Home » इंडिया » India is almost rejected congress
 

कांग्रेस अब देश और सत्ता की स्वाभाविक पार्टी नहीं है

आदित्य मेनन | Updated on: 21 May 2016, 8:15 IST

4 राज्यों और एक  केंद्रशासित प्रदेश में आयोजित हुए विधासभा चुनावों के नतीजों की घोषणा की जा चुकी है. पश्चिम बंगाल और तमिलनाडु में क्रमशः ममता बनर्जी की टीएमसी और जयललिता की एआईएडीएमके दोबारा सत्ता में वापस आने में सफल रही हैं. जबकि कांग्रेस को दो राज्यों में मुंह की खानी पड़ी है- असम में बीजेपी के हाथों और केरल में वाम दलों द्वारा.

भारत के सबसे पुराने राजनीतिक दल के लिये सिर्फ केंद्र शासित प्रदेश पुडुचेरी ही एक सांत्वना का मरहम लेकर आया है लेकिन ऐसा भी वह डीएमके की मदद के बल पर ही कर सकी है.

ये नतीजे प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के कार्यकाल के दो वर्ष पूरे होने से महज एक सप्ताह पहले ही आये हैं और ऐसे में इन नतीजों को मोदी के बीते 2 वर्षों के कामकाज के साथ जोड़ कर देखना दिलचस्प हो जाता है. हालांकि ये चुनाव मोदी के लिए जनादेश नहीं हैं. ये पहले ऐसे चुनाव रहे जिसमें मोदी के सत्ता में आने के बाद प्रधानमंत्री का प्रदर्शन या उनकी राजनीति और रणनीति का महत्व न्यूनतम रहा.

हालांकि 2014 लोकसभा चुनावों के दौरान असम को छोड़कर इन सभी राज्यों में मोदी लहर बेअसर ही साबित हुई थी. तमिलनाडु और पश्चिम बंगाल के मतदाताओं ने क्रमशः एआईएडीएमके और टीएमसी के पक्ष में खुलकर मतदान किया था जबकि केरल में मोदी के प्रभाव को कांग्रेसनीत यूडीएफ ने रोका था.

बीजेपी ने भी इन 4 राज्यों में मोदी माॅडल को अधिक प्रचारित और प्रसारित नहीं किया जो महाराष्ट्र, हरियाणा, झारखंड, दिल्ली, जम्मू और कश्मीर और बिहार के विधासभा चुनावों में पार्टी द्वारा अपनाई गई रणनीति के बिल्कुल उलट था.

यहां तक कि बड़ी जीत हासिल करने वाले राज्य असम में भी बीजेपी ने सर्बानंद सोनोवाल और हेमंत बिस्वासर्मा जैसे स्थानीय नेताओं को अधिक तवज्जो दी.

इन चुनावों के नतीजे मोदी पर बेहद महत्वपूर्ण प्रभाव छोड़ने के अलावा संपूर्ण राजनीति पर भी असर छोड़ेंगे.

अमित शाह की इज्जत थी दांव पर

बीते कुछ समय से मोदी लहर के थमने का संकेत मिल रहा था. यहां तक कि मोदी के देश की सत्ता संभालने के कुछ समय बाद ही हरियाणा और महाराष्ट्र में आयोजित हुए विधानसभा चुनावों में बीजेपी के वोट प्रतिशत में लोकसभा चुनावों के मुकाबले गिरावट देखने को मिली. बिहार और दिल्ली में तो बीजेपी को मुंह की खानी पड़ी थी.

दिल्ली ओर बिहार की हार के बाद अविश्वास की छाया में घिरा ब्रांड मोदी निश्चित ही इन नतीजों से कुछ विश्वास बहाल कर पाने में सफल होगा.

इस जीत के फलस्वरूप केंद्रीय खेल मंत्री सर्बानंद सोनोवाल मुख्यमंत्री के रूप में दिसपुर का रुख करेंगे. इस जीत से मिला ईंधन मोदी को भी अपने मंत्रिमंडल में फेरबदल करने का साहस भरेगा. वे उसमें कुछ सुधार करने में सक्षम हो पाएंगे.

इन विधानसभा चुनावों के नतीजे मोदी के मुकाबले पार्टी अध्यक्ष अमित शाह के लिये एक जनमत संग्रह की तरह रहे हैं. अब जब बीजेपी अपने प्रभाव के क्षेत्रों में विस्तार करने की योजनाओं को लेकर आगे बढ़ रही है यह चुनाव परिणाम तय करेंगे कि शाह का अश्वमेघ घोड़ा कहां तक पहुंचने में सफल रहा है.

