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मोदी सरकार की गलत नीतियों से बढ़ने लगा बेरोजगारी का संकट

नीरज ठाकुर | Updated on: 18 December 2015, 19:53 IST
QUICK PILL
  • भारतीय श्रम मंत्रालय ने अप्रैल से लेकर जून 2015 के बीच एक सर्वेक्षण किया. सर्वे के निष्कर्ष चौंकाने वाले थे. बड़ी-बड़ी बातों के बावजूद इस अवधि में रोजगार में 43,000 की गिरावट देखने को मिली.
  • 43,000 नौकरियों में से 26,000 नौकरियां निर्यात करने वाली कंपनियों से जुड़ी थीं. इसी अवधि में भारत के मर्चेंडाइज एक्सपोर्ट में 16.75 प्रतिशत की गिरावट आई. जबकि मोदी सरकार ने हर साल 2.5 करोड़ नौकरी देने का वादा किया था.

बीजेपी लंबे चौड़े वादे कर सत्ता में आई थी. पार्टी ने दावा किया था कि वह अगले 10 सालों में 25 करोड़ लोगों को नौकरी देगी. मतलब हर साल करीब 2.5 करोड़ नौकरियों का वादा. सच्चाई यह है कि नरेंद्र मोदी सरकार उल्टी दिशा में काम कर रही है.

भारतीय अर्थव्यवस्था गहरे संकट से गुजर रही है. निर्यात और मेक इन इंडिया कैंपेन को आगे बढ़ाने के लिए मोदी सरकार ने अप्रैल 2015 में नई विदेश व्यापार नीति की घोषणा की है. साफ तौर पर कहा जा सकता है कि इसका फायदा अभी मिलना शुरू नहीं हुआ है.

निर्यात में आई गिरावट से बिजनेस कम्युनिटी को गहरा झटका लगा है. कई मैन्युफैक्चरर्स को मजबूरी में अपने यूनिटों में ताला लगाना पड़ा है. एक छोटे से उदाहरण से आप यह समझ सकते हैं कि लोगों पर इसका क्या असर हो रहा है.

हैरिसंस लेदर्स के मालिक पी एस खुराना को पिछले एक साल में ऑर्डर नहीं मिला और उन्हें मजबूरी में उत्तर प्रदेश के नोएडा के मैन्युफैक्चरिंग यूनिट को बंद करना पड़ा. अब वह फिलहाल एकमात्र मैन्युफैक्चरिंग यूनिट चला रहे हैं. खुराना ने कहा कि मौजूदा स्थिति अभूतपूर्व है और ऐसा उन्होंने पिछले 30 सालों में नहीं देखा.

उन्होंने कहा, 'हमें कई पुराने खरीदारों से ऑर्डर मिलना बंद हो चुका है. या तो वह हमसे भारी छूट दिए जाने की मांग कर रहे हैं या फिर अपना ऑर्डर दूसरे देश को दे रहे हैं. ऐसी हालत में दो यूनिट को चलाना मुश्किल हो रहा था इसलिए हमने एक को बंद कर दिया. इस बार स्थिति पिछली बार के मुकाबले बेहद खराब है.' 

ओखला में कपड़े बनाने का यूनिट चलाने वाले अशोक सकलानी भी यही कहानी दुहराते हैं. उन्होंने कहा, 'हमने अपने कर्मचारियों की संख्या में 50 प्रतिशत की कटौती कर दी है. हमारे खरीदारों ने ऑर्डर को कम कर दिया है और हमसे भारी छूट की मांग कर रहे हैं.'

किस पर पड़ेगा ज्यादा असर

इसका सबसे बड़ा असर रोजगार पर पड़ेगा. इससे बेरोजगारों की संख्या में बढ़ोतरी होगी. कंपनियों के मैन्युफैक्चरिंग यूनिट को बंद किए जाने से रोजगार पर असर पड़ेगा.

श्रम मंत्रालय के सर्वे के मुताबिक अप्रैल से जून 2015 के बीच नौकरियों में 43,000 की गिरावट देखने को मिली

श्रम मंत्रालय ने अप्रैल से लेकर जून 2015 के बीच एक सर्वेक्षण किया. सर्वे के निष्कर्ष चौंकाने वाले थे. बड़ी-बड़ी बातों के बावजूद इस अवधि में रोजगार में 43,000 की गिरावट देखने को मिली.

43,000 नौकरियों में से 26,000 नौकरियां निर्यात करने वाली कंपनियों से जुड़े थे. इसी अवधि में भारत के मर्चेंडाइज एक्सपोर्ट में 16.75 पर्सेंट की गिरावट आई. सदर्न इंडिया मिल्स एसोसिशन के महासचिव सेल्वीराज बताते हैं कि कॉटन यार्न इंडस्ट्री में पिछले एक साल में 3.5 लाख लोगों को नौकरी गंवानी पड़ी है. जबकि सरकार ने हर साल 2.5 करोड़ नौकरी देने का दावा किया था.

तो फिर सरकार के पास क्या बचाव है? ऐसा क्या है वह जो नहीं बता रही है?

