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निजी कॉलेजों को मिल सकता है आईआईटी की फीस बढ़ने का फायदा

अमित कुमार बाजपेयी | Updated on: 14 June 2016, 14:34 IST
QUICK PILL
  • आईआईटी काउंसिल की अध्यक्ष और मानव संसाधन मंत्री स्मृति ईरानी ने फीस बढ़ोत्तरी को हरी झंडी दे दी. लेकिन फीस को तीन गुना की बजाय करीब दोगुना कर दिया गया.
  • देश के निजी इंजीनयिरिंग कॉलेजों-निजी यूनीवर्सिटीज में बीटेक की सालाना फीस करीब 40 हजार से लेकर दो लाख रुपये के आसपास है. मौजूदा हालात ऐसे हैं कि सीटें ज्यादा हैं और प्रवेश लेने वाले छात्र कम. 

भारतीय प्रौद्योगिकी संस्थान (आईआईटी) की फीस में इजाफे का फैसला लिया गया है. फीस को दोगुने से भी ज्यादा बढ़ा दिया गया है. विशेषज्ञों की मानें तो यह फैसला निजी कॉलेज-यूनीवर्सिटी में छात्रों को प्रवेश लेने के लिए बढ़ावा देने वाला साबित हो सकता है.

अभी तक आईआईटी में चार वर्षीय बीटेक प्रोग्राम के लिए फीस प्रति वर्ष 90 हजार रुपये थी. पिछले माह आईआईटी काउंसिल की स्थायी समिति ने फीस को तीन गुना करने का सुझाव दिया था. जबकि इससे पहले 2013 में आईआईटी की फीस बढ़ाई गई थी और इसे 50 हजार रुपये से बढ़ाकर 90 हजार कर दिया गया था.

हालांकि फीस में बढ़ोत्तरी का अंतिम फैसला आईआईटी काउंसिल की अध्यक्ष और मानव संसाधन मंत्री स्मृति ईरानी को लेना था. जिसके बाद स्मृति ईरानी ने फीस बढ़ोतरी को हरी झंडी दे दी. लेकिन फीस को तीन गुना की बजाय करीब दोगुना कर दिया गया.

स्मृति ईरानी ने कहा कि सरकार के इस निर्णय से करीब 50 फीसदी छात्रों को फायदा पहुंचेगा

पांच लाख रुपये सालाना से कम कमाने वाले अभिभावकों के बच्चों को फीस में 66 फीसदी की छूट दी जाएगी.

इसके बाद अब छात्रों को प्रतिवर्ष फीस के रूप में दो लाख रुपये चुकाने होंगे. इसका मतलब कि चार साल का जो बीटेक पहले 3 लाख 60 हजार रुपये में पूरा हो जाता था. अब उसे करने में 8 लाख रुपये लगेंगे.

फीस वृद्धि को लेकर अनुसूचित जाति, जनजाति और दिव्यांग छात्रों को फीस माफी का भरोसा दिया गया है. वहीं, पांच लाख रुपये सालाना से कम कमाने वाले अभिभावकों के बच्चों को फीस में 66 फीसदी की छूट दी जाएगी. 

स्मृति ईरानी ने कहा कि सरकार के इस निर्णय से करीब 50 फीसदी छात्रों को फायदा पहुंचेगा. बता दें कि आईआईटी में 15 फीसदी सीटें अनुसूचित जाति, 7.5 फीसदी अनुसूचित जनजाति और 25 फीसदी ओबीसी वर्ग के छात्रों के लिए आरक्षित हैं.

अभी तक आईआईटी थी पहली पसंद

अभी तक आईआईटी की फीस निजी कॉलेजों की तुलना में कम थी. छात्रों-अभिभावकों के लिए आईआईटी ब्रांड होने के साथ ही कम फीस में डिग्री देने वाला राष्ट्रीय संस्थान भी है. 

पिछले करीब पांच सालों में छात्रों की कमी के चलते यूपी के दर्जनों इंजीनयरिंग कॉलेजों में ताला लग गया. जबकि तमाम यूनीवर्सिटी में छात्रों की कमी के चलते इंजीनियरिंग के कुछ कोर्सों को बंद तक कर दिया गया. 

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हालांकि ऐसा भी नहीं है कि वाकई छात्रों की संख्या कम हो गई थी. दरअसल कई कॉलेजों द्वारा झूठी जानकारी, मान्यता न होना, प्लेसमेंट न करवाना, फैकल्टी की कमी, संसाधनों की कमी आदि के चलते छात्रों का इस ओर से मन उचट गया.