असम के अलावा शाह ने अन्य राज्यों में पार्टी की मजबूत उपस्थिति सुनिश्चित करने के लिये कोई कसर नहीं छोड़ी और दिन-रात एक कर दिया. नतीजतन पार्टी पश्चिम बंगाल और केरल में मौजूदगी दर्ज करवाने में सफल रही है और केरल में पार्टी ने पहली बार अपना खाता खोला है.

असम में जीत और पश्चिम बंगाल में लाभ अगले वर्ष आयोजित होने वाले उत्तर प्रदेश के चुनावों में उतरने से पहले पार्टी को बेहद जरूरी आत्मविश्वास प्रदान करने वाला साबित होगा.

कांग्रेस मुक्त भारत?

ऐसा लगता है कि दो राज्यों, असम और केरल में कांग्रेस की हार के बाद बीजेपी अपने कांग्रेस मुक्त भारत के उद्देश्य के और करीब पहुंच गई है. लोकसभा चुनावों में पार्टी की करारी शिकस्त के बाद राज्यों में भी लगातार हार झेल रही कांग्रेस के लिये ये नतीजे किसी बड़े झटके से कम नहीं हैं.

इसके अलावा ये वे राज्य हैं जहां कांग्रेस का संगठन देश के अन्य राज्यों के मुकाबले कहीं अधिक मजबूत और प्रभावशाली है. यह हार पुनर्निर्माण की दिशा में पार्टी के प्रयासों के लिये अधिक नुकसानदेह ही साबित होगी.

अब सिर्फ कर्नाटक, उत्तराखंड और हिमाचल प्रदेश और पूर्वोत्तर के तीन राज्यों मणिपुर, मेघालय और मिजोरम में ही कांग्रेस की सरकार है. अगर कुल मिलाकर देखा जाए तो इन राज्यों में लोकसभा की 42 सीट आती हैं, जितनी की लगभग इस समय कांग्रेस के पास हैं.

बेशक ये संकेत कांग्रेस के लिये अच्छे नहीं हैं. हालांकि वह अभी भी मध्य प्रदेश, राजस्थान, गुजरात, छत्तीसगढ़ और तेलंगाना जैसे महत्वपूर्ण राज्यों में मुख्य विपक्षी पार्टी बनी हुई है.

लेकिन असम और केरल की सत्ता हाथ से जाने के दो मुख्य दूरगामी दुष्परिणाम हो सकते हैं. सबसे पहले तो पार्टी फंड के अपने बेहद महत्वपूर्ण स्रोत खो देगी. 2014 लोकसभा चुनावों के दौरान कांग्रेस के पास केंद्र के अलावा महाराष्ट्र, आंध्रप्रदेश ओर हरियाणा जैसे अमीर राज्यों में सत्ता में होने के बावजूद बीजेपी ने उसे करारी मात दी थी. कोई भी आराम से इस बात की कल्पना कर सकता है कि यह अंतर 2019 तक बढ़कर कहां पहुंच जाएगा.

दूसरा, ऐसे में कांग्रेस से बीजेपी की मुख्य विरोधी पार्टी का तमगा भी छिन जाने का खतरा मंडरा रहा है. अगले साल पंजाब में होने वाले चुनावों में आप की संभावित जीत उसके ताबूत में एक और कील का काम कर सकती है. कांग्रेस की उम्मीद अब गुजरात जैसे कुछ राज्यों पर टिकी है जहां बीते 2 दशकों से सत्ता उसके लिये दूर की कौड़ी साबित हो रही है.

हालांकि ये नतीजे कांग्रेस के लिये कुछ सांत्वना भी लेकर आए हैं- वह पुडुचेरी में जीतने में सफल रही है और इसके अलावा पश्चिम बंगाल और केरल में भी उसका प्रदर्शन सराहनीय रहा है.

कांग्रेस के लिये एक स्पष्ट संदेश यह है कि 2014 के बाद से वह क्षेत्रीय दलों के साथ गठबंधन करके ही बेहतर प्रदर्शन करने में सफल रही है. बिहार में भी वह नितीश कुमार और लालू यादव के गठबंधन के बूते कुछ सीट जीतने में कामयाब रही. पश्चिम बंगाल में भी कांग्रेस वाम दलों के साथ गठबंधन में लड़ी और आखिरकार मुख्य विपक्षी पार्टी बनने में सफल रही है.

कांग्रेस को अब यह बात समझ लेनी होगी कि वह देश पर शासन करने वाली पार्टी नहीं रही है. आज की स्थिति में वह सिर्फ राष्ट्रीय स्तर पर बीजेपी के खिलाफ होने वाले गठबंधनों में महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकती है.

वाम मोर्चा वापसी करने में सफल होगा?

