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ज्वार-बाजरे की खेती करने वाली महिला किसानों का 'मिलेट नेटवर्क'

कैच ब्यूरो | Updated on: 11 February 2017, 5:47 IST
(मलिक/कैच न्यूज़)
QUICK PILL
  • बीते दिनों दिल्ली में इकट्ठा होकर महिला किसानों ने एक संगठन नेशनल मिलेट सिस्टर्स नेटवर्क गठित किया है. 
  • इस नेटवर्क से महिला किसानों के अलावा सिविल सोसायटी समूह, वैज्ञानिक, नीति निर्धारक, कार्यकर्ता और समाजविद भी जुड़े हुए हैं. 
  • नेटवर्क ने स्थापना के दौरान ही एक घोषणा पत्र जारी किया है और केंद्रीय मंत्री रामविलास पासवान से मुलाक़ात कर मांग पत्र भी सौंपा है. 

ज्वार-बाजरे की खेती पर अपना अधिकार कायम रखने के लिए क़रीब 9 राज्यों से आई महिला किसानों ने दिल्ली में जमा होकर ‘नेशनल मिलेट सिस्टर्स नेटवर्क’ बनाया है. महिला एवं बाल विकास मंत्री मेनका गांधी ने 5000 धान किसानों व उपभोक्ताओं के इस नेटवर्क का उद्घाटन किया. यह नेटवर्क तेलंगाना के डेक्कन डेवलपमेंट सोसायटी (डीडीएस) और मिनी (मिलेट नेटवर्क आफ इंडिया) की पहल पर बनाया गया है. इस संयुक्त गठबंधन में 13 राज्यों के किसानों, वैज्ञानिकों व मीडियाकर्मियों के 145 समूह शामिल हैं.

देश में पहली बार बना महिला किसान नेटवर्क इस उपेक्षित सीरियल की फसल को उन्नत करने पर फोकस करेगा, जो कि देश की परम्परगत फसल रही है. ऊंचे पहाड़ी इलाकों और शुष्क इलाकों में ज्वार की यह फसल गरीब आदिवासियों का मुख्य भोजन हुआ करता था. 

घोषणा पत्र

इस नेटवर्क से जुड़े किसान, सिविल सोसायटी समूह, वैज्ञानिकों, नीति निर्धारकों, कार्यकर्ताओं और समाजविदों ने एक घोषणा पत्र जारी कर कहा है कि धान की खेती के लिए भविष्य में काफी कुछ किए जाने की जरूरत है. इसके बाद इन्होंने मिलेट सिस्टर नेटवर्क ने केंद्रीय मंत्री रामविलास पासवान को एक ज्ञापन सौंपा. 

उनकी मुख्य मांग है कि खाद्य सुरक्षा अधिनियम 2013 लागू किया जाए, जिसमें ज्वार-बाजरे को सार्वजनिक वितरण प्रणाली के तहत लाने का प्रावधान है. अब तक कर्नाटक के अलावा किसी और राज्य ने इसे लागू नहीं किया है. साथ ही सम्मेलन में धान की खेती करने वाले किसानों को जलवायु परिवर्तन और जल संरक्षण में योगदान के लिए आर्थिक सहायता व पोषण बोनस दिए जाने की मांग भी की गई.

धान की खेती वर्षा पर निर्भर होती है और इसे चावल व गेहूं की फसल की तरह ज्यादा पानी देने की जरूरत नहीं है. साथ ही इस ज्ञापन में ज्वार-बाजरे जैसे मोटे अनाज को आईसीडीएस (समेकित बाल वकास सेवाओं) में भी शामिल करने की बात कही ताकि देश में महिलाओं व बच्चों में बढ़ते कुपोषण से निपटा जा सके. ज्वार-बाजरा गेहूं व चावल के बजाय कहीं अधिक पोषक तत्वों से भरपूर है.

केंद्रीय महिला एवं बाल विकास मंत्री मेनका गांधी ने इस नेटवर्क का उद्घाटन करते हुए कहा, ‘मोटे अनाज या मिश्रित धान पर मैं बहुत समय से विचार कर रही हूं.’ उन्होंने कहा पीडीएस और आईसीडीएस जैसी योजनाओं में काफी पैसा खर्च करने के बावजूद लोगों को अब भी अच्छी गुणवत्ता का खाना नहीं मिल रहा है. लोग अब भी कम पोषक तत्वों वाला खाना खा रहे हैं. उन्होंने माना कि खाद्यान्न वितरण केंद्रों पर मिश्रित धान जैसे ज्वार, बाजरा, जौ, रागी अब भी नदारद हैं.

उन्होंने कहा वे स्कूलों, डे केयर सेंटर और राशन की दुकानों में मिश्रित धान का आटा व दालों के पैकेट उपलब्ध करवाएंगी ताकि कम से कम आवश्यक पोषक तत्वों से भरपूर भोजन तो सबको मिल सके. मिश्रित धान के प्रति जागरूकता बढ़ाने का आह्वान करते हुए उन्होंने कहा, अभी इसकी मार्केटिंग ठीक तरह से नहीं हो रही है. इसे देश के हर स्टोर तक पहुंचाने की जरूरत है, हॉस्पिटलों में भी.

संगठित होने की दरकार

मल्टीनेशनल बीज कम्पनियों द्वारा अपनाए जा रहे मिश्रित खाद्यान्न पर अधिकार जताने के मौजूदा ट्रेंड के चलते ज्ञापन में सरकार से यह भी मांग की गई है कि वह इस संबंध में छोटे व लघु किसानों के हितों की रक्षा करे. डेक्कन डवलपमेंट सोसायटी की संयुक्त निदेशक जय श्री चेरूकुरीना का कहना है कि हमें इस बात की सख्त जरूरत महसूस हुई कि इस मुद्दे पर देश भर ज्वार-बाजरा बाने वाले किसान संगठित होकर अपनी मांगें रखें. इस तरह से किसान इस नेटवर्क के जरिये अधिक आत्मविश्वास के साथ अपनी बात रख सकेंगे.

उन्होंने कहा, इससे किसान एक-दूसरें को जानेंगे, पहचानेंगे और कोई न कोई समाधान निकालेंगे. तमिलनाडु से आई महिला किसान पोन्नुताई जो पानी की कमी की वजह से गन्ने की खेती छोड़ धान की खेती करने लगी है, ने कहा कि हम लोगों का संगठित होना वक्त की जरूरत थी. 

उसने कहा किसानों के संगठित होकर संघर्ष करने से बड़े पैमाने पर बहुत-सी समस्याओं का समाधान किया जा सकता है. जैसे भूमि की गुणवत्ता में कमी, बीजों का अभाव, भूजल में कमी, अजैविक खेती के चलते स्वास्थ्य समस्याओं आदि का हल हो सकता है.

महिला अधिकारों की लड़ाई लड़ रहे पूर्वोत्तर नेटवर्क की सेनो शाह ने कहा उत्पादन और लालच के इस दौर में महिला किसान कहीं पीछे छूट गई हैं. तकनीक के जमाने में भी हमें किसानों के व्यावहारिक ज्ञान को साथ लेकर चलना होगा. ज्वार-बाजरे की खेती मिट्टी के उपजाऊपन, बीजों और भावी पीढ़ियों के स्वास्थ्य के लिहाज से सही है.

First published: 7 December 2016, 8:04 IST
 
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