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आखिर क्यों शिवसेना भाजपा के खिलाफ लगातार हमलावर रुख अपना रही है?

अश्विन अघोर | Updated on: 13 June 2016, 22:59 IST
(कैच हिंदी)
QUICK PILL
  • शिव सेना महाराष्ट्र में बनने वाली सरकार में हमेशा से बड़े भाई की भूमिका में रही है. लेकिन यह समीकरण 2014 में बदल गया जब बीजेपी को सेना के मुकाबले अधिक सीटें मिली.
  • बीजेपी नेता एकनाथ खड़से के इस्तीफे के बाद सेना की तरफ से खुशी जताए जाने पर बीजेपी नाराज हैं. सेना के नेताओं की खड़से से पुरानी नाराजगी है क्योंकि उन्होंने 2014 के चुनाव में सेना से गठबंधन तोड़े जाने की वकालत की थी.
  • विशेषज्ञों के मुताबिक शिव सेना बीजेपी के खिलाफ बयानबाजी कर गठबंधन को तोड़ना चाहती है. हालांकि वह गठबंधन तोड़ने की जिम्मेदारी अपने ऊपर लेने से बचना चाहती है.

2014 में महाराष्ट्र में सत्ता में आने के बाद बीजेपी और उसकी सहयोगी पार्टी शिवसेना के बीच लगातार जुबानी जंग चल रही है. सेना के नेता बीजेपी पर हमला करने का कोई भी मौका नहीं चूकते हैं वहीं बीजेपी अभी तक सेना के हमले को नजरअंदाज करती आई है.

सेना बीजेपी की सबसे पुरानी सहयोगी रही है और केंद्र में एनडीए की सरकार बनने तक दोनोें के बीच बेहतर संबंध रहे थे. केंद्र में बीजेपी की सरकार बनने के बाद कथित तौर पर सेना के नेताओं को अपमानित किया गया जिसके बाद सेना ने बीजेपी के खिलाफ मोर्चा खोल दिया.

शिव सेना महाराष्ट्र में बनने वाली सरकार में हमेशा से बड़े भाई की भूमिका में रही है. वह हमेशा से अधिक सीटें जीतती रही हैं और सत्ता में उसकी हिस्सेदारी भी अधिक रही है. लेकिन यह समीकरण 2014 में बदल गया जब बीजेपी को सेना के मुकाबले अधिक सीटें मिली. इसके बाद बीजेपी ने कथित तौर पर अपने अपमान का बदला लेना शुरू किया. सेना ने अपनेे अच्छे दिनों के दौरान बीजेपी के बड़े नेता अटल बिहारी वाजपेयी तक का अपमान किया था.

शिव सेना महाराष्ट्र में बनने वाली सरकार में हमेशा से बड़े भाई की भूमिका में रही है

राजनीतिक विश्लेषकों की माने तो दोनों दलों के बीच चल रही जुबानी जंग से ज्यादा नुकसान सेना को ही होगा क्योंकि वह हर मौके पर बीजेपी की आलोचना करती रहती है. 

वरिष्ठ पत्रकार गणेश वसंत टोरसेकर की माने तो पार्टी अगर बिना मतलब के बीजेपी की शिकायतों से बाज नहीं आती है तो उसे अगले स्थानीय चुनावों में खासा नुकसान उठाना पड़ सकता है. टोरसेकर कभी सेना के संस्थापक बाला साहब ठाकरे के बेहद करीबी हुआ करते थे. उन्होंने अपने मराठी ब्लॉग में इस बारे में विस्तार से चर्चा की है.

वह लिखते हैं, 'आज के सेना के नेता इस तरह से बात करते हैं जैसे वह बालासाहेब से कम नहीं है. लेकिन उन्हें यह नहीं भूलना चाहिए कि बालासहेेब की इज्जत विपक्षी नेता भी करते थे. अगर आज के सेना के नेता लगातार ऐसे ही उल-जुलूल बयान देते रहें तो पार्टी अपनी जमीन खो देगी.'

टोरसेकर का हालिया ब्लॉग सेना के नेताओं की तरफ से बीजेपी पर हालिया हमले के बाद सामने आया है. इस महीने की शुरुआत में औरंगाबाद में हुए पार्टी सम्मेलन में सेना के चीफ उद्धव ठाकरे ने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी पर भारत की छवि 'खराब' करने का आरोप लगाया था. 

वहीं संजय राउत ने देवेंद्र फडनवीस की सत्ता को 'निजाम का शासन' बताया था. राउत के बयान के बाद बीजेपी के नेताओं का धैर्य जवाब दे गया.

आमने-सामने

बीजेपी अपने नेता एकनाथ खड़से के इस्तीफे के बाद सेना की तरफ से खुशी जताए जाने पर भी नाराज हैं. खड़से को भ्रष्टाचार के कथित आरोप के बाद इस्तीफा देना पड़ा है. सेना के नेताओं की खड़से से पुरानी नाराजगी है क्योंकि उन्होंने 2014 के चुनाव में सेना से गठबंधन तोड़े जाने की वकालत की थी.

टोरसेकर ने कहा कि उद्धव समेत सेना के अन्य नेता अपने हितों की खातिर सीमा लांघ रहे हैं और अब उन्हें बीजेपी के साथ अपनी लड़ाई बंद करनी चाहिए.

वरिष्ठ पत्रकार कुमार केतकर हालिया घटनाक्रम को 2014 के चुनाव के पहले की स्थिति से जोड़कर देखते हैं. उन्होंने कहा, 'यह गठबंधन को तोड़ने की कोशिश है. तब और आज भी, पार्टी इस दिशा में पहल नहीं करना चाहती है. नरेंद्र मोदी और अमित शाह की बालासाहेब सेे निजी खुन्नस है क्योंकि उन्होंने सुषमा स्वराज को प्रधानमंत्री बनाए जाने की वकालत की थी. इसके अलावा बीजेपी के नेता सेना से पुराना हिसाब चुकाना चाहते हैं.'

केतकर ने कहा कि बीजेपी के नेता प्रमोद महाजन और गोपीनाथ मुंडे को अक्सर ठाकरे को मनाने के लिए मातोश्री जाना पड़ता था. न केवल नेता बल्कि बीजेपी के कार्यकर्ताओं को भी सेना के हाथों अपमानित होना पड़ता था. उन्होंने कहा, 'अब वह अपना हिसाब चुकाना चाहते हैं. यही वजह है कि बीजेपी के नेता सेना के बयान का उसी तत्परता के साथ जवाब दे रहे हैं. वह गठबंधन को तोड़ना चाहते हैं.'

केतकर बताते हैं, 'साथ ही मोदी और शाह देश की वित्तीय राजधानी पर नियंत्रण चाहते हैं. वह ऐसा करने के लिए कहीं तक जा सकते हैं. उनकी प्राथमिकता स्थानीय निकाय पर कब्जा करने की है. जबकि शिव सेना की प्राथमिकता बीजेपी को ऐसा करने से रोकने की है. अगर वह ऐसा करने में सफल रहती है तो वह बीजेपी को एक बार फिर से चुनाव बाद गठबंधन बनाने के लिए मजबूर करेगी.'

First published: 13 June 2016, 22:59 IST
 
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