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कश्मीर संकट: संवैधानिक सुधारों के रास्ते तलाशना होगा समाधान

आनंद सहाय | Updated on: 9 September 2016, 8:02 IST

कश्मीर के संबंध में हम अभी तक किसी फैसले पर नहीं पहुंच सके हैं. हालांकि संभावनाएं सामने बहुत सारी हैं बशर्ते कि घाटी में सांसदों के सर्वदलीय प्रतिनिधिमंडल की हाल की दो दिवसीय यात्रा के बाद भारत सरकार जितना जल्द मुमकिन हो संवैधानिक सुधारों की प्रक्रिया के कार्यक्रम को आगे बढ़ाए.

कश्मीरियों की यह आलोचना वाजिब है कि 2010  के कठिन दौर के बाद से सुधारों की दिशा में कोई गंभीर प्रयास नहीं किए गए. हालांकि स्वायत्तता को लेकर अनेक तरीके के विचार और जम्मू.कश्मीर राज्य के विभिन्न क्षेत्रों के विशिष्ट आर्थिक जरूरतों पर विभिन्न मंचों के माध्यम से काफी चर्चाएं होती रही हैं. इसके बावजूद आम लोगों को बड़ी उम्मीदों के साथ संसदीय प्रतिनिधि मंडल का इंतजार था.

उनकी बगावत आर्थिक, राजनीतिक और सुरक्षा जरूरतों के प्रति राज्य की पीडीपी-भाजपा सरकार द्वारा बरती जा रही उपेक्षा के खिलाफ है. कश्मीर में जनता उम्मीद कर रही थी कि सांसदों का सवर्दलीय प्रतिनिधि मंडल जब यहां विभिन्न लोगों के साथ मुलाकात कर वर्तमान संदर्भ में लोगों के साथ बात करेगा तो इस प्रक्रिया में कुछ नया सामने आएगा.

हुर्रियत जनभावनाओं की प्रतिनिधि नहीं है

कश्मीर की सरजमीं से जो संदेश सुनाई दे रहा है वह स्पष्ट है. वहां गांव-गांव में विरोध प्रदर्शन हो रहे हैं. लेकिन अली शाह गिलानी के नेतृत्व में हुर्रियत कांफ्रेंस ने सांसदों की इस सार्थक पहल को ठुकराया है. इससे लगता है कि उसे जन भावनाओं की परवाह नहीं है. इसके विपरीत यदि केंद्र सरकार कोई भी ऐसा कदम उठाती है जिसकी वजह से हुर्रियत नेतृत्व के प्रति लोगों में सहानुभूति उत्पन्न हो तो यह बहुत बड़ी मूर्खता होगी.

खबरें आ रही हैं कि सरकार हुर्रियत की प्रमुख हस्तियों पर शिकंजा करने की तैयारी में है. उनको दी जा रही सुरक्षा को कम किया जा सकता है. हमारे सांसदों के साथ बातचीत करने से इंकार करने की एवज में गिलानी एवं अन्य को दंडित करने की खातिर इस प्रकार का उतावलापन, उदाहरण के लिए टेलीविजन चैनलों द्वारा उग्रराष्ट्रवादियों को संतुष्ट करने के लिए काफी ढोल पीटे गए. यह कदम हिंदू राष्ट्रवादियों को प्रसन्न तो कर सकता है परंतु यह उल्टकर सरकार के लिए ही भारी पड़ सकता है. यह हुर्रियत नेतृत्व के प्रति वहां की जनता में हमदर्दी उत्पन्न करने में ही मददगार होगा.

सरकार वास्तव में यदि अलगाववादियों को सबक सिखाना चाहती है तो उसे बदले की रणनीति को अख्तियार करने की जगह खतरे की संभावनाओं के बावजूद जनता के हित में कुछ साहसिक घोषणाएं कर उनका विश्वास अर्जित करना होगा. यह ध्यान रहे कि हुर्रियत द्वारा वार्ता से इंकार को आम जनता ने पसंद नहीं किया है.

तार्त्पय यह है कि बातचीत का निमंत्रण स्वीकार करना या नहीं करना हर किसी को इसका अधिकार है. वे हुर्रियत के नेता हों या अन्य कोई और. इसके अलावा एक और बात है जिस पर थोड़ा सोचना होगा.  हुर्रियत का तो काम ही है भारत के लिए समस्या उत्पन्न करना ताकि समाधान न हो सके. खासकर हुर्रियत में वे लोग जो कि पाकिस्तान के पक्के समथर्क हैं, उनका यही प्रयास रहेगा.

जनता में पीडीपी-भाजपा सरकार के प्रति इतना रोष क्यों है?

