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दयाशंकर सिंह बनाम मायावती: जुबान बेलगाम नहीं सोची-समझी राजनीति

सुहास मुंशी | Updated on: 12 September 2016, 7:34 IST
(एजेंसी)
QUICK PILL
  • मायावती को ‘वेश्या से भी बदतर’कहने वाले बीजेपी से बर्खास्त किए गए दयाशंकर सिंह ने दूसरी बार उनकी तुलना कुत्ते से कर दी. पिछली बार तो उन्होंने कहा कि गलती हो गई, लेकिन लगता है कि इस बार उन्होंने यह एक रणनीति के तहत कहा.
  • बीजेपी जहां एक ओर सिंह से पल्ला झाड़ रही है, वहीं दूसरी ओर दयाशंकर सिंह और स्वाति सिंह के रैलियों में भाजपा के कई नेताओं की उपस्थिति भी रैलियों में दिखाई देते रहे हैं.

भाजपा की उत्तर प्रदेश इकाई से निष्कासित पूर्व उपाध्यक्ष दयाशंकर सिंह पिछले कुछ महीने में बसपा सुप्रीमो मायावती की तुलना वेश्या और कुतिया से कर चुके हैं. उन्होंने कई बार मायावती को लालची, धूर्त और कायर बताया है.

चुनावों का सामना करने जा रहे उत्तरप्रदेश में, सिंह अभी हाल तक भाजपा के ठाकुर चेहरा थे और सार्वजनिक भाषणबाजी व राजनीति में उनका अनुभव भी कम नहीं है. फिर भी मायावती पर लगातार व्यक्तिगत हमलों से न तो सिंह को कोई लाभ हुआ न उनके पूर्व दल भाजपा को ही इससे कोई फायदा होता दिखा.

मायावती के खिलाफ अपनी टिप्पणियों के लिए इस साल जून में उन्हें तकलीफें भी झेलनी पड़ीं. उन्हें पार्टी से निकाल दिया गया और कुछ समय के लिए जेल भी जाना पड़ा.उन्होंने पार्टी को गम्भीर संकट में डाल दिया. संसद व राज्य में बार-बार क्षमा मांगने के अलावा पार्टी के सामने कोई ज्यादा विकल्प ही नहीं बचे.

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उत्तरप्रदेश में राजनीतिक प्रचार अभियान शुरू होने से काफी पहले ही सिंह का राजनीतिक शोक संदेश लिख दिया गया और लगता है कि मतदाताओं के कई वर्गों को उन्होंने दूर कर दिया है. ऐसा उस समय हुआ जब दलित उत्पीड़न के खिलाफ सामाजिक आंदोलनों और व्यापक प्रदर्शनों के कारण भाजपा पहले ही पिछले पांव पर थी.

21 जून को मऊ जिले में एक बैठक में सिंह ने मायावती को ‘वेश्या से भी बदतर’ कहा और आरोप लगाया कि वे पार्टी के टिकटों की नीलामी कर रही हैं. फिर इस रविवार को मैनपुरी, उत्तरप्रदेश में एक सभा में निष्कासित भाजपा नेता ने मायावती की तुलना कुत्ते से की.

उन्होंने कहा कि वह एक लालची औरत है और उस कुत्ते की तरह है जो किसी जाती हुई बाइक के पीछे भागता है और बाइक के रुकते ही पीछे हट जाता है.

उन्होंने यह भी दावा किया कि मायावती और उनके भाई आनन्द कुमार व राजनीतिक सलाहकार सतीश मिश्रा समेत रिश्तेदारों ने संदिग्ध सौदों में करोड़ों रुपए कमाए हैं. सिंह ने मायावती को ‘धूर्त’ और ‘कायर’ भी कहा.

अपनी टिप्पणियों के बारे में पूछे जाने पर सिंह ने कहा कि उन्हें गलत ढंग से उद्धृत किया गया. वीडियो फूटेज के रूप में साक्ष्य के बावजूद उन्होंने कहा कि यह तो मायावती थीं जिन्होंने भाजपा कार्यकर्ताओं की तुलना कुत्तों से की थी.

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राज्य में भाजपा के प्रवक्ता का इस बारे में जवाब था कि सिंह को पार्टी से निकाला जा चुका है और अब उनकी किसी टिप्पणी के लिए वे जिम्मेदार नहीं हैं.

इस बात पर विश्वास करना काफी मुश्किल है कि मायावती के खिलाफ सिंह की बयानबाजी कोई जबान फिसलने का मामला है. क्या इसे ठाकुर वोटों को पक्का करने की सोची-समझी योजना माना जा सकता है.

क्या ऐसा है कि सिंह के कहे का दोष अपने सर लिए बिना भाजपा प्रभावी ठाकुर वोटों को अपनी ओर खींचने का प्रयास कर रही है?

यहां एक बात ध्यान देने वाली है कि भाजपा से निष्कासित कर दिए जाने के बावजूद सिंह लगातार ठाकुर वोटरों से अपील करते आ रहे हैं. उनकी पत्नी ऐसी सभाओं का आमचेहरा बनी हुई हैं.