इस बात की संभावना है कि केरल में जीत दर्ज करने के बाद वाम दल बीजेपी के खिलाफ राष्ट्रीय स्तर पर तैयार होने वाले गठबंधनों में एक अहम भूमिका में आ सकेंगे. उसी कांग्रेस के नेतृत्व में जिसे उसने केरल में हराया है. बेशक अब वाम दलों को वीएस अच्युतानंदन और पिन्नारायी विजयन के बीच मुख्यमंत्री पद के लिये होने वाले द्वंद्व से भी निबटना होगा.  

हालांकि चुनावी रूप से तो नहीं लेकिन वाम दल राष्ट्रीय स्तर पर पहले से ही बीजेपी के लिये प्रमुख वैचारिक चुनौती माने जाते हैं और जेएनयू मामला और हैदराबाद केंद्रीय विश्वविद्यालय में हुए विरोध प्रदर्शन इसका उदाहरण हैं. जेएनयूएसयू अध्यक्ष कन्हैया कुमार के रूप में वाम दलों को दक्षिणपंथी दलों के खिलाफ एक अच्छा पोस्टर ब्याॅय मिल गया है.

अब वाम दलों को इस बढ़ता का फायदा उठाना होगा. फिलहाल राष्ट्रीय स्तर पर एक बीजेपी विरोधी गठबंधन की पूरी गुंजाइश है और ऐसे में सीपीआई (एम) महासचिव सीताराम येचुरी को यूपीए-1 सरकार के गठन में अहम भूमिका निभाने वाले स्वर्गीय हरकिशन सिंह सुरजीत की तर्ज पर आगे आकर पहल करनी होगी.

निःसंदेह येचुरी को पश्चिम बंगाल में कांग्रेस के साथ गठबंधन करने को लेकर उठने वाले सवालों का जवाब देना होगा. हालांकि कांग्रेस का प्रदर्शन इतना बुरा नहीं रहा लेकिन वाम दलों के लिये नतीजे बेहद नुकसानदेह रहे हैं.

क्षेत्रीय दलों का उदय

बीते दो वर्षों के राजनीतिक माहौल ने एक बात तो साफ कर दी है कि बीजेपी के लिये असल खतरा कांग्रेस नहीं बल्कि क्षेत्रीय दल हैं. चाहे हरियाणा की बात हो या फिर महाराष्ट्र की, अबतक बीजेपी का कांग्रेस सरकारों के खिलाफ प्रदर्शन काफी अच्छा रहा है. लेकिन जब भी उसका सामना क्षेत्रीय दलों से हुआ है तो उसे मुंह की खानी पड़ी है और दिल्ली में आम आदमी पार्टी और बिहार में नितीश कुमार के नेतृत्व वाला गठबंधन इसके उदाहरण हैं.

इसका सीधा मतलब है कि बीजेपी की संगठनात्मक शक्ति, मोदी का करिश्मा और यहां तक हिंदुत्व कार्ड, सबकुछ मजबूत क्षेत्रीय दलों और उनका प्रतिनिधित्व करने वाले राजनेताओं के सामने असफल हो गया.

बीजेपी तमिलनाडु में डीएमके-कांग्रेस गठबंधन के खिलाफ एआईएडीएमके की जीत से काफी खुश होगी. इसके अलावा मोदी, जयललिता के साथ अच्छे संबंध भी रखते हैं.

पश्चिम बंगाल में कांग्रेस-वाम दलों के गठबंधन पर ममता की जीत भी बीजेपी को काफी पसंद आएगी. इसके अलावा ममता की आक्रामक अल्पसंख्यक तुष्टीकरण की राजनीति भी संभवतः आगामी वर्षो में बीजेपी के लिये बंगाल में स्थान निर्मित करेगी. लेकिन इसका एक दूसरा पहलू यह भी है कि ममता कभी केंद्र में बीजेपीनीत गठबंधन का हिस्सा नहीं बनेंगी. अंततः पार्टी को राष्ट्रीय स्तर पर एक और मजबूत विरोधी का सामना करना पड़ेगा.

कांग्रेस की बुरी हालत क्षेत्रीय पार्टियों की जीत, नितीश कुमार और अरविंद केजरीवाल जैसे नेताओं को मजबूत करेगी जो 2019 तक खुद को नरेंद्र मोदी के खिलाफ प्रधानमंत्री पद के उम्मीदवार के रूप में स्थापित करना चाहते हैं.

आने वाले महीनों में मोदी को कुछ नए और बेहद अप्रत्याशित दुश्मनों का सामना करने के लिये तैयार रहना होगा.

First published: 21 May 2016, 8:15 IST
 
पिछली कहानी
अगली कहानी