कश्मीर की जनता व्यापक तौर पर पाकिस्तान के पक्ष में नहीं है. इसके बावजूद कश्मीर में जबरदस्त विद्रोह है. इसकी वजह यह है आम जनता राज्य में पीडीपी-भाजपा सरकार के राज में बेहद दुखी है. इसने जनता की उन सारी उम्मीदों पर पानी फेर दिया हैए जिसके कारण केंद्र द्वारा आर्थिक सहायता मिलने की उम्मीद से जनता ने हिंदुत्ववादी भाजपा के साथ पीडीपी के गठजोड़ का समर्थन किया था.

भाजपा राज्य में सरकार में सम्मिलित है. घाटी में रचनात्मक राजनीति की जगह उसने देश के शेष इलाकों में अपने समर्थकों के समक्ष अपनी छवि को चमकाने के लिये सांप्रदायिक विभाजन पर आधारित राजनीति शुरू कर दी है जैसे कि गोमांस और तिरंगे की राजनीति.

इसी तरह कश्मीरी पंडितों के लिये अलग बस्तियों को बसाने के निरर्थक विचारों को हवा दी गई, जबकि कुछ ही कश्मीरी पंडित घाटी लौटने के इच्छुक हैं. इसके अतिरिक्त और भी तमाम सांप्रदायिक सोच से जुड़े कार्य शुरू कर दिए गए. भाजपा के द्वारा राजनीति के इस कुप्रबंध के साथ ही केंद्र सरकारए जिसके नेता स्वयं को बड़ा राष्ट्रवादी बताते हैं द्वारा सुरक्षा के प्रति लापरवाही की वजह से भी स्थितियां बदतर हुईं. 2016 में पाकिस्तान से कश्मीर में घुसपैठ की तादात 2014 की तुलना में 200प्रितिशत बढ़ गयी. ये सशस्त्र आतंकवादी घुसपैठिये माकूल अवसर के इंतजार में घाटी में आ जमे.

पीडीपी असहाय होकर भाजपा के इस राजनीतिक खेल को देखती रही. वह भगवा पार्टी को रोक पाने में असमर्थ थी क्योंकि उसके स्वयं के विधायक और मंत्री सत्तासुख के लोभ और लालच के शिकार हो गए. मुख्यमंत्री महबूबा मुफ्ती ने इस बात के लिये समझौता नहीं किया था जब वे 2016 की शुरूआत में अपने पिता मुफ्ती मुहम्मत सईद की मृत्यु के बाद कई सप्ताह की हिचकिचाहट के बाद सरकार बनाने के लिए राजी हुईं थीं.

हिजबुल मुजाहिदीन के कमांडर बुरहान वानी की हत्या तो एक घटना थी लेकिन लोग भावनाओं में बह कर स्वतःस्फूर्त विद्रोह पर उतर आए. अगर वह दुर्भाग्यपूर्ण मुठभेड़ नहीं हुई होती तो कोई और छोटी घटना भी ऐसा ही बहाना बन सकती थी. लोगों का असंतोष चरम सीमा तक पहुंच चुका था.

पाकिस्तान की भूमिका

गौरतलब है कि शुरूआत में दक्षिण कश्मीर में आम जनता अपने आक्रोश को केवल प्रदर्शनों के जरिये ही व्यक्त कर रही थी. केवल एक स्थान पर पुलिस थाने पर हमला हुआ था. संगठित तरीके से पथराव की वारदातें बाद में शुरू हुई. घाटी में पाकिस्तान के हिमायती हालांकि बहुत कम हैं लेकिन वे पथराव की रणनीति के प्रचार में माहिर हैं. उन्होंने इस मौके का बखूबी फायदा उठाया और जनता के गुस्से को भड़का कर अपने मंसूबों को अंजाम दिया.

वर्तमान विद्रोह के इन दो चरणों को अलग कर समझने की जरूरत है. पहले तीन दिन वह दौर है जब आम जनता का स्वतःस्फूर्त आक्रोश फूट रहा था. उसके बाद सोच.समझ कर योजनाबद्घ तरीके से विद्रोह को संगिठत किया गया. सामान्य ग्रामीण जनता को असुरक्षा और भय का हौव्वा दिखा कर विद्रोह मेें सम्मिलित किया गया. पाकिस्तान समर्थक लोगों ने जनता के बीच भयानक दहशत का माहौल बना दिया. 1989-93 के उग्रवाद के दौर में जमात-ए-इस्लामी के कारकुनों ने जिस प्रकार से अपने विचारधारात्मक विरोधियों का निपटारा किया है यह उसका एक नमूना है.

दो महीने बीत गये हैं पथराव रुक नहीं रहा है. यह धंधा जारी है, पत्थरों की कोई कमी नहीं है. ऐसा संघर्ष जिसने घाटी को इतने लम्बे अरसे तक ठप कर दिया हो, पहले कभी नहीं देखा गया और अभी तक इसका कोई अंत नजर नहीं आ रहा है.

