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एनएसजी सदस्यता: पाकिस्तान की खुशी कहीं खुशफहमी तो नहीं

तिलक देवाशर | Updated on: 5 July 2016, 11:54 IST

दक्षिण कोरिया की राजधानी सियोल में हुई न्यूक्लियर सप्लायर्स ग्रुप की बैठक में पाकिस्तान की प्रतिक्रिया से तीन बातें साफ थीं. 

एक, भारत को एनएसजी की सदस्यता न मिल पाने की खुशी और उसका खुला प्रदर्शन. पाकिस्तान को लगता है कि इससे दोनों पड़ोसी देश एक बार फिर 'समान धरातल' पर आ गए हैं.

पाकिस्तान को इस बात की भी खुशी है कि उसने 18 मई को आखिरी वक्त में एनएसजी की सदस्यता के लिए आवेदन किया था जिसकी वजह से भारत की सदस्यता की राह में एक रोड़ा बढ़ गया था.

पाकिस्तान ने (चीन की तर्ज पर) किसी 'देश विशेष को छूट' दिए जाने का विरोध किया. उसका कहना था कि एनएसजी की सदस्यता के लिए 'मानदंडों के आधार पर' विचार होना चाहिए और सभी इच्छुक देशों के लिए समान अवसर होना चाहिए.

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हालांकि पाकिस्तानी मीडिया में कुछ टिप्पणीकारों ने पाकिस्तान को आगाह किया है कि उसे भारत का 'खेल खराब' कर देने को लेकर ज्यादा उत्साहित नहीं होना चाहिए क्योंकि एनएसजी में सदस्यता के लिए भारत के पास पाकिस्तान से ज्यादा समर्थन है. 

ऐसे टिप्पणीकारों ने इस बात पर भी ध्यान दिलाया कि अमेरिका की मदद से भारत एनएसजी का सदस्य न होते हुए भी 2008 से ही उसके ज्यादातर लाभ पाता रहा है. पाकिस्तनी कूटनीतिज्ञों को इस बात का भी एहसास है कि अमेरिका भविष्य में भी परमाणु आपूर्तिकर्ता समूह की सदस्यता के लिए भारत को विशेष रियायत दिए जाने की पैरवी करता रहेगा. 

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दो, पाकिस्तान और चीन की पुरानी दोस्ती इस मसले पर एक बार फिर खरी साबित हुई है. चीन द्वारा भारत को इसी शर्त पर रियायत दिए जाने का समर्थन करना कि यही रियायत पाकिस्तान को भी दी जाए, पाकिस्तान के लिए बहुत आश्वस्त करने वाली है.

चीन का सीधा कहना है कि भारत अगर एनएसजी का सदस्य बनता है तो पाकिस्तान भी साथ ही बनेगा. अभी एनएसजी का सदस्य वही देश बन सकता है जिसने नॉन प्रॉलिफिरेशन ट्रीटी (एनपीटी) पर दस्तखत किया है. चीन ने एनएसजी की बैठक में कहा कि अगर इस नियम में रियायत दी गई तो इससे एनपीटी कमजोर होगा.

अगर इसमें छूट देनी भी है तो एनएसजी सदस्य देशों को इसके लिए सुनिश्चित कानून बनाना होगा ताकि कोई मनमाने तरीके से सदस्यता न पा जाए. इस तरह चीन ने भारत के कंधे पर रखकर पाकिस्तान की सदस्यता का तीर चला दिया.

अमेरिका का साथ

तीसरी और सबसे महत्वपूर्ण बात ये साफ हुई कि अमेरिका और राष्ट्रपति बराक ओबामा ने भारत की सदस्यता के लिए काफी कोशिश की. अमेरिका द्वारा एनएसजी और संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद में भारत की सदस्यता का पुरजोर समर्थन करने से पाकिस्तान आशंकित है.

कूटनीतिक जानकार अमेरिका के रुख में बदलाव के पीछे 'चीन को संतुलित' करने की रणनीति देख रहे हैं. पाकिस्तान के राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार नसीर खान जंजुआ ने भी कहा कि अमेरिका 'चीन को सीमित' करने के लिए भारत को एनएसजी का सदस्य बनवाना चाहता है.

