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भारत किसी परमाणु हादसे के लिए कितना तैयार है?

कुमार सुंदरम | Updated on: 10 December 2015, 8:46 IST
QUICK PILL
  • जापानी प्रधानमंत्री इस सप्ताहांत में भारत के दौरे पर होंगे. इस दौरान तमाम द्विपक्षीय मुद्दों के साथ न्युक्लियर समझौते पर भी बात आगे बढ़ने की संभावना है. क्या हम भोपाल, फ़ुकुशिमा और चेर्नोबिल जैसे हादसों से निपटने में सक्षम हैं.
  • नरेंद्र मोदी सरकार ने केंद्र में आते ही एनडीएमए को भंग कर दिया लेकिन \r\nउसकी जगह कोई नयी व्यवस्था नहीं की. भोपाल गैस त्रासदी के सबक को भूलते हुए\r\n सरकार परमाणु सुरक्षा के मामले पर पर्याप्त जागरूकता नहीं दिखा रही है.
इस साल भोपाल की मानव निर्मित त्रासदी के 31 साल हो गए. भोपाल गैस त्रासदी के पीड़ित आज भी न्याय और मुआवजे के लिए संघर्ष कर रहे हैं. वो जहरीले तत्वों की सफाई लिए आज भी कोशिश कर रहे हैं.

पीड़ितों की मांग है कि मेडिकल सहायता के लिए मनमाने तरीके से चुने गए 'पीड़ितों' की सूची में और नाम जोड़े जाने चाहिए. कई वैज्ञानिकों अध्ययनों में यूनियन कार्बाइड से हुए गैस रिसाव के जेनेरिक असर की पुष्टि हुई है. लेकिन अभी तक न तो केंद्र सरकार और न ही किसी राज्य सरकार ने इसे गंभीरता से लिया है.

जापान के फ़ुकुशिमा के परमाणु संयत्र में हुए हादसे के भी पांच साल हो चुके हैं. पूर्व सोवियत संघ के चेर्नोबिल में हुए परमाणु हादसे को भी 30 साल हुए.

भारत को भी इसे गंभीरता से लेना ही होगा. हमें खुद से पूछना होगा कि क्या हम ऐसे गंभीर परमाणु हादसों के लिए तैयार हैं?

भारतीय प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने केंद्र में आने के बाद पहला काम ये किया कि उन्होंने नेशनल डिजाजस्टर मैनेजमेंट अथॉरिटी(एनडीएमए) को भंग कर दिया. हालांकि अभी तक वो ऐसे हादसों से निपटने के किसी बेहतर विकल्प को नहीं पेश कर सके हैं.

ऐसी त्रासदियों को रोकने और उनके परिणामों से निपटने के लिए कोई नया सरकारी सफेद हाथी तैयार कर देने से बात नहीं बनेगी. उन्हें इससे ज्यादा कुछ करना होता है.

न्यूक्लियर इंजीनियरों, उद्योग जगत और परमाणु सुरक्षा विशेषज्ञों द्वारा दिए गए आश्वासनों के बावजूद हमें ये याद रखना चाहिए कि ये मामला केवल सुरक्षा बंदोबस्त के इंतजामों तक सीमित नहीं है.

परमाणु हादसे के परिणामों को लेकर योजना बनाते समय ये याद रखना चाहिए ऐसे हादसों के परिणाम बहुत लंबे समय तक रहते हैं और इस नुकसान की भरपाई संभव नहीं है. ऐसे हादसों का प्रभाव समय और काल की सीमा से परे होते हैं.

परमाणु ऊर्जा को लेकर अति-उत्साही लोग इन हादसों की तुलना किसी कार हादसे या कारखानों में होने वाले हादसों से करते हैं. वो ये भूल जाते हैं कि इन मामलों में अगर बड़े स्तर पर जानोमाल का नुकसान हो भी जाए तो उसके तुरंत बाद राहत एवं बचाव कार्य शुरू किया जा सकता है. परमाणु हादसे के मामले में ऐसा संभव नहीं.

चेर्नोबिल में घटनास्थल के 30 किलोमीटर के दायरे में स्थित सभी शहर भुतहे हो चुके हैं. अगली कई सदियों तक वहां मानवीय बसावट संभव नहीं. फ़ुकुशिमा में एक समय हरे-भरे शहर नामी और फ़ुताबा एक कालखंड में जम से गए हैं. इन जगहों पर विकिरण अब भी ख़तरनातक स्तर तक है. तकनीकी रूप से अति-उन्नत देश में परमाणु हादसे के दुष्परिणामों को काबू नहीं किया जा सका.

