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एक हाथ दे-एक हाथ ले: 6 हज़ार साल पुरानी लेनदेन की व्यवस्था की वापसी

साहिल भल्ला | Updated on: 11 February 2017, 5:47 IST
(आर्या शर्मा/कैच न्यूज़)
QUICK PILL
  • हाथ में कैश नहीं होने से रोज़मर्रा की ज़रूरतें नहीं थम जातीं. उन्हें तो हर हाल में पूरा करना है, कहीं से भी. 
  • नोटबंदी होने से बहुत बड़ी आबादी अब सामान के बदले सामान और बिजली बिल भरने की एवज़ में सब्ज़ी वग़ैरह लेकर अपना काम चला रही है. 

500 और 1,000 हज़ार रुपए को अचानक बंद किए जाने के फ़ैसले से देश का एक बहुत बड़ा वर्ग नगदी के संकट से घिर गया है. बहुत बड़ी आबादी के हाथ में रुपए हैं नहीं लेकिन उसकी रोज़मर्रा की ज़रूरतें जस की तस हैं. लिहाज़ा, संकट की इस घड़ी में वह बार्टर डील दोबारा लोकप्रिय हो गई है जिसकी शुरूआत छह हज़ार साल पहले मेसोपोटामिया से हुई थी. 

बार्टर डील में लोग सामान के बदले पैसे देने की बजाय सामान के बदले सामान देते थे. यह वही प्राचीन मुद्रा प्रणाली है, जिसमें सामानों का आदान-प्रदान ही भुगतान माना जाता है. 1930 के आस-पास भारत में जब मंदी का दौर चल रहा था, तब भी नकदी की इतनी ही कमी थी, जैसी कि बाज़ार में आजकल है. लिहाज़ा, नकदी नहीं होने की सूरत में आमजन बार्टर सिस्टम से अपनी ज़िंदगी की गाड़ी आगे बढ़ रहे हैं. 

जुगाड़ का नाम बार्टर सिस्टम

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने काले धन का सफाया करने की अपनी कोशिशों के तहत 500 और 1000 रूपए के नोट 8 नवंबर की रात बंद करने की घोषणा की थी. इस फ़ैसले से हुआ यह कि रातों-रात बाज़ार में उपलब्ध 86 फीसदी नकद बेकार हो गया और अचानक से हर कोई इस रद्दी को बदलवाने पर पिल पड़ा. साथ ही, खुद जनता ने भी अपनी रोजमर्रा की ज़रूरतों के लिए अपने ही तरीके ढूंढ निकाले. 

खाने का एक सामान पड़ोसी से बदलकर दूसरा सामान लेना मजबूरी बन गई है क्योंकि बाज़ार जाकर सामान लाने के लिए हाथ में नकद तो है ही नहीं. ऐसा लगता है कि जैसे हम सब रामराज्य की ओर लौट चुके हैं. मगर निश्चित रूप से सामान की अदला-बदली सिर्फ कम कीमत की वस्तुओं के लेन-देन तक ही सीमित नहीं है.

मेरे सहकर्मी की एक आंटी ने तो जनकपुरी के एक सब्जी वाले भैया को ही एटीएम बना डाला. आंटी ने सब्जी वाले का बीएसईएस का बिजली का 1,100 रूपए के बिल का भुगतान कर दिया और बदले में उससे नकद पैसे ले लिए. चूंकि सब्जी वाले से लोग 100-100 रूपए की सब्जी खरीदे रहे थे तो उसके पास खुल्ले नोट थे. ऐसे ही एक अन्य महिला ने कुछ सब्जियों के बदले उसका मोबाइल फोन रिचार्ज करवा दिया. गौरव मुंजाल ने अपने ऑटो का भाड़ा देने के बदले ऑटो वाले को मोबाइल से ट्रांज़ैक्शन के ज़रिये 5 किलोग्राम चावल दिलवा दिया. जो लोग ओला व उबेर का इस्तेमाल नहीं करते उनके लिए इस ड्राइवर ने एक ऑफर दिया है, 'पेट्रोल भरवाओ और राइड करो.'

सोशल मीडिया पर डील

अरूण शौरी के पैरोडी अकाउंट पर कुछ इसी अंदाज में कहा गया है, 'हममें से कोई भी इस बदलाव से परेशान नहीं है.' हालांकि नोटबंदी से मध्यम वर्ग को अच्छी-खासी परेशानी हो रही है. वहीं उच्च वर्ग इसकी तारीफ कर रहा है और बेचारे गरीबों की तो भूखों मरने की नौबत आ गई है. सरकार के इस कदम से हर भारतीय का जुगाड़ु निकलकर बाहर आ गया है. बार्टर सिस्टम भी इसी का एक हिस्सा है.

ट्विटर पर किसी ने पूछा कि उसे उसके एक्स बॉक्स के बदले क्या मिलेगा? इस पर गाय से लेकर अलमारी, खाने की आपूर्ति से लेकर पहाड़ों में छुट्टियां मनाने तक के ऑफर सामने आए. यानी इस बार्टर डील से अर्थव्यवस्था को फायदा हो या न हो,  इससे कुछ ऐसी मज़ेदार व्यापार संभवनाएं तो खुलती हैं. बस एक ही शंका रहती है कि जिसके साथ आप बार्टर डील कर रहे हैं उसे उस चीज की कितनी जरूरत है, यह पता करना थोड़ा मुश्किल काम है.

जैसा कि आजकल हो रहा है कि अगर लोग कैश पर ज्यादा निर्भर नहीं रह सकते तो मोबाइल वॉलेट से बार्टर डील प्रणाली को नई ऊंचाई पर ले जाया जा सकता है. बल्कि ऐसा भी हो सकता हो सकता है कि हम जनता के बीच खड़े होकर सार्वजनिक सौदेबाजी करते दिखें और जब तक हमें हमारा मनचाहा सामान नहीं मिल जाता, सौदा करने में लगे रहें.

First published: 17 November 2016, 7:42 IST
 
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