अभी तक सरकार निर्यात में गिरावट के लिए दुनिया के बड़े बाजारों में आर्थिक मंदी का हवाला देती रही है. इस साल जुलाई में कॉमर्स मिनिस्टर निर्मला सीतारमन ने लोकसभा में एक सवाल का लिखित में जवाब देते हुए बताया:

  • दुनिया में आई मंदी और कमॉडिटी की कीमतों में आई गिरावट से कमॉडिटी एक्सपोर्ट्स को झटका लगा है.
  • यूरोपीय संघ के देश फिलहाल स्टैगनेशन और डिफ्लेशन का सामना कर रहे हैं. भारत के कुल निर्यात में यूरोपीय संघ के देशों की करीब 16 पसेंट हिस्सेदारी है.
  • इसके अलावा यूरो के मुकाबले रुपये के मजबूत होने से भारत के यूरोपीय संघ के देशों को होने वाले निर्यात पर असर पड़ा है.

सीतारमन दुनिया के बाजारों में आई डिमांड में कमी को लेकर सही हो सकती है लेकिन वह इस बात को छिपा रही हैं कि अन्य देशों ने मंदी से भारत के मुकाबले बेहतर तरीके से निपटा है.

सीतारमन यह नहीं बता रही हैं:

  • 2015 के पहले 9 महीनों में दुनिया के एक्सपोर्ट में 11 प्रतिशत की कमी आई जबकि भारत के निर्यात में 17 प्रतिशत की गिरावट दर्ज की गई.
  • ब्रिक्स का सदस्य देश दक्षिण अफ्रीका के निर्यात मूल्य में महज 8 प्रतिशत की गिरावट आई.
  • भारत का पड़ोसी देश चीन भी ब्रिक्स का सदस्य देश है. चीन के निर्यात में महज 2 प्रतिशत की कमी आई है.
  • अन्य एशियाई देशों मसलन दक्षिण कोरिया, मलेशिया, सिंगापुर, ताइवान, हॉन्गकॉन्ग और थाईलैंड भी निर्यात की गिरावट को 10 प्रतिशत से नीचे रखने में सफल रहे हैं.

कैसे होगा समाधान

आंकड़े साफ बताते हैं कि भारत सरकार पिछले एक साल में अपनी निर्यात नीति को संभालने में बुरी तरह से विफल रही है. सरकार की नई विदेश व्यापार नीति ने 2020 तक भारत से होने वाने वस्तु और सेवाओं के निर्यात को दोगुना कर उसे 90 अरब डॉलर करने का लक्ष्य रखा है. फिलहाल यह 470 अरब डॉलर है.

क्रिसिल के मुताबिक निर्यात में गिरावट सरकार की गलत नीतियों की वजह से आ रही है न कि वैश्विक कारणों से

भारत के निर्यात में आई गिरावट को देखते हुए इस बात की कम ही संभावना है कि भारत अपने लक्ष्य को पूरा कर सकेगा. क्रिसिल रिसर्च की रिपोर्ट के मुताबिक भारत का निर्यात स्ट्रक्चरल है न कि साइक्लिकल. साइक्लिकल गिरावट का मतलब होता है कि निर्यात में गिरावट केवल अंतरराष्ट्रीय बाजार की कमजोरी की वजह से आ रही है. जबकि स्ट्रक्चरल गिरावट का मतलब है कि गलत नीतियों की वजह से भारत के निर्यात में गिरावट आ रही है.

इंजीनियरिंग एक्सपोर्ट के लिए लॉबिंग करने वाले एक ग्रुप ने बताया कि सरकार भारत के निर्यात में गिरावट के लिए पेट्रोलियम प्रॉडक्ट की मांग में आई कमी को बड़ा कारण बताती है लेकिन यह एक गलत तर्क है. उन्होंने कहा कि यह सही है कि पेट्रोलियम उत्पादों की मांग और कीमत में गिरावट आई है लेकिन इस बात का कोई जवाब नहीं है कि इंजीनियरिंग और कॉटन यार्न के निर्यात में क्यों गिरावट आ रही है.

आगे है बड़ा खतरा

क्रिसिल के मुताबिक नवंबर महीने में 12 देशों के बीच होने वाला ट्रांस पैसिफिक पार्टनरशिप नहीं हो पाया. ऑस्ट्रेलिया, ब्रुनेई, कनाडा, चिली, जापान, मलेशिया, मेक्सिको, न्यूजीलैंड, पेरू, सिंगापुर और अमेरिका टीपीपी के साझेदार हैं. 

टीपीपी दुनिया के कुल उत्पादन के 2/5वें हिस्से और वैश्विक व्यापार के चौथाई हिस्से को नियंत्रित करता है और इसके लागू हो जाने के बाद दुनिया की इकनॉमी में अप्रत्याशित बदलाव आने की उम्मीद है. लेकिन यह भारत के लिए अच्छी खबर नहीं है क्योंकि वह इसका सदस्य देश नहीं है. टीपीपी की सदस्यता नहीं लेकर भारत ने एक बार फिर से बड़ी गलती कर दी है जिसका खामियाजा उसे भविष्य में उठाना पड़ सकता है.

First published: 18 December 2015, 19:53 IST
 
नीरज ठाकुर @neerajthakur2

सीनियर असिस्टेंट एडिटर, कैच न्यूज़. बिज़नेसवर्ल्ड, डीएनए और बिज़नेस स्टैंडर्ड में काम कर चुके हैं.

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