जापान के सत्ताधारियों में करदाताओं के पैसे पर टेपको को बचाने की होड़ लग गयी थी


परमाणु रिएक्टर बनाने वाली टोक्यो इलेक्ट्रॉनिक पावर कंपनी(टेपको) ने हादसे के असर को कम करके दिखाने की पूरी कोशिश की. कंपनी ने 'पीड़ितों' की गिनती को कम करके अपनी जवाबदेही को न्यूनतम कर लिया. उसने सरकार को ब्लैकमेल किया कि अगर उसकी गर्दन पर से शिकंजा ढीला नहीं किया गया तो वो टोक्यो में बिजली आपूर्ति को बाधित कर देगी. टेपको इतनी बड़ी कंपनी है कि उसका विफल होना संभव नहीं लगता. जापान के सत्ताधारियों में करदाताओं के पैसे पर टेपको को बचाने की होड़ लग गयी थी.

जापान में इस हादसे  दो लाख से अधिक लोग विस्थापित हो गये. इससे व्यापक सामाजिक और मनोवैज्ञानिक क्षति हुई.

ऐसे हादसों से बचने के लिए जरूरी एहतियात कुछ इस तरह हैं-

  • पावर प्लांट की सुरक्षा योजना बनाना
  • विश्वसनीय सुरक्षा की संस्कृति विकसित करना
  • स्वतंत्र नियामक का होना
  • तुरंत कार्रवाई करने वाला भरोसेमंद नागरिक प्रशासन
  • पर्याप्त प्रतिक्रिया के लिए जवाबदेही तय करने की जन-केंद्रित प्रणाली

भारत को इसमें से हर बिंदु पर काम करने की जरूरत है. इसलिए यहां ऐसी कोई दुर्घटना की कल्पना ज्यादा भयावह लगती है.

भारत का परमाणु उद्योग इस मामले में पूरी तरह गैर-पारदर्शी और गैर-जवाबदेह है. सीधे प्रधानमंत्री कार्यालय के तहत काम करने के कारण इसकी सार्वजनिक समीक्षा एक हद तक संभव नहीं.

इससे जुड़ी गंभीर आरटीआई याचिकाएं पुराने पड़ चुके परमाणु ऊर्जा कानून-1962 के तहत 'राष्ट्रीय सुरक्षा' का हवाला देकर बार बार वापस कर दी जाती रही हैं. वो भी तब जब भारत-अमेरिका परमाणु करार के बाद नागरिक प्रयोग को इससे अलग कर दिया गया था.

डॉक्टर एके गोपालकृष्णन ने परमाणु सेक्टर सुरक्षा की समीक्षा करायी तो उस रिपोर्ट को ढंडे बस्ते में डाल दिया गया

तमिलनाडु के कुडनाकुलम के परमाणु संयत्र के ख़िलाफ़ चल रहे आंदोलन के तहत जब परमाणु ऊर्जा विभाग(डीएई) से साइट सेलेक्शन रिपोर्ट और सेफ़्टी असेसमेंट रिपोर्ट जैसे बुनियादी  दस्तावेज मांगे गये तो उसने इनकार कर दिया. जबकि बाकी दुनिया में उन्हें सार्वजनिक रूप से पेश किया जाता है. मुख्य सूचना आयुक्त ने प्रधानमंत्री को इस बारे में एक पत्र भी लिखा था लेकिन वो भी काम नहीं आया.

परमाणु सुरक्षा नियमन भी एक ऐसा मुद्दा है जिसपर भारत को गंभीर रूप से सोचने की जरूरत है. नियमन की जिम्मेदारी परमाणुु ऊर्जा नियामक बोर्ड(एईआरबी) के पास है. जो आर्थिक और मानव संसाधन के लिए परमाणु ऊर्जा आयोग पर निर्भर है. इससे आप अंदाजा लगा सकते हैं कि नियामक बोर्ड कितना शक्तिविहीन होगा.

 
जब एईआरबी के चेयरमैन डॉक्टर एके गोपालकृष्णन ने पूरे परमाणु सेक्टर की सुरक्षा समीक्षा का आदेश दिया तो उस रिपोर्ट को ढंडे बस्ते में डाल दिया गया. केंद्र सरकार ने इस रिपोर्ट पर 'टॉप सीक्रेट' का ठप्पा लगा दिया. गोपालकृष्णन एक स्वतंत्र और मजबूत नियामक को मुखर पैरोकार थे. उन्होंने आयातित परमाणु संयंत्रों पर रिपोर्ट आने तक के लिए रोक भी लगा दी थी.

हादसा होने पर जवाबदेही और मुआवजा के मुद्दे पर भी सरकार भी संभावित पीड़ितों के प्रति पर्याप्त चिंतित नहीं नजर आ रही है.