पति-पत्नी की यह जोड़ी 21 जून की सिंह की टिप्पणियों के बाद बसपा के जवाबी प्रदर्शनों से ठाकुर अस्मिता को चोट पहुंचने और क्षत्रियों के अपमान की बातें कहती फिर रही है.

भाजपा के कई स्थानीय नेता सिंह की रैलियों में दिखाई देते रहे हैं. ये रैलियां पश्चिमी उत्तरप्रदेश के मैनपुरी से लेकर पूर्वी उत्तर प्रदेश के बलिया जैसे क्षेत्रों में आयोजित की गईं हैं.

इन रैलियों का आयोजन भाजपा से निकट संबंध रखने वाली अखिल भारतीय क्षत्रिय महासभा कर रही है. लगभग हर रैली में भाजपा के कार्यकर्ता बढ़चढ़ कर हिस्सा ले रहे हैं और आयोजक भी बन रहे हैं.

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उत्तरप्रदेश में इस बात की काफी अफवाहें हैं कि सिंह की पत्नी स्वाति को आगामी चुनावों में टिकट दिया जा सकता है और क्षत्रिय वोटों को रिझाने के लिए भाजपा सिंह का उपयोग कर सकती है. हालांकि राज्य भाजपा के एक वरिष्ठ नेता का कहना है कि सिंह के ठाकुर अनुयायियों के बावजूद पार्टी को उनकी जरूरत नहीं है.

पार्टी के प्रदेश प्रवक्ता चन्द्रमोहन के अनुसार पार्टी में पहले ही कई ठाकुर नेता हैं. राजनाथ सिंह, वीके सिंह, महेन्द्र सिंह हमारे पास हैं. पार्टी में ठाकुर चेहरों की कोई कमी नहीं है. और चूंकि हम उन्हें निष्कासित कर चुके हैं इसलिए हम उनके किसी बयान की कोई जिम्मेदारी नहीं ले सकते.

यह पूछे जाने पर कि क्या सिंह की पत्नी को टिकट देने की बात पर विचार किया जा रहा है, मोहन ने कहा कि यह भविष्य की बात है और अभी इसका कोई जवाब नहीं दिया जा सकता. यदि वे पार्टी में आती हैं तो हम इस बारे में बात करेंगे.

भाजपा के एक अन्य प्रदेश प्रवक्ता मनोज मिश्र थोड़े अधिक स्पष्टवादी रहे. आगामी चुनावों में स्वाति की भूमिका के बारे में उन्होंने अधिक सीधे तरीके से अपनी बात कही कि इस पल हम किसी भी संभावना से इनकार नहीं कर सकते.

पार्टी के अंदरूनी सूत्रों के अनुसार दयाशंकर पश्चिमी उत्तर प्रदेश के ठाकुर मतदाताओं के गढ़ समझे जाने वाले इलाकों में अभियान चलाते रहे हैं और उन्हें इसमें थोड़ी सफलता भी मिली है.

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प्रदेश की कुल आबादी में ठाकुरों का हिस्सा करीब-करीब आठ-नौ प्रतिशत है. ठाकुरों के पास हालांकि संख्या बल नहीं है लेकिन राज्य में काफी समय तक उनका राजनीतिक असर रहा है.

फिर भी, दयाशंकर चाहे ठाकुर वोटो को रिझा रहे हों, लेकिन पार्टी सूत्रों के अनुसार भाजपा उन्हें 21 जून से पहले वाला रुतबा नहीं दे सकती. सूत्रों का कहना है कि स्वयं ठाकुर लॉबी के अंदर ही इस मुद्दे पर गंभीर मतभेद हैं.

ठाकुरों का बड़ा नेता होने के बावजूद राजनाथ सिंह मुख्यमंत्री पद का दावेदार बनना नहीं चाहेंगे. लेकिन वे पार्टी के अंदर अपने बेटे पंकज की छवि उभारने के प्रयास में लगे हैं.

इसी कारण दयाशंकर पहले जैसा रुतबा नहीं पा सकते. हालांकि ठाकुर नेता होने के नाते दयाशंकर के पास बाहर से ही सही, भाजपा के लिए काम करते रहने के अलावा कोई विकल्प नहीं है. चूंकि वे मायावती के खिलाफ सार्वजनिक तौर पर हमले करते रहे हैं, इस कारण किसी दूसरी पार्टी में जाने के लिए भी उनके रास्ते बंद हो चुके हैं.

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कांग्रेस सिंह के खिलाफ अभियान चलाती रही है और उनके खिलाफ कार्रवाई की मांग करती रही है. उधर सपा के राजपूत चेहरे अमर सिंह का राज्य के क्षत्रिय समुदाय में पहले ही काफी असर है.

इन सब बातों को देखते हुए लगता यही है कि राज्य में चुनावों के नजदीक आने के साथ-साथ मायावती के खिलाफ सिंह के हमलों और क्षत्रिय इलाकों में उनकी रैलियों में बढ़ोतरी ही हो सकती है.

First published: 12 September 2016, 7:34 IST
 
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