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विकास की चकाचौंध के बीच इतिहास के सबसे बड़े जल संकट से गुजर रहा है देश

कैच ब्यूरो | Updated on: 15 June 2018, 13:41 IST

नीति आयोग का कहना है कि भारत वर्तमान में अपने इतिहास में सबसे खराब जल संकट से गुजर रहा है और लाखों लोगों का जीवन खतरे में हैं. नीति आयोग ने अपनी रिपोर्ट में यह भी चेतवानी दी है कि जल संकट इतने चरम स्तर तक पहुंच चुका है कि 2030 तक देश में पानी की मांग उपलब्ध आपूर्ति से दोगुना होने का अनुमान है, जिसमें लाखों लोगों के लिए पानी कमी और देश के सकल घरेलू उत्पाद (जीडीपी) में छह प्रतिशत की कमी होने का अनुमान है.

रिपोर्ट में कहा गया है कि वर्तमान में 600 मिलियन भारतीय भारी जलसंकट का सामना कर रहे हैं. यही नहीं देश प्रदूषित जल से प्रति वर्ष 200,000 हजार लोगों की मौत हो जाती है. रिपोर्ट के अनुसार वर्ष (2016-17) में जलसंकट को लेकर गुजरात सबसे आगे रहा जबकि इसके बाद मध्य प्रदेश, आंध्र प्रदेश, कर्नाटक और महाराष्ट्र का स्थान है.

 

यह रिपोर्ट गुरुवार को जल संसाधन मंत्री नितिन गडकरी और नीति आयोग के उपाध्यक्ष राजीव कुमार ने जारी की.
गडकरी ने कहा कि पानी की कमी आज देश की सबसे बड़ी समस्याओं में से एक है और पानी की कमी से ज्यादा, यह जल संसाधनों के प्रबंधन का मुद्दा है. उन्होंने कहा कि उन राज्यों को पुरस्कृत करने की आवश्यकता है जो अपने जल संसाधनों के प्रबंधन में अच्छा प्रदर्शन कर रहे हैं.

गडकरी ने कहा, "जिन राज्यों ने जल प्रबंधन पर अच्छा प्रदर्शन किया है ये वह राज्य हैं जो कृषि विकास दर में भी अच्छा प्रदर्शन करते हैं''. उन्होंने कहा पानी और कृषि अर्थव्यवस्था के बीच सीधा संबंध है." नीति आयोग के उपाध्यक्ष राजीव कुमार ने कहा कि कोई कभी कल्पना नहीं कर सकता था कि भारत को ऐसे पानी संकट का सामना करना पड़ेगा.

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केन्द्रीय जल आयोग द्वारा जारी एक रिपोर्ट के मुताबिक, 17 मई, 2018 तक, 2017 में सामान्य रुप से मानसून के बावजूद प्रमुख भारतीय जलाशयों में जल स्तर सामान्य से 10 फीसदी कम था. तेजी से शहरी विकास, बढ़ती आबादी, और एक बदलते माहौल ने कई भारतीय शहरों के लिए सामान्य नागरिक की जल मांगों को पूरा करना मुश्किल बना दिया है, जैसा कि दिल्ली स्थित विचार मंच सेंटर फॉर एनर्जी, एनवायरनमेंट एंड वॉटर (सीईईई) के एक शोधकर्ता कंगकानिका नियोग ने बताया है. 

इंडिया स्पेंड के अनुसार ‘क्लाइमेट ट्रेंड्स’ ने भारत में बारिश के पैटर्न में बदलाव को समझने के लिए जलवायु परिवर्तन का प्रभाव, बार-बार सूखे और पानी की कमी का विश्लेषण करने के लिए माध्यमिक डेटा का उपयोग किया है. देश में मानसून की वर्षा, 2016 तक पिछले छह वर्षों में से पांच में औसत से कम रहा है और पूर्व मानसून ( मार्च से मई ) के मौसम में 2018 में लगातार तीसरे वर्ष औसत से 11 फीसदी कम बारिश देखी गई है, जैसा कि अध्ययन में पाया गया है.

तथ्य-पत्र में कहा गया है कि, ये बदलाव लंबी अवधि के परिवर्तन से जुड़ा है. कुछ राज्यों ने वार्षिक वर्षा में बड़ा बदलाव देखा है. उदाहरण के लिए, छत्तीसगढ़ में सालाना बारिश लगभग 10 फीसदी कम हो गई है, जबकि यह तटीय कर्नाटक, पंजाब और हरियाणा में बढ़ी है. 1870 के बाद से मानसून की वर्षा में कमी आई है, लेकिन मानसून से अलग बारिश बढ़ रही है, जो वार्षिक औसत को संतुलित करती है.

केरल और मध्य प्रदेश जैसे राज्यों ने 2017 मानसून के दौरान कम वर्षा प्राप्त की है. तथ्य पत्र ने कहा गया है कि 2014 और 2015 के खराब मानसून के परिणामस्वरूप आंध्र प्रदेश, कर्नाटक, महाराष्ट्र और तेलंगाना के कुछ हिस्सों सहित देश के कई हिस्से में गंभीर सूखे की स्थिति और पानी की कमी बनी हुई है. नतीजतन, मॉनसून के अंत ( अक्टूबर-2017 की शुरुआत में ) में प्रमुख जलाशयों में जल स्तर औसत से 11 फीसदी नीचे था.

First published: 15 June 2018, 13:33 IST
 
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