निजी कॉलेजों को मिलेगा फायदा

देश के निजी इंजीनयिरंग कॉलेजों-निजी यूनीवर्सिटीज में बीटेक की सालाना फीस करीब 40 हजार से लेकर दो लाख रुपये के आसपास है. मौजूदा हालात ऐसे हैं कि सीटें ज्यादा हैं और प्रवेश लेने वाले छात्र कम. 

छात्रों को आकर्षित करने के लिए तमाम कॉलेज-यूनीवर्सिटी स्कॉलरशिप, डिस्काउंट, लैपटॉप समेत तमाम प्रलोभन भी देते हैं. लेकिन फिर भी छात्रों की संख्या नहीं बढ़ रही. 

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लेकिन अब आईआईटी की फीस बढ़ने से ऐसे छात्र जो जेईई की तैयारी में ही 12वीं के बाद एक-दो साल गवां देते थे, वो अब सीधे निजी संस्थानों में प्रवेश लेना उचित समझेंगे.

सरकार फीस बढ़ाने की बजाए बड़े-बड़े औद्योगिक घरानों से आईआईटी को गोद लेने के लिए कह सकती थी

तमाम अभिभावक भी जो इतनी फीस नहीं चुका सकते वो अपने बच्चों को निजी संस्थानों में भेजना बेहतर समझेंगे. 

यहां एक बार और भी ध्यान देने वाली है कि हर साल आईआईटी-जेईई की परीक्षा में लाखों छात्र शामिल होते हैं लेकिन प्रवेश करीब 10 हजार छात्र-छात्राओं को ही मिलता है. 

बड़े उद्योगों सीएसआर के अंतर्गत आईआईटी को गोद लें

ग्रेटर नोएडा स्थित एनआईईटी इंस्टीट्यूट के निदेशक प्रो. प्रवीण पचौरी की मानें तो सरकार को चाहिए कि वो गुणवत्तायुक्त शिक्षा देने के साथ ही शुल्क घटाए. लेकिन इस कदम से काफी अभिभावकों को परेशानी होगी.

सरकार इसकी बजाए आईआईटी जैसे संस्थानों के शिक्षकों पर रिसर्च एंड डेवलपमेंट करने का प्रेशर डालती ताकि उनसे होने वाली शोध इन संस्थानों को आर्थिक मदद दे सके. यहां पर उद्योगों, संगठनों आदि को ध्यान में रखते हुए शोध किए जाने की जरूरत है.

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हालांकि सरकार फीस बढ़ाने की बजाए बड़े-बड़े औद्योगिक घरानों से आईआईटी को गोद लेने के लिए कह सकती थी. जिसके लिए औद्योगिक घराने अपने सीएसआर (कॉरपोरेट सोशल रिस्पॉन्सिबिलटी) की रकम खर्च करें. इससे आईआईटी की फीस भी कम रहती और औद्योगिक संगठनों की भागीदारी भी हो जाती.

व्यवसायिक शिक्षा में ऊंची फीस सही निर्णय

शारदा यूनीवर्सिटी के चांसलर पीके गुप्ता की माने तो सरकार को 12वीं तक की शिक्षा में नागरिकों को सहूलियत और छूट देनी चाहिए. लेकिन उच्च या व्यावसायिक शिक्षा में ऊंची फीस लेना सही निर्णय है.

दरअसल व्यावसायिक पाठ्यक्रम में प्रवेश लेने वाले छात्र इन डिग्री के बल पर काफी अच्छे पैकेज की नौकरी पाते हैं. जिन डिग्री की बदौलत उन्हें आकर्षक पैकेज की जॉब मिलती है, उसके लिए उचित फीस चुकानी ही चाहिए.

वहीं, आईआईटी में दो लाख रुपये फीस किए जाने के बावजूद भी सरकार को कोई मुनाफा नहीं होने वाला. वहां के हर छात्र पर अभी भी काफी रकम खर्च होती है. और रही बात इससे निजी संस्थानों-विश्वविद्यालयों को फायदा होने की तो ऐसा नहीं है. जो गुणवत्तायुक्त शिक्षा देगा वहां छात्र प्रवेश लेंगे.

First published: 14 June 2016, 14:34 IST
 
अमित कुमार बाजपेयी @amit_bajpai2000

पत्रकारिता में एक दशक से ज्यादा का अनुभव. ऑनलाइन और ऑफलाइन कारोबार, गैज़ेट वर्ल्ड, डिजिटल टेक्नोलॉजी, ऑटोमोबाइल, एजुकेशन पर पैनी नज़र रखते हैं. ग्रेटर नोएडा में हुई फार्मूला वन रेसिंग को लगातार दो साल कवर किया. एक्सपो मार्ट की शुरुआत से लेकर वहां होने वाली अंतरराष्ट्रीय प्रदर्शनियों-संगोष्ठियों की रिपोर्टिंग.

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