दक्षिण कश्मीर के जिलों में यह स्थिति विशेष रूप से है. लेकिन घाटी के उत्तरी हिस्सों में भी आये दिन सैकड़ों की संख्या में लोग गांव-गांव पाकिस्तान का झण्डा लेकर जुलूस निकाल रहे हैं. खास बात यह है कि इन प्रदर्शनों में जो झण्डे लहराये जा रहे हैं वे एक जैसे हैं मानों वे सीमा पार के किसी दर्जी या दिल्ली के किसी गोपनीय स्थान पर तैयार किये जा रहे हों और रातों-रात सुनियोजित तरीके से घाटी में पहुंचाये जा रहे हों. ये झण्डे कश्मीर के गांवों के दस्तकारों द्वारा तैयार किये गये नहीं लगते.

मोदी का स्वतंत्रता दिवस का भाषण और उसका प्रभाव

घाटी में अब यह स्पष्ट है कि नरेंद्र मोदी ने स्वतंत्रता दिवस के भाषण में बलूचिस्तान और पाक अधिकृत कश्मीर में पाकिस्तान द्वारा मानवाधिकार के हनन का जो हवाला दिया है उसकी प्रतिक्रिया में पाकिस्तान समर्थकों द्वारा घाटी में यह अति सक्रियता है. यह एक तरह का अनोखा प्रतिकार है, जिसका सामना हम कर रहे हैं. इस्लामाबाद अपने इस वर्ष के स्वतंत्रता दिवस को कश्मीर के लिए समर्पित करने के बाद अब कश्मीर में यह वहिशयाना हस्तक्षेप कर रहा है.

आम कश्मीरी की ख्वाहिश यही है कि जितना जल्द संभव हो स्थितयां सामान्य हों. दरअसल वह पाकिस्तान समर्थित तत्वों का बंधक होने जैसे हालातों का शिकार बन गया है. अब सरकार के पास ही वे संसाधन और राजनीतिक क्षमता है कि वह लचीला रुख अपना कर यहां की जनता को इन हालात से छुटकारा दिला सकती है. हालात जिस मंजर पर आ पहुंचे हैं उनमें नई पहल की दरकार है, तभी यह संभव हो सकेगा. यह काम सुरक्षा बलों या दमन के माध्यम से होने वाला नहीं है. लचीलेपन के साथ नई पहल जनता की निगाह में पाकिस्तान समर्थकों  की असिलयत को बेनकाब कर देगी. 

यह समय नई रणनीति अपनाने का है

जम्मू कश्मीर के शासक महाराजा हरि सिंह ने जिस समय अक्टूबर 1947 में भारत में राज्य के विलय के संधिपत्र पर हस्ताक्षर किए थे, उन्होंने केवल रक्षा, विदेश मामले और संचार विभागों को ही भारत सरकार के सुपुर्द किया था. उसके बाद से बहुत कुछ दिल्ली के अधीन आ चुका है. संवैधानिक पदों में राज्यपाल के लिए सदर-ए-रियासत और मुख्यमंत्री के लिए प्रधानमंत्री के खिताब भी समय के साथ समाप्त हो गए हैं. हालांकि यह समझौते का हिस्सा नहीं था.

दशकों से जारी इस पूरी प्रक्रिया में घाटी में तीव्र असंतोष और रोष की स्थिति उत्पन्न हो गई है. इसके साथ ही नाइंसाफी और तिरस्कार का एहसास यहां के अवाम के जेहन में घर कर गया है. समय आ गया है इस अलगाव की भावना को खत्म करना होगा और नजीर कायम करनी होगी कि कश्मीर की जनता ही फैसला करे कि भारत संघ के किन कानून और विधानों को वे अपनाते हैं और किन्हें नहीं. यह विकल्प उनके विवेक पर ही छोड़ना होगा.

इस तरह को कोई बड़ा कदम कश्मीर के लोगों के बीच असाधारण उत्साह का संचार करेगा. हमारे पड़ोसी द्वारा कब्जाए गए पाक अधिकृत कश्मीर और गिलगित बाल्टिस्तान के संपूर्ण क्षेत्र में पाकिस्तान के अधिकारियों के विरोध में इसकी जबरदस्त प्रतिक्रिया होगी.

लेकिन यह सब कर दिखाने का वक्त अब आ चुका है. इसमें अधिक विलंब उचित नहीं होगा.

(यह लेखक के निजी विचार हैं. संस्थान का इनसे सहमत होना आवश्यक नहीं)

First published: 9 September 2016, 8:02 IST
 
आनंद सहाय @catchhindi

वरिष्ठ पत्रकार

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