ही, साथ ही प्रदेश में दयनीय स्थिति में पहुंचती भारतीय जनता पार्टी में भी जान फूंकने का काम करेंगे.

अमित शाह की कोशिश रंग लाई. भाजपा को आम चुनाव में 80 संसदीय सीटों में से 73 पर जीत हासिल हुई. मोदी देश के प्रधानमंत्री बने. अमित शाह की पदोन्नति हुई. वो पार्टी के अध्यक्ष बना दिए गए. लेकिन सूबे में भाजपा की स्थिति में फिर भी कोई बदलाव नहीं आया है.

इधर कुछ महीनों से पार्टी के संकट कम होने के बजाय और जटिल होते जा रहे हैं. संगठन बिखरा हुआ है. प्रदेश अध्यक्ष के नाम को लेकर अभी तक गतिरोध बना हुआ है. राज्यस्तर पर नेतृत्व और आम राय का सर्वथा अभाव है. पार्टी के सांसद न तो पार्टी से खुश हैं और न केंद्र सरकार से.

पढ़ें: यूपी भाजपा अध्यक्ष: 'कमजोर' मनोज सिन्हा 'मजबूत' दावेदार

कार्यकर्ता जो मोदी की तारीफ करता नहीं थकता था, सरकार के प्रदर्शन के बाद अपना मुंह बंद करके मौन मुद्रा में आता जा रहा है. राज्य में भाजपा के पास ढेर सारे नेता हैं लेकिन सबके बाद उपेक्षाओं को रोना है.

जहाँ एक ओर राज्य में अन्य राजनीतिक दल अपने गठबंधनों की ज़मीन तैयार कर रहे हैं, विधानसभा चुनावों के लिए अपने उम्मीदवारों की सूची को अंतिम रूप देने में लगे हैं और तय किए गए प्रत्याशियों को क्षेत्र में काम करने के लिए निर्देश दे चुके हैं, भारतीय जनता पार्टी अपने संगठन और चुनाव की तैयारियों के प्रति निस्चेष्ट नज़र आ रही है.

बहुजन समाज पार्टी के एक वरिष्ठ नेता ने कैच को बताया, “हम 75 प्रतिशत सीटों पर टिकट तय कर चुके हैं. प्रत्याशी अपने अपने क्षेत्रों में काम कर रहे हैं. उसके समानान्तर संगठन की ओर से भी विधानसभाओं में काम किया जा रहा है. मुद्दे, प्रत्याशियों के प्रयास और चुनाव संबंधित अन्य पहलुओं पर हमारी नज़र है.”

वहीं लखनऊ से भाजपा के एक वरिष्ठ नेता ने बताया, “समय तेज़ी से निकलता जा रहा है और सूबे में पार्टी की स्थिति को ध्यान में रखते हुए अबतक कई अहम निर्णय ले लिए जाने चाहिए थे ताकि उनको अमलीजामा पहनाने का काम ज़मीनी तौर पर किया जा सके”.

पढ़ें: यूपी बीजेपीः सूत न कपास, जुलाहों में लट्ठमलट्ठ...

वो कहते हैं, “बसंतपंचमी, होली, नवरात्र जैसे त्योहारों के समय में जब बाकी पार्टियों के नेता और उम्मीदवार लोगों के बीच काम कर रहे हैं, हम अपने पार्टी प्रमुख का इंतज़ार कर रहे हैं. अभी तक कोई स्पष्ट रूपरेखा न तो नज़र आ रही है और न ही ऐसा कोई प्रयास होता दिख रहा है”.

प्रदेश में फिलहाल समाजवादी पार्टी की सरकार है. माना जा रहा है कि राज्य सरकार की लोकप्रियता कम हुई है. लेकिन सपा ने चुनाव के लिए कमर कसना शुरू कर दिया है. प्रत्याशियों को लेकर संगठन काम शुरू कर चुका है.

अभी यूपी में सपा की सरकार है. माना जा रहा है कि सपा सरकार की लोकप्रियता कम हुई है

यही स्थिति कांग्रेस पार्टी की भी है जो अपने चुनाव प्रबंधकों को तय करने से लेकर राजनीतिक मुद्दों पर काम करना शुरू कर चुकी है. पार्टी उपाध्यक्ष राहुल गांधी ने इस दौरान कुछ कार्यक्रमों में हिस्सा भी लिया है और पार्टी कार्यकर्ताओं को लड़ाई तेज़ करने के संकेत भी दिए हैं.