आपको शायद न पता हो कि भारत सरकार ने इसी हफ़्ते कुडनकुलम परमाणु संयत्र को सुप्रीम कोर्ट से हरी झंडी दिलाने के लिए फ़ुकुशिमा हादसे के बाद जारी निर्देशों को दरकिनार कर दिया. एईआरबी को ऐसा शपथपत्र देने के लिए बाध्य किया गया जिसमें कहा गया है कि उसके निर्देश 'बाध्यकारी' नहीं महज 'सुझाव' हैं.

हम अभी ये मानने को तैयार नहीं है कि हम एक ज्वालामुखी के मुहाने पर बैठे हुए हैं. इसके लिए मैं एक और उदाहरण देना चाहूंगा. भारत फ्रांस की मदद से महाराष्ट्र के जैतपुर में छह यूरोपीय प्रेशराइज्ड रिएक्टर लगा रहा है. लेकिन खुद फ्रांसीसी परमाणु नियामकों ने इन संयंत्रों की डिज़ाइन पर गंभीर आपत्ति जतायी है.

हादसे के बाद की लोगों को बाहर निकालने समेत तमाम राहत एवं बचाव योजनाओं के बारे में सरकार के बड़े बड़े दावे खोखले हैं क्योंकि ज्यादातर भारतीय संयंत्र घनी आबादी के बीच हैं. जो लगातार बढ़ती जा रही है.

ज्यादातर मामलों में परमाणु ऊर्जा विभाग ने इमरजेंसी व्यवस्था की तैयारी का ब्योरा तक सार्वजनिक नहीं किया है. अगर कभी कोई जानकारी सार्वजनिक की भी जाती है तो वो हास्यास्पद होती है जैसे, पचास हज़ार लोगों को स्कूल की इमारत में रख दिया जाएगा. परमाणु संयंत्रों पर आवश्यक इमरजेंसी ड्रिल भी जिस तरह की जाती है वो भी एक मजाक प्रतीत होती है. मसलन, कई बार स्थानीय अधिकारी कुछ सौ लोगों को बस में भेजकर पास के गांवों में ले गए.

जवाबदेही और मुआवजा के मुद्दे पर भी सरकार भी संभावित पीड़ितों के प्रति पर्याप्त चिंतित नहीं नजर आ रही है. विदेशी आपूर्तिकर्ताओं के मामले में जवाबदेही एक बड़ा मुद्दा रहा है.

संभावित हादसों के ज्यादातर मामलों में आदिवासी और ग्रामीण लोग इनके शिकार होंगे. जो मुख्यधारा की निगाहों से अक्सर ओझल रहते हैं

ये विडंबनापूर्ण है कि 'सिविल लाइबिलिटी फ़ॉर न्यूक्लियर डैमेज एक्ट 2010' के बाद खुद सरकार विदेशी आपूर्तिकर्ताओं की चिंताओं को दूर करने वाला रास्ता तलाशने में व्यस्त है. विदेशी आपूर्तिकर्ता पूर्ण बीमे की मांग कर रह हैं.

तमाम सीमाओं के बावजूद इस अधिनियम के अनच्छेद 17(बी) में आपूर्तिकर्ता को जवाबदेह माना गया है. मनमोहन सिंह सरकार की अनिच्छा के बावजूद संसदीय और नागरिक दबाव के तहत ये अनुच्छेद शामिल किया गया था. लेकिन मोदी सरकार ने बीजेपी की पुरानी राय से पलटते हुए आपूर्तिकर्ताओं की जवाबदेही की चिंता को ध्यान में रखते हुए एक बीमा कोष बनाने का प्रस्ताव दिया है. जाहिर ये पैसा करदाताओं की जेब से जाएगा.

इन तीनों मामले में भारत की नाजुक स्थिति देखते हुए भोपाल गैस त्रासदी की 31वीं बरसी पर हमें एक पल के लिए ठहर कर सोचना होगा. हमें सोचना होगा कि क्या हम मौजूदा अपर्याप्त और गैर-जवाबदेह प्रशासकीय और राजनीतिक सिस्टम पर भरोसा कर सकते हैं?

भोपाल ही की तरह परमाणु हादसे की स्थिति में हम पीड़ितों को पर्याप्त राहत नहीं पहुंचा सकेंगे. यह भी ध्यान रखना चाहिए कि ज्यादातर मामलों में आदिवासी और ग्रामीण लोग इनके शिकार होंगे. जो मुख्यधारा की निगाहों से अक्सर ओझल रहते हैं.

First published: 10 December 2015, 8:46 IST
 
कुमार सुंदरम @pksundaram

The author is a researcher with the Coalition for Nuclear Disarmament and Peace.

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