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गर्भपात कानून में तुरंत संशोधन की ज़रूरत क्यों है?

विशाख उन्नीकृष्णन | Updated on: 12 February 2017, 11:07 IST
(आर्या शर्मा/कैच न्यूज़)

दुनिया भर में गर्भपात कानून पर बड़ी बहस छिड़ी हुई है. इसी बहस और विचारों की जंग के बीच चिकित्सा विशेषज्ञों और कार्यकर्ताओं का कहना है कि गर्भपात को वैध ठहराने वाले 1971 के भारतीय कानून में तुरंत संशोधन की आवश्यकता है.

एक हफ्ते पहले ही एक 22 वर्षीय महिला ने सुप्रीम कोर्ट में अपील कर इस बात की अनुमति मांगी थी कि वह अपना गर्भपात करवाना चाहती है, क्योंकि उनके गर्भ में पल रहा शिशु मस्तिष्क की जन्मजात विकृति से ग्रस्त है. इसमें बच्चे के दिमाग और खोपड़ी का समुचित विकास नहीं होता है.

गौरतलब है कि इस महिला को गर्भावस्था के 21 वें सप्ताह में पता चला कि उसके गर्भ में पल रहे बच्चे में यह विकृति है. जबकि गर्भावस्था के चिकित्सकीय समापन (एममटीपी) अधिनियम 1971 के तहत केवल 20 सप्ताह तक के भ्रूण का ही गर्भपपात किया जा सकता है.

सुप्रीम कोर्ट ने गत वर्ष जुलाई में एक मामले में दुष्कर्म पीडि़त महिला के गर्भपात की इजाजत दे दी थी. सुप्रीम कोर्ट ने इस मामले को भी उसी पैनल को सौंप दिया है, जिसने गत वर्ष के दुष्कर्म पीडि़ता मामले में फैसला सुनाया था.

कानून में संशोधन की पूर्व योजनाएं

मौजूदा एमटीपी अधिनियम के अनुसार, गर्भाववस्था के 20 सप्ताह की अवधि में गर्भपात की अनुमति है; जब दो चिकित्सक इस बात पर सहमत हों कि इससे महिला के स्वास्थ्य को नुकसान नहीं पहुंचेगा. एमटीपी कानून के तहत एक विवाहित महिला अनचाहा गर्भ गिरा सकती है, अगर उसके द्वारा अपनाए गए गर्भनिरोधक उपाय कारगर न हुए तो यह वैध है.

पिछले तीन सालों से स्वास्थ्य मंत्रालय कई मौक़ों पर कह चुका है कि यह कानून में संशोधन पर विचार कर रहा है. 23 दिसम्बर को मंत्रालय ने एक बार फिर कहा कि वह एमटीपी कानून में संशोधन पर विचार कर रहा है.

केंद्र ने 3 साल पहले संशोधित एमटीपी कानून का प्रपत्र जारी किया था. इसके अनुसार गर्भपात की सीमा 24 सप्ताह की तय करना प्रस्तावित था लेकिन इस दिशा में आगे कोई काम नहीं हुआ.

First published: 15 January 2017, 8:21 IST
 
विशाख उन्नीकृष्णन @catchnews

एशियन कॉलेज ऑफ़ जर्नलिज्म से पढ़ाई. पब्लिक पॉलिसी से जुड़ी कहानियां करते हैं.

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