लेकिन भाजपा फिलहाल बगुले वाली मुद्रा में है. वो किसी सही अवसर की तलाश कर रही है. लेकिन अवसर आने तक काफी समय हाथ से निकलता जा रहा है. प्रदेश से भाजपा के एक नेता बताते हैं, “जनवरी से अप्रैल तक का समय लोगों से मिलने और समारोहों, पर्वों के ज़रिए जनसंपर्क का था. यह चुनावी वर्ष से पहले की होली थी. इसके बाद लोग फसल की कटाई में व्यस्त हो जाएंगे. फिर भीषण गर्मी भी प्रचार क्षमता को प्रभावित करेगी. सावन के इंतज़ार में बैठे रहना ग़लत क़दम है".

पढ़ें: यूपी चुनाव में प्रशांत किशोर हमारे लिए कोई मुद्दा नहीं: भाजपा

वो कहते हैं, "अगर लोकसभा जैसा प्रदर्शन दोहराना है तो अब हमारे पास समय कम है और काम बहुत ज़्यादा करना है. संगठन की आंतरिक व्यवस्था और गतिरोधों से लेकर चुनाव के लिए लोगों के बीच व्यापक प्रचार और जनसंपर्क तक हमें बहुत कुछ करना है. अब अगर इसमें देरी होती है तो नुकसान किसका होगा”.

भाजपा को पिछले लोकसभा चुनाव में मोदी लहर के साथ-साथ सांप्रदायिक ध्रुवीकरण का लाभ भी मिला था. खासकर पश्चिमी उत्तर प्रदेश में इसका खासा असर देखने को मिला था. लेकिन केवल इसी के सहारे बैठना बुद्धिमत्ता नहीं होगा. प्रदेश में हाल के उपचुनावों में यह साफ हो गया है कि इसका असर उतना व्यापक भी नहीं है. बिहार में इस तरह के प्रयास पहले ही धराशायी हो चुके हैं. भाजपा के लिए ज़रूरी भी है कि वो पश्चिमी उत्तर प्रदेश के दायरे तक ही खुद को सीमित करके न रखे. न ही हिंदू अस्मिता के प्रश्न मात्र पर सारा जनादेश मतदान करने वाला है.

पढ़ें: अखिलेश यादव: कानून व्यवस्था भी यहां वोट पाने का जरिया भर है

ऐसे में केवल बांटने की राजनीति के सहारे जीत का चमत्कारी आंकड़ा हासिल नहीं किया जा सकता है. और न ही यह संगठन को सूबे में मज़बूत करने का काम करेगा. भाजपा के सूबे में लगातार गिरते ग्राफ के पीछे पार्टी की अंतर्कलह और गुटबाज़ी की भी भूमिका है. इसलिए टिकटों में बंदरबांट से लेकर असंतुष्टों से बात करने तक भाजपा के सामने कई बड़ी चुनौतियां हैं.

विडंबना यह है कि डूबती डगमगाती नाव के खेवनहार अमित शाह फिलहाल अन्य राज्यों में चुनाव के लिए व्यस्त हैं. यह ठीक है कि अमित शाह ने राज्य में अपने कार्यकाल के दौरान काफी सक्रियता से काम किया लेकिन उस सक्रियता का लाभ फिलहाल पार्टी को मिलता नज़र नहीं आ रहा है. दूसरी बात यह है कि उनकी टीम यूपी में नए चेहरे अधिक हैं जो बाकी कुछ भी हों, कम से कम प्रभावी और लोकप्रिय ज़मीनी नेता तो नहीं ही हैं.

उत्तर प्रदेश का चुनाव 2019 के लोकसभा चुनावों की दृष्टि से बहुत अहम है. राज्य में संगठन के विस्तार और पार्टी के इन संकटों को ध्यान में रखते हुए राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ ने अपने शीर्ष नेताओं में से एक, दत्तात्रेय होसबोले को राज्य में जाने के लिए कहा है लेकिन संघ से उलट भाजपा अभी भी अपनी आंखों पर हरा चश्मा लगाकर सूखे को सावन देखती नज़र आ रही है.

First published: 31 March 2016, 9:17 IST
 
पाणिनि आनंद @paninianand

Senior Assistant Editor at Catch, Panini is a poet, singer, cook, painter, commentator, traveller and photographer who has worked as reporter, producer and editor for organizations including BBC, Outlook and Rajya Sabha TV. An IIMC-New Delhi alumni who comes from Rae Bareli of UP, Panini is fond of the Ghats of Varanasi, Hindustani classical music, Awadhi biryani, Bob Marley and Pink Floyd, political talks and heritage walks. He has closely observed the mainstream national political parties, the Hindi belt politics along with many mass movements and campaigns in last two decades. He has experimented with many mass mediums: theatre, street plays and slum-based tabloids, wallpapers to online, TV, radio, photography and print.

पिछली कहानी
अगली कहानी