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जंजुआ ने अमेरिका को आगाह करते हुए कहा कि उसका ये कदम पाकिस्तान को चीन के और करीब ले जा सकता है.

कुछ कूटनीतिज्ञों का यह भी मानना है कि अमेरिका ने एनएसजी का पूरा मामला एक तीर से दो निशाने साधने के लिए रचा ताकि चीन पर भी लगाम लग जाए और भारत पाकिस्तान से प्रभुत्वशाली दिखने लगे.

दूसरी तरफ इससे अमेरिका और समान विचार वाले अन्य देशों को भारत में खुलते परमाणु बाजार का लाभ मिलेगा.

पाकिस्तान को इस बात का अच्छी तरह एहसास है कि वो अपनी अर्थव्यवस्था को भारत जैसी गति नहीं दे सकता और अमेरिका इस बात का समझता है कि पाकिस्तान में कारोबार के मौक न के बराबर हैं.

बराबरी का दर्ज खत्म

साल 2008 में मिली छूट के बाद भारत ने कई देशों से परमाणु ईंधन के आयात का समझौता किया है. इससे भारत अपने घरेलू संसाधनों का सैन्य इस्तेमाल कर सकेगा. पाकिस्तान को डर है कि अगर भारत को एनएसजी की सदस्यता मिल गई तो उसे अत्याधुनिक तकनीकी मिलनी शुरू हो जाएगी जिससे उसका परमाणु आयुध कार्यक्रम तेज हो जाएगा.

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पाकिस्तान को लगता है कि 1998 में जब दोनों देशों ने परमाणु परीक्षण किया उसके बाद से 2008 तक दोनों को बराबरी पर रखा था. लेकिन 2008 में भारत को विशेष छूट देकर ये बराबरी खत्म कर दी.

आजादी के बाद सात दशकों तक पाकिस्तान की विदेश नीति इसी समझ के आसपास घूमती रही है. पाकिस्तान को हमेशा ये मुगालता रहा है कि भू-राजनीति में अमेरिका के पास उसका विकल्प नहीं है.

पाकिस्तान के संस्थापक कहे जाने वाले मोहम्मद अली जिन्ना ने लाइफ मैगजीन की मार्गरेट बर्क-व्हाइट से कहा था, "पाकिस्तान को अमेरिका की जितनी जरूरत है उससे ज्यादा जरूरत अमेरिका को पाकिस्तान की है. पाकिस्तान दुनिया के नक्शे पर वहां स्थित है जहां वो भविष्य की राजनीति की धुरी होगा."

भारत को तवज्जो देने पर पाकिस्तानियों की खीझ समय समय पर सामने आती रहती है. 1951 में पूर्व गवर्नर जनरल गुलाम मोहम्मद ने अमेरिका से भारत को मिली मदद के बाद कहा, "ऐसे में पाकिस्तान को ऐसी भावी दुल्हन की तरह महसूस होता है जिसका पति अपनी अन्य प्रेमिका पर जमकर पैसा उड़ाता है और उसकी शादी के लिए नाम मात्र का पैसा खर्चता है." 

हालांकि स्कॉलर फरजाना शेख ने ध्यान दिलाया है कि पाकिस्तान और अमेरिका की निकाह की संभावनाएं वक्त के साथ साथ कमजोर पड़ती गई हैं. इसकी मूल वजह अमेरिका द्वारा वित्तपोषित सुरक्षा व्यवस्था से पाकिस्तान का दूर होते जाना है.

लेकिन शायद पाकिस्तान अभी इस बदलाव को पूरी तरह समझ नहीं पा रहा है. तालिबान प्रमुख मुल्ला अख्तर मंसूर का मारा जाना और अमेरिका द्वारा एनएसजी में भारत की सदस्यता का समर्थन से क्या उसे कोई संदेश नहीं मिल रहा? या फिर पाकिस्तान दीवार पर लिखी इबारत पढ़ नहीं पा रहा है?

First published: 5 July 2016, 11:54 IST
 
तिलक देवाशर @catchhindi

Tilak Devasher retired as Special Secretary, Cabinet Secretariat, to the Government of India. His book Pakistan: Courting the Abyss is releasing shortly.

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